प्रतीकात्मक फोटो

9वें दशक के बाद जिन लेखकों ने कविता और कहानी में समान रूप से पहचान बनाई उनमें संजय कुंदन प्रमुख हैं। वे साहित्य की दुनिया में कवि के रूप में आये थे, लेकिन जल्द ही उन्होंने एक अच्छे कहानीकार के रूप में पहचान बनाई। अब उन्होंने उपन्यास की विधा में भी कदम रखा है। चुप्पी का शोर, बॉस की पार्टी उनकी चर्चित किताबें हैं।पेशे से पत्रकार संजय कुंदन अपनी गहरी सामाजिक दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। वे अपनी प्रतिबद्धता का ढोल नहीं पीटते हैं, पर अपनी बात बेबाकी से कह जाते हैं। उनकी रचना का यथार्थबोध बहुत तीखा होता है और राजनीति नौकरशाही पूंजीपति और पत्रकारिता के गठबंधन पर लगातार प्रहार करते रहते हैं। इस तरह वे मौजूदा व्यवस्था को नंगा करते रहते हैं। ‘कत्ल की रात’ उनकी ऐसी ही कहानी है, जिसमें तीन पुराने दोस्त बीस साल के बाद मिलते हैं और व्यवस्था को बदलने की बात करते हैं, लेकिन अंत में क्या होता है। आज पढ़ते हैं उनकी कहानी ‘कत्ल की रात‘— विमल कुमार वरिष्ठ पत्रकार और कवि

           संजय कुंदन

कत्ल की रात

करीब पचीस वर्षों के बाद मिले थे वे तीन दोस्त- प्रकाश कांत, आईपीएस, प्रोफेसर कृष्ण बिहारी और पत्रकार अवध किशोर। हालांकि हमेशा मिलते रहने और एक-दूसरे से संपर्क में रहने की कसमें कई बार खाई थीं उन्होंने, पर जिदंगी की आपाधापी में जवानी के सारे संकल्प धरे रह गए। समय के थपेड़े ने उन्हें बहाकर एक-दूसरे से बहुत दूर कर दिया। अलग होने के तत्काल बाद के कुछ वर्षों में वे एक-दूसरे को चिट्ठी लिखते थे, पर धीरे-धीरे यह सिलसिला खत्म हो गया।

कुछ महीने पहले रिश्तों के तार फिर जुड़े। फेसबुक पर उन्होंने एक-दूसरे को खोज निकाला। इस तरह सोशल मीडिया ने संभव किया कि वे एक बार फिर मिलें। प्रो. कृष्ण बिहारी के बेटे की शादी तय हुई तो उन्होंने निश्चय किया कि वे अपने पुराने दोस्तों को जरूर न्योता भेजेंगे। हालांकि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि अति व्यस्त रहने वाले वे दोनों मित्र उनके घर आएंगे। पर वे आ गए, उनकी आशा के विपरीत।

कभी-कभार वे तीनों दोस्त इस दिन की कल्पना किया करते थे, ‘जरा सोचो, हम लोग बीस-पच्चीस साल बाद मिलेंगे तो कैसा लगेगा यार!’ उन्होंने कल्पना के आकाश में उड़ने की कोशिश की लेकिन सुदूर भविष्य की कोई तस्वीर उनके मन के कैनवास पर नहीं बन पाई। आज जब उन्होंने एक-दूसरे को देखा तो थोड़ा झेंपे, थोड़ा हिचके। अपने दोस्तों का यह रूप उनकी कल्पना से परे था। घुंघराले बालों वाला प्रकाश इस तरह गंजा हो जाएगा, यह कृष्ण ने नहीं सोचा था और मरियल दिखने वाला कृष्ण बड़ी सी तोंद लेकर उनका स्वागत करेगा, यह प्रकाश के लिए हैरत का विषय था। और अवध के चेहरे पर इतनी झुर्रियां, यह बाकी दोनों के लिए झटके की तरह थी। इसी तरह संवाद भी पहले की तरह बेधड़क नहीं शुरू हो गया। शुरू में तीनों थोड़ा औपचारिक रहे। संबंधों पर जमी पच्चीस साल की मिट्टी हटने में थोड़ा वक्त तो लगना ही था। फेसबुक पर संवाद में और आमने-सामने बातचीत में फर्क तो होता ही है।

यह संयोग था कि प्रकाश और अवध दोनों साथ ही साथ पहुंचे। कृष्ण उन्हें अपने ऊपर के कमरे में ले गए और बताया कि दोनों के रहने का इंतजाम यहीं पर है। दोनों फ्रेश होकर नीचे आ जाएं।

