Last Update On : 12 07 2018 06:46:05 PM

सुमन को बस इतना ही मालूम था कि हर लड़की की एक न एक दिन शादी होती है, इसलिए उसकी भी शादी की गई, बस उसकी शादी कुछ अलग तरह की है, जिसमें न तो बैंड-बाजा बजा, न घोड़ी पर सवार दूल्हा आया, न ही उसके मायके वालों ने उसे घर-गृहस्थी के साजों-समान के साथ विदा किया…

मोलकियों की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी ‘काहे को ब्याहे बिदेस’ युवा कवि—लेखक विपिन चौधरी की कलम से….

पितृसत्ता की संरचना ही ऐसी है जिसके अंतर्गत समूचे विश्व की स्त्रियों ही हर विपरीत परिस्थिति का पहला शिकार बनती हैं। यह विडंबना भी क्या कम है कि हरियाणा-पंजाब जैसे समृद्ध प्रदेशों में मौजूद स्त्री-पुरुष का असुंतलित अनुपात एक बड़ी सामाजिक विसंगति के रूप में है और इसी के चलते देश के अन्य प्रदेशों की गरीब लड़कियों को बहू के रूप में खरीद कर लाया जाता है।

दूसरे प्रदेश की संस्कृति, रहन-सहन, बोली से सर्वथा अपरिचित ये ‘मोलकियाँ’ हरियाणा में अपने ससुराल के सपनों को पूरा करने के लिए अपनी हसरतों की तिलांजलि दे देती हैं। वंश चलाने के लिए पोता देने वाली इन बहुओं को वह रुतबा कभी हासिल नहीं होता जो यहाँ की स्थानीय बहुओं के नसीब में है। हर बात पर प्रताड़ना, किसी संगी-साथी से अपना दुःख साझा न कर पाने की बेबसी ही इनके हिस्से आती है।

मायके तक इनकी पुकार पहुँचने का सवाल ही नहीं है, क्योंकि मायका हजारों मील की दूरी पर है।

बरस दर बरस इन लड़कियों के ज़हन में मायके की यादें भी धुंधली पड़ जाती हैं, याद रहता है बस वह दुख जो अब इनकी स्थायी पहचान है। कुछ बहुएं समय के साथ किसी तरह वे ससुराल के आँगन में अपनी जड़ें रोपने में सफल हो जाती है सुमन और गौरी की तरह।

“लाडो पूछै दादी से ओ दादी/ मैं किस विद देखन जाऊँ रंगीले, आ ऊतरे बागां में/ हाथ छबड़िया फूलो की हे लाडो/ मालनिया बनकर जाओ, रंगीले आ उतरे बागां में/ काची-काची कलियां तोडूं थी बांगा मै/ उलझ पड़ी घूँघट में मुखड़ा, देख गये बागां मे/ बोल गये बतलाये गये बागां मैं/ म्हारी सावै चढ़ी लाडो के नजर लगाये गये बागां मैं”

मूंज अपने कच्चे आँगन में राख से बर्तन माँज रही है। पास ही खाट पर उसका पति अपने बगल में ट्रान्सिस्टर सुन रहा है, जिसमें बिदाई के गीत बज रहे हैं। इन गीतों ने सुमन के भीतर अजीब सी बेचैनी उत्पन्न कर दी है। वह कैसा भाग्य लेकर जन्मी है, उसके लिए विदाई के गीत नहीं गाये गए, न ही बाकी की रस्में उसके हिस्से आयी. यही सब सोचते-सोचते सुमन की आँखे भीग गयी।

हरियाणा के किशनपुरा गाँव का अक्स भी हरियाणा प्रदेश के दूसरे गाँवों जैसा ही है रत्ती भर भी जुदा नहीं। पक्की सड़क से गाँव के भीतर प्रवेश करते ही सूखे कुएं, छोटे-बड़े बटोड़ों की कई पंक्तियाँ, गली के मुहाने पर बने जोहड़ में नहाती ढेरों भैंसें, दाई तरफ एक बड़ी सी कुरडी जिस पर गाँव भर का कूड़ा जम-जमकर एक छोटा सा पहाड़ बन गया है और श्रम के बूते जीवन के पहाड़ पर चढ़ते-उतरते ग्रामीण लोग।

