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शशांक शेखर की कविता ‘रेल यात्रा मंगलमय हो!’

नहीं मिलते ढूँढे से भी नहीं मिलते
मिलनसार डॉक्टर और दोस्ताना वकील
पर मनहूस ना टकराए हों अगर
तो मिल ही जाते हैं हमदर्द टीटी ज़रूर
वो काट देते हैं पर्चियाँ
खोया हुआ सफ़र मिल जाता है
वैधानिक हो जाती है हमारी नाजायज़ यात्रा
टीटी कहते हैं पर्चियों को मानिए टिकट
और मानने से ही सबकुछ है बाबू
संसार मानने से ही है

कौन होते हैं ये टीटी?
काले लिबास पे आवेज़ा
सफेद नेम प्लेट पर चस्पां नाम
सिर्फ़..या कुछ और?
नाम से ज़्यादा शख्सियत कुछ
टीटी जो बोलते हैं याराना अंदाज़ में
“आइए साइड में आइए”
“दिखाइए आईडी दिखाइए”
टीटी रेल की पटरियों पे संगीत टेकते
इच्छाओं और ग्रंथियों पर वायलन फेरते
बियाबान में हरहराती ट्रेनों के फारिस
प्लेटफॉर्म पर टनटनाती घंटियों के झेन्गुर
सबज़कार कलम पर्चियों के
जो झाँक के देखते हैं
भूले—बिसरे प्लेटफॉर्मों को
बोगियों से लटक कर देखते हैं
गेहूँ के लहलहाते खेतों को
रखते चलते हैं पत्थरों से निशाने-राह
टीटी नाम से ज़्यादा कुछ
रात के कोहरे पर शिल्पकारी करता एक हमसफ़र

हमारे कानों में पड़ा तो हम भी गये
“साइड” में गये
बुलावे और निमंत्रण पे गये
पेंट्री के चूहों से बचते बचाते गये
सिगरेट के धुएँ पर हथेली फेरते गये
हम गये!
टायलेट में लिखी गालियों को सुनते सुनाते गये
वहाँ जहाँ झीने से पर्दे से झाँक रही थीं
चाय की डिब्बियाँ और बाल्टियों में रखे थे अमरूद
“साइड” में खुशनुमा था माहौल
हवा के लड़खड़ाते हुए कदम जब लगते
बोगियों की आस्तीनें खुल जातीं
वहीं जुट रहे थे सभी वक़्त के मारे
टिकट की तलाशे-मुआश में
एक अदद सीट की तलाश में
हम भी गये!
और हमें मिली ट्रेन की ऊपर वाली सीट
वही जो ठीक आईने के सामने होती है
खुद में करतब है उस सीट पर चढ़ना
पहले बाएँ पैर के सहारे
फिर आहिस्ता से कुहनी टेक कर
नीचे वाले पैसंजर की सीट पर नोक भर पैर जमाए
बेहद संकोच में
कि माथे से ना लग जाए पैर कहीं
कहीं जुराबों की गंध ना आए किसी को
भला क्या सोचेगा?
फिर करीने से बिछाया बिस्तर ना बिगड़े किसी का
इस उधेड़बुन में चढ़ते गये
हम चढ़ते गये उम्मीदों की राह पर
आर.ए.सी के ऊपर कन्फर्म्ड बर्थ की मियाद पर
हम नोक भर ज़मीन की फरियाद करते
अपने नसीब की तरबगाह पर चढ़ते गये

फिर वो जो “रेल यात्रा मंगलमय हो” सुना था
प्लेटफॉर्म 13 से गुज़रते हुए
वो बात यकीन हो रही थी
छोटी बात नहीं है भाई
आईने के ठीक सामने वाली बर्थ का मिलना
रोमन थ्रोन है वो
जिस आईने में शक्लें देखते हैं सब
हम अपनी जुराबें देख रहे थे उसमें
फिर अजीब सा सुकून है वहाँ
पता नहीं चलता कौन सा स्टेशन गुज़रा है
लेकिन हमसे ज़्यादा फिकर होती है दूसरों को
लोग बताते हैं
मिलनसार लोग बताते हैं
साहब आपका स्टेशन आने वाला है।

(लेखक शशांक शेखर सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं।)