दिनभर सगाई समारोह चलता रहा। कृष्ण समारोह में काफी व्यस्त रहे। लड़की वालों के अलावा अन्य मेहमानों की खातिरदारी पर उनका विशेष ध्यान था, लेकिन शाम ढलते ही वह अपने दोनों मित्रों के साथ ऊपर वाले कमरे में बंद हो गए। अरसे बाद तीनों दोस्त साथ थे। कई मिनट तक वे एक-दूसरे को देखते रहे। फिर अचानक सबने ठहाका लगाया। अवध ने कहा, ‘यार हम कितना बदल गए हैं। कभी सोचा था कि हम ऐसे हो जाएंगे एक दिन..।’ कृष्ण ने पूछा, ‘अच्छा, यह बताओ क्या लोगे? जो भी लेना हो, बता दो। मैंने शानदार बार बना रखी है। देखोगे तो आंखें फटी रह जाएगी।’

‘क्यों न अपना वाला ब्रांड लिया जाए।’ प्रकाश ने कहा।

‘अच्छा… वो बूढ़ा संन्यासी?’ अवध ने कहा और जोर से हंसे।

‘हां, ओल्ड मौंक रम ही पिलाओ।’ प्रकाश ने कहा, ‘इसी से तो हमारी वर्जिनिटी टूटी थी।

‘वर्जिनिटी।’ यह कहकर तीनों एक साथ हंसे।

‘याद है पहली बार हमने शराब किस तरह चखी थी?’ कृष्ण ने पूछा।

‘अरे बाप रे। मेरी तो हालत खराब हो गई थी। लेकिन तुमने गजब प्लानिंग की थी।’ प्रकाश ने कृष्ण की ओर देखकर कहा। अवध ने कुछ याद करने की कोशिश करते हुए कहा, ‘कहां गए थे हमलोग?’

‘अरे फिल्म हॉल में। होली का दिन था। मैंने बोतल खरीदी थी। फिर शो शुरू होते ही मैं बोतल लेकर बाथरूम में आ गया। वहां दो घूंट मारी, फिर प्रकाश आया। इसने दो बार धीरे से दरवाजा खटखटाया। मैं इसे बोतल देकर चला गया। फिर तुम आए।’

‘हां, हां, लेकिन मेरे लिए कुछ बचा कहां था..। अवध ने याद करते हुए कहा।

‘फिर भी साले तुम ही सबसे ज्यादा टुन्न थे।’ प्रकाश ने कहा।

‘सच्चाई यह थी कि हॉल में बैठे आधे लोग टुन्न थे उस दिन। हर सीन पर ताली, सीटी। कोई गा रहा था तो कोई कुछ…।’ यह कहकर कृष्ण दरवाजा खोलकर थोड़ी देर के लिए बाहर गए फिर लौट आए।

‘भाभीजी ने बुलाया था क्या…?’ अवध ने पूछा।

‘अरे नहीं…। अब हमारे यहां रम मिलना मुश्किल है। वही इंतजाम करवा रहे हैं। बस दस मिनट में भाई लेकर आ रहा है।’ कृष्ण बोले।

‘कितने दिन बाद इस तरह सुकून से बैठा हूं। याद नहीं आ रहा कितने दिन बाद। संयोग से खाली हूं आजकल.. सो चला आया।’ प्रकाश ने लंबी सांस लेकर कहा।

‘क्या जिंदगी हो गई है हम लोगों की।’ अवध यह कहकर अपनी जेब टटोलने लगे, फिर कहा, ‘सिगरेट कहीं रख दी मैंने।’ कृष्ण ने सिगरेट का पैकेट उछाल दिया और कहा, ‘यह लो।’ तीनों ने सिगरेट सुलगा ली। अवध ने धुआं छोड़ते हुए कृष्ण से पूछा, ‘और ससुर बनने पर कैसा लग रहा है?’ ‘कुछ खास नहीं। कुछ साल पहले तक सोचकर बड़ा अजीब लगता था कि एक दिन मेरे बेटे की शादी हो जाएगी, मेरी बहू आ जाएगी। बड़ा अजीब सा लगेगा, पर अब जबकि ये चीजें एकदम सामने हैं, सामान्य सा ही लग रहा है।’ कृष्ण ने जवाब दिया।

प्रकाश ने सिगरेट की राख झाड़कर कहा, ‘ठीक कह रहे हो। … अंदर से कुछ बदलता नहीं यार। जरा सोचो, जब हमलोग स्कूल में थे, तो सोचते थे कि कॉलेज में जाकर न जाने कैसा लगेगा, कॉलेज में सोचते थे जब शादी हो जाएगी, बच्चे हो जाएंगे, तो पता नहीं हम कैसे हो जाएंगे। आज हम लोग बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े हैं, अंदर से कोई फर्क नहीं आया। मुझे तो लगता है आज भी मैं वही हूं। मेरे भीतर वही फीलिंग अब भी है जब हम हॉस्टल में रहा करते थे।’

