Last Update On : 15 05 2018 10:48:00 AM

अर्द्धसत्य अौर असत्य मोदी का सबसे बड़ा हथियार होता है, जिसे वे इतिहास के मैदान से चुन-चुन कर लाते हैं। लेकिन इतिहास ही उनका हर वार तुक्का साबित करता जाता है…..

अनेक ऐतिहासिक प्रसंगों को झूठ के साथ मोदी कैसे पेश करते हैं बता रहे हैं ख्यात गांधीवादी और विचारक कुमार प्रशांत

सेवाग्राम की बापू-कुटी के भीतर की एक दीवार पर, जिसके सम्मुख गांधीजी बैठा करते थे, कुछ सुवाक्य लिख कर टांगे हुए हैं। वे अाज के नहीं हैं, बापू के वक्त के हैं। उसमें एक वाक्य कहता है कि झूठ कई तरह से बोला जाता है – मौन रखकर भी अौर अांखों के इशारों से भी। वचन से बोले गये झूठ की अपेक्षा इन दो प्रकारों से बोला गया झूठ ज्यादा खतरनाक होता है।

पता नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी यह सुवाक्य पढ़ा है या नहीं लेकिन अाज हर कोई उनका इस मानी में मुरीद है कि वे किसी भी तरह का असत्य सत्य की मुद्रा में बोल सकते हैं। यह महारत बहुत कम लोगों में होती है (इसके लिए हमें भगवान को धन्यवाद देना चाहिए!)

चुनावी मौसम हो तब तो प्रधानमंत्री मोदी की यह कला बला की परवान चढ़ती है। वे इस सुवाक्य में पूरा यकीन करते हैं कि युद्ध व प्यार में सब कुछ जायज होता है; अौर कौन कहेगा कि चुनाव युद्ध का ही दूसरा नाम नहीं है? फिर यह भी कि जैसे प्यार में कोई एक होता है कि जो अापके होने का कारण होता है, वैसे ही युद्ध में कोई एक होता है जो अापके निशाने पर होता है।

भारत के 15वें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निशाने पर हैं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू! वे हर हथियार से, हर कहीं नेहरू पर प्रहार करते हैं। अर्द्धसत्य अौर असत्य उनका सबसे बड़ा हथियार होता है जिसे वे इतिहास के मैदान से चुन-चुन कर लाते हैं। लेकिन इतिहास ही उनका हर वार तुक्का साबित करता जाता है। प्रधानमंत्री इतिहास का यह गुण नहीं पहचानते हैं शायद कि वह न तो सदय होता है, न निर्दय; वह तटस्थ होता है। यही जवाहरलाल नेहरू की ताकत है, यही नरेंद्र मोदी की कमजोरी!

प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी ने गुजराती कार्ड खेला था अौर सरदार पटेल व नेहरू की कुश्ती करवाई थी। वे ऐसा प्रचारित करने में जुटे रहे कि जैसे जवाहरलाल किसी तिकड़म से देश के पहले प्रधानमंत्री बन गये थे। तोड़-मरोड़ कर कही गई उनकी सारी बातें खोखली साबित हुईं, क्योंकि वे यह सच कभी बोल ही नहीं पाये कि सही या गलत, देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल का चयन तो महात्मा गांधी ने किया था; अौर मुख्यमंत्री की या किसी दूसरी सत्ता की अाड़ में छिपकर नहीं, कांग्रेस कार्यसमिति के खुले मंच पर बैठ कर किया था। और यह जानते हुए किया था कि देश की अधिकांश प्रांतीय कांग्रेस समितियां सरदार पटेल के पक्ष में हैं।

तो गुजराती मोदी को लड़ाई लड़नी हो तो गुजराती महात्मा गांधी से लड़नी चाहिए, जवाहर लाल नेहरू से नहीं। अौर गांधी ने ऐसा करके यह बतलाया कि लोकतंत्र केवल संख्यासुर का गणित नहीं होता है; गुणवत्ता की तुला पर भी उसे तोलना पड़ता है।

यहां पिटे नरेंद्र मोदी ने फिर यह सच खोज निकाला कि सरदार की मृत्यु के शोक में शरीक होने की मनुष्यता भी नेहरू नहीं दिखा सके। एक गुजराती की ऐसी उपेक्षा? लेकिन वे उस फोटो का जवाब नहीं दे सके जिसमें सरदार के पार्थिव शरीर के पास शोकग्रस्त जवाहरलाल को सबने देखा!

