परिषदीय स्कूलों में सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों के बच्चों को पढ़ाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 18 अगस्त, 2015 के आदेश पर आज तक नहीं हो पाया है अमल

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

जनज्वार। उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा संचालित स्कूलों (परिषदीय स्कूलों) की दशा सुधारने के लिए सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के बच्चों को इनमें पढ़ाने के आदेश पर अमल न किए जाने पर उच्चतम न्यायालय ने राज्य के मुख्य सचिव अनूप चंद्र पांडेय को अवमानना नोटिस जारी किया है।

जस्टिस एके सीकरी व जस्टिस एस अब्दुल नजीर की पीठ ने एक फरवरी को शिव कुमार त्रिपाठी की ओर से दाखिल विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई के बाद यह नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि उन्होंने मुख्य सचिव के समक्ष यह मुद्दा उठाया था, ताकि परिषदीय स्कूलों की हालत सुधरे। जब वहां कार्रवाई नहीं हुई तो उन्होंने मुख्य सचिव के खिलाफ हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की, लेकिन वह खारिज कर दी गई। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिका में कहा गया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के 18 अगस्त 2015 के आदेश पर आज तक अमल न किए जाने पर प्रदेश के मुख्य सचिव के खिलाफ अवमानना कार्यवाही होनी चाहिए। याचिकाकर्ता के अनुसार यह मामला गरीबों के बच्चों की पढ़ाई से जुड़ा है, इसलिए उच्चतम न्यायालय उत्तर प्रदेश सरकार को हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन का निर्देश दे।

गौरतलब है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल की पीठ ने इस विषय पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 18 अगस्त, 2015 को सरकारी कर्मियों के बच्चों को अनिवार्य रूप से सरकारी/परिषदीय स्कूलों में पढ़ाए जाने का आदेश मुख्य सचिव को दिया था। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि ऐसी व्यवस्था की जाए कि अगले शिक्षा-सत्र से इसका अनुपालन सुनिश्चित हो सके।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 18 अगस्त 2015 के आदेश में परिषदीय स्कूलों की खराब स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा था कि नौकरशाह, नेता और अमीर लोगों के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। इसीलिए ये लोग सरकारी स्कूलों की तरफ ध्यान नहीं देते। हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया था कि वह अन्य जिम्मेदार अधिकारियों के साथ परामर्श से उचित कार्रवाई कर यह सुनिश्चित करें कि सरकारी व अर्धसरकारी कर्मचारी, स्थानीय निकाय के प्रतिनिधि, न्यायपालिका और अन्य संस्थानों में काम करने वाले सभी लोग जो सरकारी कोष से वेतन या लाभ लेते हैं, के बच्चे परिषदीय स्कूलों में पढ़ें।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से कहा था कि इस शर्त का उल्लंघन करने वालों पर दंड के प्रावधान भी सुनिश्चित किए जाएं। उदाहरण के लिए, अगर कोई सरकारी कर्मचारी अपने बच्चे को परिषदीय स्कूलों की बजाय निजी स्कूल में पढ़ाता है तो वह वहां दी जा रही फीस जितना पैसा हर महीने सरकारी कोष में जमा कराएगा।

यह तब तक जारी रहेगा जब तक उसका बच्चा निजी प्राइमरी स्कूल में पढ़ेगा। इस राशि को परिषदीय स्कूलों की बेहतरी में खर्च किया जाएगा। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि नौकरी में रहने वाले उस सरकारी कर्मचारी की निश्चित समय के लिए वेतन वृद्धि व प्रोन्नति आदि भी रोकी जा सकती है। कोर्ट ने मुख्य सचिव को इन निर्देशों को अगले शैक्षणिक सत्र से लागू करने के लिए प्रभावी कदम उठाने का आदेश दिया था। छह महीने बाद आदेश पर अमल की रिपोर्ट देने को कहा था।

