आन्दोलन के लिए एक या दो मुद्दे बहुत होते हैं, पर सोशल मीडिया के इस युग में तो केवल मुद्दे ही मुद्दे हैं, जाहिर है हम किसी भी एक मुद्दे पर केन्द्रित नहीं हो पाते। इन दिनों बड़े आन्दोलन केवल किसानों और मजदूरों ने किये, और इनमें से अधिकतर सामान्य मोबाइल फोने वाले हैं, सोशल मीडिया चलाने वाले स्मार्टफोनधारी नहीं…

वरिष्ठ लेखक महेंद्र पाण्डेय

आप कभी भी नई दिल्ली के जंतर मंतर रोड पर जाएँ, आपको कई धरना-प्रदर्शन देखने को मिलेंगे। आप इनके बैनरों को देखें तो मुद्दे भी गंभीर दिखेंगे, मंच पर लोग भी दिखेंगे, वक्ता भी होंगे पर सामने खाली कुर्सियां होंगी। आन्दोलन तो हो रहे होंगे, पर आन्दोलनकारी नहीं होंगे, श्रोता नहीं होंगे, आन्दोलन में जुड़ने वाले लोग नहीं होंगे।

जंतर मंतर रोड पर सुरक्षाबलों की भीड़ भी होगी, उनकी दो-तीन बसें भी खड़ी होंगी, पांच-छह धरना प्रदर्शन भी चल रहे होंगे, फिर भी जितने सुरक्षाकर्मी होते हैं उससे भी कम आन्दोलनकारी होते हैं। वैसे भी धरना-प्रदर्शन से अधिक लोग तो हरेक समय इसी रोड पर स्थित दक्षिण भारतीय व्यंजनों की दुकान पर या फिर चाय की दुकान पर नजर आते हैं।

हालत तो यहाँ तक पहुँच गए हैं कि बड़े और प्रतिष्ठित वक्ता भी आन्दोलन में भीड़ जुटा पाने में असमर्थ रहते हैं। क्या वाकई लोगों को समस्या नजर नहीं आ रही है, या फिर लोगों की सारी समस्या का समाधान हो गया है? पिछले चार वर्षों से सोशल मीडिया से तो यही लगता है कि अधिकतर लोग सरकार के रवैये से अधिक परेशान हो चुके हैं। फिर आन्दोलन क्यों नहीं हो रहे हैं। दूसरी तरफ किसान और मजदूरों के बड़े आन्दोलन देश के अन्य हिस्सों में होते जा रहे हैं – तो क्या सारी समस्या किसानों और मजदूरों को ही है?

दरअसल आन्दोलन तब होते हैं जब जनता किसी एक समस्या से परेशान होकर गुस्से में भर जाती है और फिर सड़कों पर उतरती है। आज के सोशल मीडिया के दौर में जब लोग आसानी से जुट सकते हैं पर आन्दोलन नहीं हो रहे हैं। पर यही सोशल मीडिया गाय के नाम पर या फिर हिन्दू-मुसलमान के नाम पर हिंसक भीड़ आनन-फानन में जुटा लेता है। इसका सीधा सा मतलब है कि सोशल मीडिया किसी भी हिंसक भीड़ तो जुटाने की क्षमता रखता है, पर मुद्दों पर आन्दोलन कराने में असमर्थ है।

सोशल मीडिया के जरिये आज भले ही विश्व की आबादी का बड़ा हिस्सा, इतिहास के किसी भी दौर की तुलना में, अधिक संख्या में एक दूसरे से जुड़ा है पर वास्तविकता यही है कि समाज में इसी सोशल मीडिया के चलते आज जितना बिखराव है वह पहले किसी दौर में नहीं रहा। अब लोग एक दूसरे से मिलते नहीं बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से मैसेज करते हैं। लोग अपने समाज को छोड़कर एक आभासी समाज का हिस्सा हो गए हैं।

हालात इतने खराब हैं कि एक दूसरे से लगातार मैसेज के माध्यम से जुड़े रहने वाले लोग भी आमने सामने मिलने पर बात नहीं कर पाते, लोगों की बातें करने की आदत धीरे-धीरे कम हो रही है। मैसेज करने की आदत ने लोगों की भाषा ही बदल डाली है।

सोशल मीडिया का इतना व्यापक प्रभाव पड़ रहा है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। गौर से अपने आसपास के लोगों को देखें तो पता चलेगा कि आज के दौर में लोगों के विचार किसी विषय पर भले ही गलत हों पर उन्हें बदलना मुश्किल है। कारण स्पष्ट है, सोशल मीडिया पर आप अपनी मर्जी से अपने विचारों के अनुरूप एक ग्रुप तैयार करते हैं। ऐसे ग्रुप में सबके विचार एक जैसे ही होते हैं, यदि कोई आपके विचारों का विरोधी होता भी है तो आप उसे ब्लॉक कर सकते हैं या फिर उसके मैसेज को स्किप कर देते हैं।

आज के दौर में बहुत बड़े आन्दोलन भी लगभग गायब हो चुके हैं, यह भी सोशल मीडिया की एक देन है। आन्दोलन तभी हो पाते हैं जब बहुत सारे लोग, जिनके विचार एक जैसे हों, वे आपस में मिलें और एक दूसरे की बातें सुनें और समस्याओं से इतने प्रभावित हों कि सडकों पर आन्दोलन के लिए उतर जाएँ।

आजकल तो किसी समस्या से हम प्रभावित ही नहीं होते, और अगर बहुत गुस्सा करते भी हैं तो सोशल मीडिया पर एक-दो कमेंट लिखकर शांत हो जाते हैं। आन्दोलन के लिए एक या दो मुद्दे बहुत होते हैं, पर सोशल मीडिया के इस युग में तो केवल मुद्दे ही मुद्दे हैं और जाहिर है हम किसी भी एक मुद्दे पर केन्द्रित नहीं हो पाते। इन दिनों बड़े आन्दोलन केवल किसानों और मजदूरों ने किये हैं, और इनमें से अधिकतर सामान्य मोबाइल फोने वाले हैं, सोशल मीडिया चलाने वाले स्मार्टफोनधारी नहीं।


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