‘कुछ दिन पहले तक जब कोई अंकल कह देता था तो बड़ा बुरा लगता था। लगता था सिर पर हथौड़ा पटक रहा है। लेकिन अब तो आदत हो गई है। …दो साल पहले जब तबियत खराब हुई तब यह जरूर महसूस हुआ कि शरीर अब पहले जैसा नहीं रहा। अब पहले की तरह बहुत देर पैदल नहीं चल सकते। थकान हो जाती है।’

‘लेकिन मन तो वही है न…।’ प्रकाश ने टोका।

इस पर अवध ने मुस्कराकर कहा, ‘हां, मन तो वही है। मन कभी बूढ़ा नहीं होता। अब देखो खाने—पीने में कई बंदिशें हैं, लेकिन क्या करें। मुझे समोसे की महक बेचैन कर देती है। मान लो मैं कहीं जा रहा हूं और आसपास कहीं समोसे तले जा रहे हों, तो मैं जरूर खरीद लेता हूं। भले मैं खाऊं या नहीं। लगता है दुनिया का हर समोसा मेरे ही लिए तला जा रहा हो।’

प्रकाश ने कृष्ण की ओर देखकर कहा, ‘लेकिन प्रोफेसरों का मामला कुछ और है। उनका मन जल्दी बुढ़ा जाता है।’

‘क्यों, क्यों?’ कृष्ण ने पूछा।

‘टीचिंग में जल्दी बुजुर्गियत आ जाती है। बंदे को लगता है कि वह सबका गुरु है। सब उससे छोटे ही हैं। पता चला कि कोई आंटी जी पीएचडी करने आ गईं। वो भी सर सर बोल रही हैं।’ प्रकाश ने कहा।

इस पर तीनों ने जोर का ठहाका लगाया। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और फिर दो सज्जन अंदर आए। उन्होंने रम और सोडे की कई बोतलें, और तीन-चार ग्लास सेंटर टेबल पर रखी। उनके पास दो प्लेंटें भी थी। एक में कटे हुए खीरे, टमाटर थे तो दूसरे में भुने हुए पापड़। सारा समान रखकर दोनों चले गए। उनके जाते ही तीनों दोस्त टेबल के इर्द-गिर्द जम गए। उन्होंने फठाफट ड्रिंक्स तैयार की और पीने लगे। इस बीच कृष्ण ने अंदर से दरवाजा बंद कर दिया।

‘लगता है, हम अपने हॉस्टल के कमरे में हैं।’ प्रकाश ने कहा।

‘कहीं दीनानाथ सर न आ जाएं…।’ कृष्ण की इस बात पर फिर जोर का ठहाका लगा।

‘यार वो गए ऊपर।’ अवध ने हाथ ऊपर की ओर करके कहा।

‘क्या वे नहीं रहे?’ प्रकाश के इस सवाल पर अवध ने कहा, ‘हां, दो-तीन साल पहले गुजर गए बेचारे।’

‘उनके जैसे आदमी को हॉस्टल सुपरिटेंडेंट नहीं बनना चाहिए था।’ प्रकाश ने पापड़ का एक टुकड़ा तोड़ते हुए कहा, ‘उनसे कोई डर ही नहीं सकता था। वो डांटते थे तो हंसी आती थी।’

‘उस दिन गजब हुआ जब अंधे ब्लू फिल्म देख रहे थे।’ कृष्ण ने एक सिप लेकर कहा।

‘अंधे ब्लू फिल्म देख रहे थे?’ प्रकाश ने चौंककर पूछा तो कृष्ण ने जवाब दिया, ‘तुम नहीं थे क्या उस दिन… अरे, ब्लाइंड हॉस्टल में लड़के ब्लू फिल्म लेकर आए थे। दीनानाथ सर को पता चला तो बनियान पहने ही दौड़े आए।’

कृष्ण की इस बात पर तीनों बड़ी देर तक हंसते रहे। जब उनकी हंसी थमी तो कृष्ण बोले, ‘सबसे मजेदार सीन वो था, जब सर ने सारे लड़कों को लाइन में खड़ा कर दिया। हर कोई अपनी सफाई दे रहा था, मैं नहीं था सर, मैं नहीं था सर।’

‘लेकिन यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही कि अंधे और ब्लू फिल्म …।’ यह कहकर प्रकाश घूंट लेने लगे।

अवध ने खीरे का एक टुकड़ा मुंह में लिया और कहने लगे, ‘अब उस समय भाड़े पर वीसीआर मिलता था। तब लोग फिल्म मंगाकर देखते थे घरों में। …अब तो हर आदमी जब चाहे मोबाइल पर जो चाहे देख रहा है।’

‘ उस दिन दीनानाथ सर ने कई कड़े नियम बना दिए।’ यह कहकर कृष्ण नई पेग बनाने लगे। ‘यह अलग बात है कि उनका पालन वे करवा नहीं पाए।’

