Last Update On : 03 03 2018 09:53:00 PM

ईमानदारी और नैतिकता की राजनीति के लिए राष्ट्रीय—अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहने वाले त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार की पार्टी सीपीएम की हार एक लोकतांत्रिक हार है लेकिन सवाल यह है कि हार किससे है और हार किस कीमत पर है…

जनज्वार। उत्तर भारत के जो लोग नहीं जानते हैं उन्हें जानना चाहिए कि बीजेपी किसके साथ साझे में गयी है और किस शर्त पर। बंगाल हो या त्रिपुरा दोनों ही जगहों पर बीजेपी राज्य बंटवारे के पक्ष में संघर्ष करने वालों के साथ खड़ी हुई है।

बीजेपी ने त्रिपुरा में आईपीएफटी के साथ गठबंधन कर चुनाव जीता है। यहां बीजेपी की जीत का सबसे महत्वपूर्ण कारण भी यही है। आईपीएफटी त्रिपुरा की जनजातियों का प्रतिनिधित्व करती है। आईपीएफ़टी की मांग है कि त्रिपुरा का बंटवारा कर जनजातीय लोगों के लिए अलग राज्य बनाया जाए।

बीजेपी राज्य बंटवारे के प्रश्न पर बहुत साफ नहीं बोलती है, लेकिन अंदरखाने से लोगों में त्रिपुरा के जनजातियों की सबसे लोकप्रिय पार्टी आईपीएफ़टी ने जनता का बता दिया है कि हम जीतने के बाद राज्य बंटवारे की मांग केंद्र से पूरी करवाएंगे।

राज्य में 60 में से 20 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। इनमें से 9 पर आईपीएफ़टी और 11 पर बीजेपी ने चुनाव लड़ा। इन्हीं 20 सीटों के गणित ने लेफ्ट फ्रंट को 19 पर और बीजेपी गठबंधन को 40 प्लस पर पहुंचा दिया।

माना जा रहा है कि त्रिपुरा में बीजेपी अध्यक्ष बिप्लव कुमार देब अगले मुख्यमंत्री होंगे। 60 सदस्यीय विधानसभा सीटों में से 59 पर मतगणना हो रही है. चारीलाम सीट से मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार रामेंद्र नारायण देबर्मा के निधन हो गया है। इस सीट पर 12 मार्च को मतदान होगा।

त्रिपुरा में बीजेपी का स्टार चेहरा बिप्लव जिन्हें भावी मुख्यमंत्री माना जा रहा है दक्षिण त्रिपुरा के उदयपुर से ताल्‍लुक रखते हैं। दिल्‍ली यूनिवर्सिटी से मास्‍टर्स की डिग्री लेने के बाद बिप्लव दिल्‍ली में ही प्रोफेशनल जिम इंस्‍ट्रक्‍टर रहे। आरएसएस बैकग्राउंड के बिप्लव जोकि तकरीबन 15 साल त्रिपुरा से बाहर रहे, बीजेपी ने मिशन जीत के तहत उन्हें त्रिपुरा वापस भेजा। वो भी तब जब 2014 के आम चुनावों में अब तक उसे सर्वाधिक छह प्रतिशत वोट मिले थे, इससे पहले 2013 के चुनावों में बीजेपी को मात्र 1.87 फ़ीसदी वोट मिले थे। मिशन जीत के तहत ही उन्हें ग्रासरूट तक पहुंच बनाने के लिए त्रिपुरा भेजा गया। आरएसएस के इस युवा चेहरे को त्रिपुरा भेजने का फायदा बीजेपी को मिला भी।

त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्‍ट कौंसिल चुनावों में बीजेपी की तरफ से प्रचार कर बिप्लव ने संगठन को मजबूत करने का काम किया। इससे बीजेपी को जमीनी आधार मिला और उन ग्रामीण अंचलों में भी बीजेपी पहली बार लोकप्रिय हुई, जो उसे जानते तक नहीं थे।

हालांकि बीजेपी आईपीएफ़टी के एजेंडे पर कुछ नहीं बोलती है, मगर देखना होगा कि राज्य में अब बीजेपी को सत्ता मिल चुकी है, तो उसका रुख क्या होता है।

2013 में त्रिपुरा में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने अपने 50 उम्मीदवार उतारे थे, मगर तब हालत इतनी खराब थी कि 49 उम्मीदवार तो अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए थे। गौरतलब है कि तब बीजेपी को यहां मात्र 1.87 फ़ीसदी वोट मिले थे। बीजेपी खाता तक नहीं खोल पाई थी अपना, जबकि माकपा ने 49 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की थी। कांग्रेस के खाते में भी तब 10 सीटें दर्ज हुई थीं, मगर इस बार बीजेपी ने पूरा गेम ही पलट कर रख दिया है। 

कुल 59 सीटों पर हुए मतदान में से 41 सीटों पर बीजेपी बढ़त बनाए हुए है तो वहीं लेफ्ट महज 18 सीटों पर ही बढ़त बना सकी है।

सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने हार पर कहा कि CPM लोगों की भलाई के लिए अपना संघर्ष जारी रखेगी। त्रिपुरा में मिली हार की पार्टी पूरी समीक्षा करेगी।

क्या इसे देश की बदलती राजनीति और आदर्श का तकाजा कहा जाए या फिर मोदी के बड़बोलेपन का जारी असर जो माणिक सरकार जैसे मुख्यमंत्री को छोड़ लोग उसे चुनते हैं जिसकी पहचान एक ऐसी सरकार और पार्टी की बन चुकी है जो पिछले 4 वर्षों से जनता को ठग ही रही है।

माणिक सरकार की कुल संपत्ति ही मात्र 2.5 लाख रुपए की है। माणिक सरकार द्वारा दाखिल चुनावी हलफनामे से ही इस बात की भी जानकारी मिली, जिससे पता चला कि वे देश के सबसे गरीब और साफ—सुथरी छवि वाले ईमानदार नेता हैं। मात्र 2410 रुपए का बैंक बैलेंस इसका प्रमाण है कि उनसे कम बैंक बैलेंस दावे के साथ किसी भी नेता का नहीं है।

हमारे देश के नेताओं को तो अरबों—खरबों के वारे—न्यारे करने से फुर्सत नहीं है, माणिक सरकार जैसा बनना या इस बात की एक्टिंग भी करना उनके लिए नाकों चने चबाने जैसा होगा। माणिक सरकार का जो पुश्तैनी घर है उसकी भी कीमत मात्र सवा दो लाख रुपए के तकरीबन होगी।