 सरदार के निधन पर लोकसभा में उन्हें दी गई जवाहरलाल की श्रद्धांजली का हर एक शब्द इन दो महापुरुषों के रिश्तों की ऊंचाई व गहराई का दस्तावेज ही है। मतभेद, तो वे तो थे; लेकिन दोनों ने बापू की खींची उस लक्ष्मण-रेखा को कभी पार नहीं किया जिसे 30 जनवरी 1948 को गांधी ने तब खींची थी, जब हमारी गोली खाने से ठीक पहले सरदार उनसे मिले थे।

उन्होंने गांधी से कहा था कि अब वे जवाहरलाल की सरकार से त्यागपत्र देना चाहते हैं। गांधी ने देर होती अपनी प्रार्थना की तरफ बढ़ते हुए अंतिम वाक्य यही कहा था कि यह तो सरदार वाली बात नहीं हुई! बस, उस दिन से अंतिम सांस तक सरदार सरदार ही बने रहे; सरदार यानी जो मोर्चे से पांव पीछे खींचता ही नहीं है।

जवाहरलाल पर उन्होंने परिवारवाद का अारोप लगाया लेकिन इस सच को वे कहां छुपा कर रखते कि जवाहरलाल के बाद उनकी बेटी नहीं, लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री चुने गये थे; अौर ताशकंद में अगर शास्त्रीजी की अचानक मौत नहीं हुई होती (इसके पीछे नेहरूजी का हाथ था, ऐसा अारोप अभी तक तो नहीं है न!) तो इंदिरा गांधी के लिए प्रधानमंत्री बनना कभी शक्य नहीं होता।

अौर शास्त्री जी की मृत्यु के बाद, मोरारजी देसाई को पीछे कर इंदिराजी को प्रधानमंत्री बनाया किसी जवाहरलाल ने नहीं, बल्कि कामराज नडार की कमाल की खोपड़ी ने! इतिहास की तटस्थ गवाही यहां भी पढ़ी जा सकती है।

अभी-अभी कर्नाटक के चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी को फिर जरूरत पड़ी कि प्रांतीयता की संकीर्णता को उभार कर जितना बटोर सकें, वोट बटोरें; तो उन्होंने एक सार्वजनिक सभा में असत्य की झड़ी लगा दी। उन्होंने कहा कि कर्नाटक के दो लालों को नेहरूजी ने अाजीवन अपमानित किया। कौन थे ये दो लाल? जनरल थिमैया अौर जनरल करियप्पा।

अाजादी के बाद की भारतीय सेना का इतिहास जब भी अौर जो भी लिखेगा, इन दो नामों को छोड़ नहीं सकता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि 1948 में पाकिस्तान से युद्ध में, कश्मीर को बचाने का अभूतपूर्व कार्य करने वाले भारतीय सेना के चीफ जनरल थिमैया को नेहरू अौर उनके रक्षामंत्री कृष्ण मेनन ने इतना जलील किया कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

यह मोदी मार्का इतिहास यदि बच्चे पढ़ने लगें तो उन्हें यह कैसे पता चलेगा कि 1948 में हमारी सेना के चीफ थिमैया थे ही नहीं, एक अंग्रेज जनरल रॉय बुखर थे? तब कृष्ण मेनन नहीं, सरदार बलदेव सिंह देश के रक्षामंत्री थे। थिमैया साहब 1957 में सेना प्रमुख बने अौर 1961 में, अपना कार्यकाल पूरा कर विदा हुए।

जनरल थिमैया से नेहरू की अच्छी बनती थी अौर वे नेहरू ही थे जिन्होंने अवकाश प्राप्ति के बाद थिमैया साहब को विशेष भारतीय कार्यदल का प्रमुख बना कर कोरिया भेजा था। थिमैया सेना के उन चुनिंदा लोगों में थे जिन्हें नेहरू सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया था। फिर प्रधानमंत्री ने जेनरल करियप्पा का प्रसंग उठाया अौर चीखती हुई अावाज में कहा कि 1962 में चीन से युद्ध में सेना प्रमुख पराक्रमी जनरल करियप्पा के साथ नेहरू ने कैसा दुर्व्यवहार किया!

अब कोई उन्हें इतिहास की वह किताब दिखाए कि जो नागपुर से प्रकाशित नहीं हुई हो कि 1962 में भारत-चीन युद्ध से 9 साल पहले ही जनरल करियप्पा रिटायर हो चुके थे। करियप्पा साहब स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय सेना प्रमुख थे अौर उन्हें यह पद नेहरू सरकार ने दिया था।

प्रधानमंत्री नेहरू के साथ करियप्पा साहब के मतभेद थे अौर यह सारे देश को पता था, लेकिन उनके साथ कोई बदसलूकी नहीं हुई थी। 1986 में वह राजीव गांधी की सरकार थी जिसने करियप्पा साहब को देश का पहला फील्ड मार्शल बना कर सम्मानित किया था।

असत्य दो तरह का होता है – सफेद अौर काला! समाज में दोनों के विशेषज्ञ हैं अौर वे अपनी कला का प्रदर्शन करते ही रहते हैं। लेकिन एक असत्य अौर भी होता है – विषैला असत्य! यह समाज की जड़ में मट्ठा डालता है। चुनाव कोई भी जीते, ऐसे असत्य से समाज हारता ही है। हम इसी मुहाने पर खड़े हैं।