अवध ने घूंट लेते हुए कहा, ‘उस आदमी की बेबसी पर मुझे तरस आता था। सोचो, एक आदमी अनुशासन लाना चाहता था, सबकुछ ठीक करना चाहता था, पर कर नहीं पा रहा था। …असल में सिस्टम उसका साथ नहीं दे रहा था। वह अकेला पड़ गया था।’

प्रकाश ने अपनी पेग बनाते हुए कहा,‘दरअसल वही दौर था, जब चीजें खत्म होने लगी थीं, हमारा वैल्यू सिस्टम चरमराकर बिखर रहा था। यूनिवर्सिटीज तो उसका एक नमूना थी। पूरे देश में यही हो रहा था। आज उसका चरम रूप देखने को मिल रहा है।’

थोड़ी देर के लिए चुप्पी पसर गई। तीनों शराब पीते रहे। अवध ने कुछ देर बाद चुप्पी तोड़ी, ‘दीनानाथ सर इस बात से डरे रहते थे कि कोई उनकी बेटी पर लाइन न मारने लगे…।’

‘उलटा बोल रहे हो, वह इस बात से डरे रहते थे कि कहीं उनकी लड़की ही किसी पर डोरे न डालने लगे।’ प्रकाश ने पापड़ उठाते हुए कहा।

‘सीनियर थी हम लोगों से…।’ अवध ने कृष्ण की ओर देखकर कहा। कृष्ण ने नई बोतल खोलते हुए कहा, ‘बैचमेट भी होती तो क्या कर लेते।’

‘एमए के एक लड़के को थप्पड़ मार दिया था उसने।’ प्रकाश ने कृष्ण की ओर अपना ग्लास बढ़ाते हुए कहा।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। तीनों दोस्त संभले। कृष्ण ने उठकर दरवाजा खोला। वही सज्जन फिर आए, जो शराब देकर गए थे। इस बार उनके हाथ में एक प्लेट थी, जिसमें गर्मागर्म पकौड़े थे। वे कृष्ण को प्लेट थमाकर चले गए। कृष्ण ने दरवाजा बंद कर लिया और प्लेट टेबल पर रखी। अवध ने सबसे पहले एक पकौड़ा उठाया और एक टुकड़ा काटकर कहा, ‘टेस्टी। ….भाभीजी ने बनाया है?’

कृष्ण ने हाँ की मुद्रा में सिर हिलाया तो अवध बोले, ‘तुम भाग्यशाली हो बेटा कि तुन्हें एक अच्छी बीवी मिली। इतना अच्छा खाना बनाने वाली।’

इस पर कृष्ण बोले, ‘लेकिन उसने नॉनवेज खाना छुड़वा दिया।’

‘अच्छा, वह नॉनवेज नहीं खातीं?’ प्रकाश ने पूछा।

‘बिल्कुल नहीं।’ यह कहकर कृष्ण ने भी एक पकौड़ा उठाया, ‘ये जो पकौड़ा है न, बेसन में नहीं तला गया है। इसे तलने के लिए पिसे हुए चावल का इस्तेमाल किया गया है।’

‘मजा आ गया।’ प्रकाश ने कहा, ‘भाभीजी को बहुत-बहुत धन्यवाद। …तो क्या तुमने नॉनवेज खाना एकदम छोड़ दिया।’

‘कभी-कभी बाहर खाता हूं।’ कृष्ण ने जवाब दिया, ‘जानते हो तुम लोगों की भाभी इस बात से परेशान थी कि कहीं हमारी नॉन वेजेटेरियन बहू न आ जाए। लेकिन मेरे बेटे ने शाकाहारी बहू चुनी है।’

‘बेटा हो तो ऐसा…।’ अवध ने जोर से कहा।

‘तुम्हारे बेटे-बहू दोनों क्यूट हैं।’ प्रकाश ने कहा और उठकर कमरे से लगे बाथरूम में घुस गए। कृष्ण ने अवध के ग्लास की ओर गौर से देखा और कहा, ‘तुम और क्यों नहीं ले रहे?’

अवध बोले, ‘अब नहीं। डॉक्टर ने मना किया है ज्यादा पीने से।’

‘आज वह सब नहीं चलेगा, पत्रकार महोदय। और लीजिए।’ कृष्ण ने अवध के ग्लास में थोड़ी और शराब उड़ेली। इस बीच प्रकाश बाथरूम से निकले। उन्हें देखकर कृष्ण ने पूछा, ‘और बॉस, सब ठीक है न।’ प्रकाश के कदम थोड़े लड़खड़ा रहे थे। उन्होंने कृष्ण के कंधे पर हाथ टिका कर संतुलन बनाया और बोले, ‘याद है, जिस रात हम पीने का प्रोग्राम बनाते थे, उसे तुम कत्ल की रात कहते थे। मैं यही सोच रहा था कि आज वर्षों बाद कत्ल की वही रात आई है। काश, यह कभी खत्म न हो। हम बस यूं ही बैठे बातें रहें। मस्ती करते रहें जैसे उन दिनों किया करते थे।’

