Last Update On : 21 05 2018 12:04:00 PM

मजदूर कवि साबिर हका का जन्‍म 1986 में ईरान के करमानशाह में हुआ। अब वह तेहरान में रहते हैं और इमारतों में निर्माण-कार्य के दौरान मज़दूरी करते हैं। साबिर हका के दो कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। एक इंटरव्‍यू में साबिर ने कहा था, ‘मैं थका हुआ हूं। बेहद थका हुआ। मैं पैदा होने से पहले से ही थका हुआ हूं। मेरी मां मुझे अपने गर्भ में पालते हुए मज़दूरी करती थी,मैं तब से ही एक मज़दूर हूं। मैं अपनी मां की थकान महसूस कर सकता हूं। उसकी थकान अब भी मेरे जिस्‍म में है।’ आइए पढ़ते हैं साबिर हका की कविताएं-

शहतूत
क्‍या आपने कभी शहतूत देखा है,
जहां गिरता है, उतनी ज़मीन पर
उसके लाल रस का धब्‍बा पड़ जाता है।
गिरने से ज़्यादा पीड़ादायी कुछ नहीं।
मैंने कितने मज़दूरों को देखा है
इमारतों से गिरते हुए,
गिरकर शहतूत बन जाते हुए।

ईश्‍वर
ईश्‍वर भी एक मज़दूर है
ज़रूर वह वेल्‍डरों का भी वेल्‍डर होगा
शाम की रोशनी में
उसकी आंखें अंगारों जैसी लाल होती हैं,
रात उसकी क़मीज़ पर
छेद ही छेद होते हैं।

आस्‍था
मेरे पिता मज़दूर थे
आस्‍था से भरे हुए इंसान
जब भी वह नमाज़ पढ़ते थे
ख़ुदा उनके हाथों को देख शर्मिंदा हो जाता था।

(कविताओं का अनुवाद गीत चतुर्वेदी ने किया है। ये कविताएं वत्सानुराग ब्लॉग से साभार।)