1700 की जनसंख्या वाले इस गाँव में यादव, नायक, नाई, पंडित, बैरागी, बाल्मीकि और ओड जाति के लोग रहते हैं. एक दो घर खातियों और झिमरों के भी हैं। गाँव में सबसे ज्यादा घर नायक यानी हेड़ी जातियों के हैं। गाँव के कुछ हिन्दू तो कुछ मुस्लिम लुहारों के घर भी हैं।

इस गाँव के कुम्हार, बर्तन बनाने का अपना पुश्तैनी काम नहीं करते। इनके पास जमीनें तो हैं मगर दो-तीन एकड़ से ज्यादा किसी के पास नहीं। लेकिन इतनी कम ज़मीन से जीवन की चिलम का हुक्का तो हरगिज़ नहीं भरा जा सकता। जीवन-यापन के लिए गाँव के अधिकतर लोग, नज़दीक की गत्ता-फैक्ट्री और गैस प्लांट में काम करते हैं, इसके अलावा खेत में थोड़ी बहुत सब्जी उगा कर पास के शहरों में बेच आते हैं।

समृद्ध कहे वाले हरियाणा प्रदेश का यह एक गरीब गाँव है, यही कारण है यहाँ के युवा लड़कों की शादी में दिक्कते पेश आने लगी। तब यहाँ के परिवारों ने मन मारकर दूसरे प्रदेशों से लड़कियों को मोल-भाव करके अपने घर लाने का विचार किया। त्रिपुरा, बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश जैसे दूसरे राज्यों से लड़कियों को मोल से ब्याह कर लाया गया।

लड़कियाँ जिन्हें बचपन से ही ‘एडजस्ट’ करना सिखाया जाता है, इस बार भी विवाह की सामाजिक परम्परा के नाम पर खुद को ‘एडजस्ट’ करते हुए चुपचाप घर वालों की स्वीकृति पर मुहर लगाते हुए दूसरे घर चली आयी। दूसरे राज्यों से लाई गई इन बहुओं को चूँकि उसके परिवार वालों को पैसे देकर लाया जाता है इसीलिए इनका नाम मोलकी पड़ा। मोल माने पैसे देकर खरीदना।

सुमन भी एक मोलकी है। 26 साल की सुमन ने जब इस घर की देहरी में कदम रखा था तब वह उसकी उम्र महज़ 18 साल की थी। इस उम्र तक उसे बस इतना ही मालूम था कि इस धरती पर पैदा हुई हर लड़की की एक न एक दिन शादी होती है, इसलिए उसकी भी शादी की गई है। बस उसकी शादी कुछ अलग तरह की है, जिसमें न तो बैंड-बाजा बजा, न घोड़ी पर सवार दूल्हा आया, न ही उसके मायके वालों ने उसे घर-गृहस्थी के साजों-समान के साथ विदा किया।

बस पांच-छः पुरुष आये, मालाओं का आदान-प्रदान हुआ। एक आदमी ने उसके पिता को पैसे दिये कितने, उसे मालूम नहीं। बस चली आई उस देश में जहाँ की बोली और खानपान से उसका कुछ ख़ास परिचय नहीं। उसे किसी से कोई शिकवा थी न शिकायत। उसे मायके और ससुराल दोनों में मजदूरी करनी थी और घर में चौका-बासन, बस आज तक यही सब कर रही है। सुमन के दो बच्चे हैं 6 साल का रोशन और 4 साल का राम, दोनों आँगन में ही कंचे खेल रहे हैं। बच्चों की तरफ देखती हुई सुमन ने टूटी-फूटी हिंदी में कहा, “मेरी माँ अब इस दुनिया में नहीं है, वह होती तो शायद मैं इतनी दूर न ब्याही जाती।”