अवध ने कहा, ‘काश ऐसा हो पाता। पर इस रात की भी सुबह होगी…कल से हमें फिर वही अपनी सड़ी जिंदगी में लौट जाना होगा।’

‘ऐसा क्यों कह रहे हो?’ कृष्ण ने पूछा।

अवध ने अपना ग्लास खाली कर कहा, ‘दो कौड़ी की जिंदगी होती है एक हिंदी पत्रकार की..। इतना डरपोक जीव कोई नहीं होता। दिन रात जान सूखी रहती है कि कल कहीं नौकरी न चली जाए। नौकरी गई तो समझो सीधा सड़क पर आता है बंदा। कोई पूछने वाला नहीं। भीख मांगने की नौबत…।’

‘मैंने तुमसे कहा था कि पीएचडी कर लो, पर तुम्हारे ऊपर पत्रकारिता का भूत सवार था। मैंने समझा तुम मन का काम कर रहे हो।’ कृष्ण ने एक घूंट लेकर कहा।

‘उस जमाने में जर्नलिज्म का यह हाल नहीं हुआ था। अखबारों में पहले सब कुछ कायदे से चलता था। वेतन से लेकर सब कुछ का एक सिस्टम बना हुआ था। यूनियनें हुआ करती थीं, जो पत्रकारों के हित की रक्षा करती थीं। उन दिनों पैसे कम थे पर एक रुतबा था पत्रकारों का। हमारे लिखे हुए का एक मतलब हुआ करता था। पर आज कुत्ता नहीं पूछता हमें। समाज को भी कोई मतलब नहीं रह गया है। महान विचार पेलते रहिए, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। अब समाज को क्या चाहिए, मोबाइल, लैपटॉप, मकान कार। ये सब चीजें प्रमुख हो गई हैं। आप पैसे कमाइए और ये सब चीजें ले आइए। बस हो गया। किसी को पढ़ने-लिखने से कोई लेना-देना नहीं है। हमारे टाइम में चीजें अलग थीं यार..हमारे पापा पांच-पांच अखबार और कई पत्रिकाएं पढ़ते थे। मेरी मां बैठकर शरतचंद्र और दूसरे लेखकों के उपन्यास पढ़ती थी। हम सब भाई-बहनों के लिए अलग से मैगजीनें आती थीं। आज देख लो घरों में क्या हाल है। टीवी पर बेकार के रियलिटी शो देखते हैं परिवार…। आप लिखते रहिए बड़ी-बड़ी बात, लोग उठाकर फेंक देंगे अखबार। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।’

अवध ने झटके से बोतल उठाई और ग्लास में शराब उड़ेल ली, फिर उसी रौ में कहने लगे, ‘पाचीस छबीस साल के लौंडे मैनेजर्स आके हमें सिखाते हैं कि ऐसे पत्रकारिता करो। न्यायालय को अदालत लिखो। ऐसे लिखो कि अखबार का मुनाफा बढ़े। आज छप क्या रहा है देख लो..अमुक ऐक्टर ने कैसा मकान बनवाया, किस एक्ट्रेस ने कुत्ता पाला। किसान आत्महत्या कर ले, यह कोई खबर नहीं है। गरीब का पैसा कोई खा जा रहा है, यह कोई खबर नहीं है।…. दो कौड़ी के अनपढ़ लोग इस फील्ड में आ रहे हैं और नेताओं की दलाली करके निर्णायक पदों पर बैठ जा रहे हैं। उनके पास आज क्या नहीं है और हम जैसे लोगों को देखो… आज तक किराये के मकान में रहते हैं। मैं तो कई बार डर जाता हूं कि अगर मुझे कोई गंभीर बीमारी हो जाए तो क्या होगा…।’

यह कहकर अवध ने ग्लास मुंह से लगा लिया। तभी प्रकाश ने कहना शुरू किया, ‘मुझे देखो , तुमसे ज्यादा बुरा हाल है मेरा। मैंने सोचा था कि पुलिस में जाऊंगा तो गरीबों की मदद करूंगा। भ्रष्टाचारियों से लड़ूंगा। सिस्टम के भीतर रहकर सिस्टम को बदलने की कोशिश करूंगा। तुम दोनों को याद होगा, हमारी लंबी-लंबी बहसें चला करती थीं…।’ यह कहकर प्रकाश थोड़ी देर के लिए रुके और सिगरेट सुलगाने लगे। उन्हे कृष्ण और अवध गौर से देख रहे थे।