न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने शिवकुमार पाठक की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया था। याचिका में कहा गया था कि सरकारी परिषदीय स्कूल में शिक्षकों की नियुक्ति पर नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है, जिसके चलते अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति हो रही है। इसी कारण बच्चों को स्तरीय शिक्षा नहीं मिल पा रही है। इसकी चिंता न तो सम्बंधित विभाग के अधिकारियों को है और ना ही प्रदेश के उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा था कि सरकारी कर्मचारी, निर्वाचित जनप्रतिनिधि, न्यायपालिका के सदस्य एवं वे सभी अन्य लोग सरकारी खजाने से वेतन एवं लाभ मिलता है, अपने बच्चों को पढ़ने के लिए राज्य के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालयों में भेजें। इससे समाज के साधारण व्यक्तियों के बच्चों को तथाकथित उच्च और संपन्न वर्ग के बच्चों के साथ घुलने-मिलने का अवसर मिलेगा। इससे उन्हें न केवल एक अलग वातावरण मिलेगा, बल्कि उनमें आत्मविश्वास जागेगा और उन्हें अवसर मिलेंगे। इससे समाज को मूल स्तर से बदलने के लिए क्रांतिकारी बदलाव लाने हेतु प्रोत्साहन मिलेगा।

दरअसल लगभग 50 साल पहले दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में गठित शैक्षिक आयोग ने एक रिपोर्ट तत्कालीन शिक्षा मंत्री को दी थी, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘एक ही स्कूल के पड़ोस में रहने के बावजूद गरीब परिवारों के बच्चों को अमीर परिवारों से आने वाले बच्चों की तरह समान अवसर नहीं मिलते। सामाजिक न्याय का तकाजा है और लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने के लिए यह आवश्यक है कि ऐसे समूहों के बीच समान शैक्षिक अवसर पैदा करने के लिए विशेष प्रयास किए जाएं। इसके 5 दशक बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल की पीठ ने इस विशय पर यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

26 हजार से ज्यादा ऐसे स्कूल एक कमरे में
एक रिपोर्ट के अनुसार 26 हजार से ज्यादा ऐसे स्कूल एक कमरे में चलते हैं। यह आंकड़ा कुल स्कूलों का 11 फीसदी बैठता है। दस फीसदी स्कूल 2 कमरों में और इतने ही तीन कमरों में चलते हैं। मतलब यह है कि लगभग एक तिहाई पाठशालाओं के नसीब में तीन से अधिक कमरे नहीं हैं। न जाने कितने स्कूल ऐसे हैं, जिनमें बच्चों को बैठने के लिए कुर्सी-मेज नहीं हैं। वे टाट फट्टी पर बैठकर पढ़ते हैं। न जाने कितने स्कूलों में बच्चों के लिए स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं है। लड़कियों के लिए अलग से शौचालय नहीं हैं। पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं हैं। शिक्षकों के ढाई लाख से ज्यादा पद खाली पड़े हैं।

सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों की संख्या में गिरावट
यही नहीं सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों की संख्या कम हो रही है। साल 2012-13 में एक से 5 क्लास तक कुल एक करोड़ 34 लाख बच्चे इन सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे। कक्षा 5 से 8 तक पढऩे वालों की संख्या 40.81 लाख थी। साल 2016-17 में यह संख्या घटकर क्रमश: एक करोड़ 17 लाख और 35.38 लाख रह गई। यह कमी तब हुई जब सरकार ने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए विषेश अभियान चलाए हुए है।

इलाहाबाद न्यायालय ने कहा था कि पूरी शिक्षा व्यवस्था तीन हिस्सों में बंट गई है। इलीट क्लास, मिडिल क्लास और परिषदीय प्राथमिक स्कूल।90 फीसदी बच्चे परिषदीय स्कूलों में पढऩे जाते हैं, जबकि इलीट क्लास में अधिकारी वर्ग, उच्च वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग के लोगों के बच्चे पढ़ने जाते हैं।

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