फिर एक बड़ी सी सांस ले कर चुप हो गयी. यह एक लड़की का अपनी माँ पर विश्वास था जिसके बल पर संसार भर की लड़कियां अपने दुःख की घड़ियाँ काट लेती हैं। पिता अपनी बेटियों के साथ तो होते है पर माँ का स्नेह तो हर मर्ज़ की दवा है किसी देवी की तरह माँ का हाथ हमेशा आशीर्वाद की मुद्रा में तना रहता है।

मगर इस कड़वी सच्चाई से भी इंकार नहीं है कि यदि सुमन की माँ आज के दिन जीवित होती तो भी सुमन का भविष्य सुव्यवस्थित नहीं हो सकता था। होता भी कैसे? दिहाड़ी मजदूरी कर दिन-भर की रोटी का जुगाड़ करने वाला सुमन के बेहद गरीब परिवार के पास विकल्प के नाम पर केवल बेबसी ही थी।

‘बिहार में मजदूरी भी बहुत कम मिलती है वहां जीवन काफी कठिन था इसलिए हम हरियाणा आ गए।’ सुमन ने बिना पूछे ही इस प्रश्न का उतर दे डाला। ‘माहरे छोरे का ब्याह कोनी हो था जिद्दे हम काली-गौरी किसी भी छोरी लाण खातर राज़ी हो गए।’

इस बार सुमन की सास बोली, ‘आपको सुमन के बारे में कैसे पता चला?’ सुरेन्द्र के पिता रमेश जिस फैक्टरी में चौकीदार हैं, वहीं पर कुछ महीने सुमन के परिवार ने भी दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम किया था, वहीँ अविवाहित सुमन के बारे में पता चला, वह भी अपने पिता और दो भाइयों और दो छोटी बहनों के साथ मजदूरी करती थी।

सुरेन्द्र के पिता ने उसे वहीं पर काम करते हुए देखा, पूछताछ की और फिर मन पक्का कर लिया कि इसे अपने बेटे के लिए लिवा आते हैं। बेटे का घर बस जायेगा, रिश्ते नहीं आ रहे और उसकी उम्र बढ़ती चली जा रही है।

‘हामनै सोचया कद्दे म्हारा छोरा रांडा न रह जा’ सुमन के ससुर ने कहा, ‘म्हारे पल्लै जमीन भी घाट सै’. सुमन तुम खुश हो? पूछने पर सुमन चुप रहती है फिर घड़ी भर बाद बोल उठती है ‘यह कुछ काम नहीं करता सारा दिन शराब पीता है।’ उसका इशारा अपने पति सुरेन्द्र की तरफ था।

जब कभी सुमन उसे अधिक शराब न पीने के लिए टोकती है तो सुरेंद्र उसे मारने लगता है। यदि सुमन के सास-ससुर अपनी बहू का साथ नहीं देते तो इस अजनबी प्रदेश में उसका जीवन मुश्किल हो जाता।

‘कोई रिश्ता नहीं आता था न ही आने की आस थी। शादी में 30-35 हज़ार का खर्चा आया था, हमने ही खर्चा किया। मैं इसे किसी बात का ताना नहीं देती, जब ब्याह कर आए है तो ख्याल रखना ही पड़ेगा।’ यह सुमन की सास थी।

‘जीवन ठीक ही चल रहा है, दोनों बच्चे सरकारी स्कूल में जाते हैं। मैं अपनी छोटी बहनों को हरियाणा लाना चाहती हूँ, ताकि वे आस-पड़ोस में रहें तो अपने लोगों के साथ दिल बहल जाए। लेकिन मैं देखभाल कर अपने बहनों को आने दूंगी कि कहीं लड़का शराबी न हो।’

सुमन का डर वाजिब है। यह ठीक है कि सुमन अब इस माहौल में रम गई है, पर अपना देश तो अपना देश है। उसे अपने कच्चे घर की बहुत याद आती है, खासकर अपनी बचपन की सहेलियों की जिनके साथ खेलते हुए कभी यह ख्याल करीब नहीं फटकता था कि कभी उसे अपने गाँव से बाहर भी कदम रखना होगा। सच में जीवन एक भार है जिसे सुमन जैसी स्त्रियाँ चुपचाप ढोने को मजबूर हैं, क्योंकि मसीहा केवल धर्म ग्रंथों में हैं धरती पर उनके उतरने की कहीं कोई सम्भावना नहीं।