प्रकाश ने कहना शुरू किया, ‘क्या मिला… घंटा। इस सिस्टम के ऊपर बैठे लोग कुछ नहीं करने देंगे। वे बड़े मजबूत लोग हैं। ऊपर से नीचे तक एक चेन बनी हुई है उनकी। जब भी मैंने किसी ताकतवर आदमी के ऊपर हाथ डालने की कोशिश की मेरा ट्रांसफर किया गया। एक बार तो दो साल में लगातार दस बार मेरा तबादला हुआ। लोगों को लगता है आईपीएस बहुत बड़ी चीज है, कुछ नहीं। चिरकुट छाप नेता भी आकर धमका जाता है। आप लॉबिइंग नहीं करेंगे तो डाल दिया जाएगा किसी कोने में। पड़े रहिए। एक बार एक खनन माफिया को पकड़ा तो मुझे ही फंसा दिया गया। कई झूठे आरोप लगा दिए गए। किसी कुलीग ने मेरी मदद नहीं की। मैं डिप्रेशन में चला गया। किसी तरह उबर पाया। फिर मुझे लगा छोड़ दो। किसी तरह के सपने मत देखो। लिमिट में रहो। आखिर मैं भी मनुष्य हूं। मेरे भी बाल बच्चे हैं। अब मैं कुछ नहीं बोलता। गड़बड़ियां हो रही हैं होने दो। मैं उसमें शामिल नहीं होऊंगा, पर मैं उसे रोकूंगा भी नहीं। अब क्या लाइफ है मेरी। कभी-कभी सोचता हूं क्यों जी रहा हूं मैं। कुछ दिन बाद रिटायर हो जाऊंगा। नेताओं से यारी तो है नहीं कि मुझे किसी कमिटी का हे़ड या किसी कमिशन का चेयरमैन बना दिया जाएगा। पेंशन से जिंदगी कटेगी। बच्चे बाहर चले गए। मैं और पत्नी रह जाएंगे अकेले मौत का इंतजार करते हुए। अरे, मेरे पास है क्या। एक टू बेडरूम फ्लैट के अलावा। हमारे कुलीग्स को जाकर देखो, करोड़ों की संपत्ति है, उनके पास। पर मुझे इसका अफसोस नहीं। दुख तो इस बात का है कि जो सोचा कर नहीं पाया। सब बेकार चला गया।’

यह कहकर वे सिसकने लगे। कृष्ण ने उनकी पीठ थपथपाकर कहा, ‘सब ठीक हो जाएगा।’ प्रकाश अब और जोर से रोते हुए बोले, ‘क्या ठीक होगा। कुछ ठीक नहीं होगा। हमने नेताओं से डांट खाई, पब्लिक से डांट खाई और अपने बच्चों से भी डांट खाई। क्या मिला इस जीवन में। वी आर लूजर्स।’

कृष्ण ने कांपती हुई आवाज में कहा, ‘हम सबका जीवन ऐसा ही यार। तुम्हें क्या लगता है मैं बहुत खुश हूं? हां, मैंने अपनी मर्जी से यह करियर चुना। सोचा था खूब पढूंगा, लिखूंगा, रिसर्च करूंगा। एक नामी इंटेलेक्चुअल बनूंगा पर क्या बनकर रह गया। बस एक मास्टर। मेरे ऊपर भी बहुत ज्यादा दबाव रहता है। न जाने कितने रद्दी शोधों को पास किया है मैंने। सिर्फ इसलिए कि प्रिंसपल का दबाव था, कभी वीसी का दबाव था। जातिवाद की तो पूछो मत। इसी के आधार पर नौकरी मिलती है, पोस्टिंग होती है। आपकी कास्ट का प्रिंसपल है तो ठीक नहीं तो गए आप तेल लेने। बाकायदा ऊपर से आदेश आता है कि बच्चों को नकल करने दीजिए। मैंने एक बार मंत्री की बहू को नकल करते पकड़ा तो मेरे ऊपर छेड़छाड़ का आरोप लगा दिया। बड़ी मुश्किल से केस से पिंड छूटा यार। ढंग से पढ़ाओ तो आफत न पढ़ाओ तो समस्या। सारी प्लानिंग धरी की धरी रह गई। सोचा किसी सेंट्रल यूनिवर्सटी में चला जाऊंगा पर पता चला कि हर जगह जबरदस्त लॉबिइंग है।’ यह कहते हुए कृष्ण कांपने लगे। उनके हाथ से ग्लास छूट कर गिर गया।

प्रकाश ने कहा, ‘हम सब कुछ नहीं कर पाए… वी आर फक्ड… हमें मर जाना चाहिए। घिसट-घिसट कर जीने से कोई फायदा नहीं।’ अवध और कृष्ण हैरत भरी नजरों से प्रकाश को देखने लगे। प्रकाश झूलते हुए खड़े हुए, ‘मैं जाना चाहता हूं। अपने प्यारे दोस्तों के सामने इस दुनिया को अलविदा कहना चाहता हूं।’ उन्होंने अपनी जेबें टटोली और कहा, ‘कहां है मेरी रिवॉल्वर। मेरी रिवॉल्वर कहां गई।…लगता है मेरी अटैची में..।’ प्रकाश कमरे में इधर-उधर देखने लगे।

‘लेकिन बात तो सुनो…।’ कृष्ण ने घबराकर कह। वे पसीने से तरबतर थे। तभी अवध बोले, ‘मैं भी चलूंगा दोस्त। …एक गोली मेरे नाम कर दो। अब क्या बचा यार जीवन में। मेरे जाने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। दोनों बच्चों सेटल हो गए हैं। वे अपनी मां को संभाल लेंगे।’ कृष्ण ने कहा, ‘तुम लोग यह क्या कह रहे हो।’

‘नहीं मुझे सब समझ में आ गया। चल तू भी चल मेरे साथ।’ अवध ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया। कृष्ण ने हाथ छुड़ाते हुए कहा, ‘तुम दोनों को ज्यादा चढ़ गई है।’

‘बिल्कुल नहीं।’ प्रकाश बोले, ‘सच कहूं तो अब हमारा नशा टूटा है। इतने दिन हम नशे में थे। पावर के झूठे नशे में।… सोचो कैसा लगेगा जब कल सुबह हम तीनों की लाश बरामद होगी, एक वरिष्ठ आईपीए अफसर, सीनियर जर्नलिस्ट और विख्यात बुद्धिजीवी। हम सुसाइड नोट लिखकर जाएंगे कि हम इस समाज को बदल न सके इसलिए दुनिया से जा रहे हैं। हमारी आत्महत्या पर बहस होगी। यह सवाल उठेगा कि तीन अहम मोर्चे पर बैठे लोग कुछ नहीं कर पाए तो सोचो इस सिस्टम का क्या हाल हो गया है। हो सकता है हमारी मौत कुछ लोगों में एक्टिविज्म पैदा कर दे।’ यह कहकर प्रकाश अलमारी की तरफ बढ़े।

कृष्ण ने कहा, ‘जरा ठंडे दिमाग से सोचो। मेरे घर में शादी है। हंसी-खुशी का माहौल है। मेहमान आए हुए हैं। और तुम मरने-मारने की बात कर रहे हो। हमें क्या हक है कि हम उनकी खुशियों पर पानी फेर दें। आखिर उन्होंने हमारा क्या बिगाड़ा है यार..। और फिर मरना कौन सा समाधान है।’ यह सुनकर प्रकाश के पैर ठिठक गए। कुछ देर के लिए वे खड़े रहे फिर कृष्ण के कंधे पर सिर रखकर फफक पड़े, ‘तो क्या करूं मैं दोस्त, क्या करूं।’

‘माना कि हम सबकी जिंदगी बेकार गई। पर इसका मतलब यह नहीं कि हम जिंदगी ही छोड़ दें। क्यों न हम सब एक नए तरीके से जिएं। एक नई पारी।’

प्रकाश और अवध अपनी-अपनी कुर्सी पर बैठ गए। कृष्ण ने नीचे गिरे एक ग्लास को उठाकर मेज पर रखा और कहा, ‘हम सब अपने काम से ऊबे हुए हैं। क्यों न कोई नया काम करें। यार अब हमारे सामने पहले की तरह आजीविका की मजबूरी नहीं है। एक ऐसा काम करें जिससे संतोष हो और दूसरों का भी भला हो। हम सब अपनी-अपनी नौकरी छोड़ दें। गरीब बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू करते हैं। उन्हें एकदम नए ढंग से पढ़ाया जाए। हम उन्हें केवल आदर्श नहीं सिखाएंगे। उन्हें बताएंगे कि जिंदगी खूबसूरत है तो बदसूरत भी। जिंदगी में समझौते भी करने पड़ते हैं। हम उन्हें केवल किताबी ज्ञान नहीं देंगे। जीवन की वास्तविकताओं के बारे में बताएंगे। एक नए तरह का पाठ्यक्रम मेरे जेहन में है। सिद्धांत और व्यवहार का मेल रहेगा उसमें। अरे कुछ तो अच्छे नागरिक बना सकते हैं हम। बोलो मेरा साथ दोगे?… हम तीनों के काफी संपर्क हैं। हम साधन जुटा लेंगे। यहीं खोलेंगे स्कूल। शिक्षा में एक अद्भुत प्रयोग करेंगे। बोलो, दोगे साथ?’