गौरी का कहानी भी सुमन से जुदा नहीं वह भी इसी गाँव के यादव परिवार में ब्याही गयी है। त्रिपुरा की गौरी ने पांचवी तक पढाई की है और उसका पति सूरज नौवी पास है। अपनी बुआ की मार्फ़त उसकी शादी हरियाणा में हुई, बुआ ने सूरज की तस्वीर दिखा कर उसकी राय जाननी चाही। गौरी ने हाँ में सिर हिला दिया और इस घर में आ गई।

पिता त्रिपुरा में ईंट पाथने का काम करते हैं छः भाई-बहनों में गौरी सबसे बड़ी है। ‘मेरे पिता मुझसे सब बहन भाईयों में सबसे अधिक प्यार करते हैं गरीबी के कारण ही मेरी शादी यहाँ करनी पड़ी वरना नज़दीक ही किसी गाँव में करते।’

वैसे यहाँ कोई तकलीफ नहीं, घर भी पक्का है। हमारे यहाँ तो कच्चे घर और खपरैल ही हुआ करते हैं। तेज़ आंधी तूफ़ान आने पर छते उड़ जाती हैं, हमारे वहां की औरतें अधिक काम नहीं करती पर यहाँ हरियाणा में तो औरते खेतों में भी जाती हैं और घर-बाहर और पशुओं का काम भी खुद ही करती हैं।

सूरज के बारे में पूछने पर गौरी कुछ शरमा कर कहती है, मेरा पति देखने में बहुत सुंदर है टेम्पो चलाता है, कभी-कभी शराब भी पी लेता है लेकिन किसी को कुछ नहीं कहता, कोई शोर-शराबा नहीं करता, चुपचाप आकर सो जाता है।

‘हमारे लड़के की हिस्से में सिर्फ आधा किल्ला ही है वो भी ठेके पर दे रखा है, जब सूरज की उम्र हो गयी और उसके लिए रिश्ते नहीं आए तो हमें बहुत फ़िक्र हुई, हम कहीं से काली-पीली लड़की नहीं लाने वाले थे, लेलिन एक दिन गौरी की बुआ जो पास के गाँव में ही ब्याही है और उसके फूफा घर आए और बात पक्की कर गए।

सूरज तो दूसरे प्रदेश की लड़की से ब्याह की बात पक्की कर देने से इतना गुस्सा था कि नाराज़गी के कारण दस-बारह दिन घर नहीं आया। टेम्पो लेकर बाहर ही भटकता रहा, लेकिन जिस दिन घर आया उस दिन पिता और दादा ने बहुत समझाया और अगले ही दिन शादी कर दी। शादी में कुल चालीस हज़ार का खर्चा हुआ। शादी को दो साल हो गए, हम खुश है बहू सुंदर और सलीके वाली है। घर को साफ़ रखती है, सारे काम भाग-भाग कर करती है। अभी पेट से भी है, बड़सी वाले बाबा ने कहा है छोरा ही होगा।’

ये दोनों किस्से कुछ मिला कर यही बताते हैं कि लड़की पूरी उम्र समाज की कारस्तानी की सजा पाती है, उसकी मर्जी का कहीं कोई मोल नहीं। एक मूक गाय की तरह एक खूंटे से दूसरे खूंटे पर बाँध दी जाती है, त्रिपुरा से हरियाणा में ब्याह कर आयी गौरी भी घर के लिए अपने दिन-रात एक किये रहती है। नियम से खेतों में जाती है, घर में नलके की व्यवस्था होते हुए भी बड़ा सा घूँघट निकाल कर पानी लाने जाती हैं, क्योंकि उसके ससुर को पीने के लिए कुएं का पानी पसंद है। (फोटो : प्रतीकात्मक)