प्रकाश और अवध ने कुछ देर सोचा फिर हाथ बढ़ाया। तीनों हाथ एक साथ मिले। प्रकाश ने कहा ‘तो इसी बात पर एक पेग और।’ और वह खाली ग्लासों में शराब डालने लगे। अवध ने कहा, ‘कल मेरा पहला कदम होगा इस्तीफा। मैनेजर के मुंह पर दे मारूंगा। वह मानता है कि हिंदी का पत्रकार नौकरी छोड़कर जा ही नहीं सकता।’  इस पर तीनों हंसे और लुढ़ककर गिर गए।

ठीक उस वक्त जब ललछौंह धूप का एक टुकड़ा खिड़कियों के पर्दों के बीच से अंदर गिरा, एक मोबाइल की घंटी बजी। कमरे में कालीन पर उल्टे-सीधे ढंग से सोये प्रकाश, अवध और कृष्ण अपनी-अपनी जगह पर थोड़ा हिले। प्रकाश उठकर पलंग पर पसर गए। लेकिन तभी मोबाइल दूसरी बार बजा तो वे उठ बैठे। उन्होंने कॉल रिसीव करने के लिए बटन दबाया और उठकर बाथरूम में चले गए। थोड़ी देर बाद जब लौटे तो तरोताजा दिख रहे थे। राता की थोड़ी भी छाया उनके चेहरे पर नहीं थी। उन्होंने कृष्ण और अवध को झकझोर कर उठाया। दोनों उठ बैठे।

कृष्ण ने पूछा, ‘क्या हुआ?

प्रकाश ने एक खास अंदाज कहा, ‘तुम्हारे स्टेट का नया डीजीपी तुम्हारे सामने है।’ अवध और कृष्ण उनकी बात का आशय समझने की कोशिश करने लगे। उन्हें असमंजस में देख प्रकाश ने फिर कहा, ‘गुरु मुझे बधाई दो। मुझे डीजीपी बना दिया गया है। अभी चीफ मिनिस्टर के पीए का फोन आया था। आज दिन में कैबिनेट की मीटिंग में फैसले पर मुहर लग जाएगी। मुख्यमंत्री ने कल ही सबको बता दिया है। मुझे तुरंत बुलाया गया है। मुझे अभी ही निकलना होगा।’

‘बधाई हो।’ अवध ने जम्हाई लेते हुए कहा। प्रकाश ने उत्साह में कहा, ‘मुझे पता था… एक न दिन ऐसा होगा। कोई कितना इग्नोर करेगा यार। टैलंट छुपता नहीं है। हर कोई मेरी क्षमता जानता है।’

कृष्ण ने कहा, ‘लेकिन अब तो तुम सीएम की कठपुतली बन जाओगे।’

प्रकाश ने छूटते ही कहा, ‘एक राज्य का डीजीपी होना बहुत बड़ी बात है। पुलिस महकमे का मुखिया।’

अवध कुछ कहने जा रहे थे कि तभी उनका मोबाइल बज उठा। वह बात करने के लिए कमरे से बाहर निकल गए।

प्रकाश ने कहा, ‘ मैं जल्दी से तैयार होता हूं। पहुंचने में कम से कम चार-पांच घंटे तो लग ही जाएंगे।’

कृष्ण ने कहा, “लेकिन तुम तो नौकरी छोड़ने की बात कह रहे थे।’ प्रकाश ने इस बात को अनसुना करते हुए कहा, ‘मैं एक नया वर्क कल्चर लाऊंगा पुलिस में।’

कृष्ण ने गौर से प्रकाश की ओर देखते हुए कहा, ‘हम लोग एक नए तरह का स्कूल खोलने वाले थे।’ तभी अवध दौड़ते हुए अंदर आए। उन्होंने प्रकाश से कहा, ‘मैं भी तुम्हारे साथ अभी ही निकलूंगा। मुझे चीन जाना है राष्ट्रपति के साथ। अपने अखबार से मुझे भेजा जा रहा है। एडिटर का फोन आया था। बड़ी मीठी-मीठी बातें कर रहा था।’

कृष्ण ने कहा, ‘आज क्या बात है। चारों तरफ से अच्छी खबरें आ रही हैं।’ अवध ने अपनी धुन में कहा, ‘चीन जाना मेरा सपना रहा है। मैं देखना चाहता हूं कि अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए भी उसने इतना विकास कैसे कर लिया। मैं देखना चाहता हूं मार्क्सवाद और बाजार के तालमेल वाली व्यवस्था…।’

कृष्ण ने कहा, ‘लेकिन तुम तो मैनेजर के मुंह पर इस्तीफा मारने वाले थे।’ इस पर अवध कुछ सोचने लग गए। फिर उन्होंने कहा, ‘इस पर बाद में सोचेंगे। फिलहाल तो जाना ही पड़ेगा। मैं तैयार होता हूं।’ कृष्ण ने याद दिलाया, ‘हम लोग एक स्कूल खोलने वाले थे।’ अवध बोले, ‘तुम पहले एक खाका तैयार करो, फिर देखते हैं।’ प्रकाश ने कहा, ‘तुम शुरू तो करो हम लोग बाद में उसमें शामिल हो जाएंगे।’

कृष्ण इस पर जोर से हंसे। प्रकाश और अवध एक-दूसरे को देखने लगे।


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