प्रतीकात्मक फोटो

खबरें लोगों की जान बचा भी सकती हैं और झूठी खबरें लोगों की जान ले भी सकती हैं, यह तो हम पर निर्भर करता है कि हम क्या करना चाहते हैं…

महेंद्र पाण्डेय, वरिष्ठ लेखक

पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान सोशल मीडिया से सम्बंधित बहुत अध्ययन किये गए हैं, पर इनमें से अधिकतर अध्ययन इसके नुकसान से सम्बंधित हैं या फिर फेक न्यूज़ से सम्बंधित। हमारे देश में सोशल मीडिया के भी बड़े फायदे नजर नहीं आते, यह भी मेनस्ट्रीम मीडिया की तरह एक सरकारी भोंपू बनकर रह गया है। इसके बाद भी सरकार हमारे मैसेज पर और कड़ी नजर रखने का प्रयास कर रही है।

दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और अब इंग्लैंड में स्कूल के बच्चे सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़कर जलवायु परिवर्तन रोकने में सरकार की असफलता के विरूद्ध बड़े आंदोलन कर रहे हैं। इस आंदोलन की शुरुआत स्वीडन की 15 वर्षीय बालिका ग्रेटा थुन्बेर्ग ने की थी।

इसके विपरीत हमारे देश में आजकल झूठ का जमाना है, अनेक समाचार चैनल दिनभर झूठी ख़बरें परोसते हैं और अनेक अखबार इन्हीं झूठी ख़बरों को छापकर व्यापक सर्कुलेशन में हैं। सोशल मीडिया तो ऐसे खबरों की खान है। अब तो समाचार पत्रों की मुख्य खबर पढ़कर भी सोचना पड़ता है कि सच था या झूठ। सरकारी स्तर पर भी व्यापक तरीके से झूठी खबरें फैलाई जा रहीं हैं, ऐसी एक या दो ख़बरें नहीं हैं बल्कि हजारों में समाचार होंगे।

हमारे प्रधानमंत्री को भी झूठ से परहेज नहीं है। नोटबंदी के समय प्रधानमंत्री जी ने एक भाषण में बड़े गर्व से बताया था कि अब तो भीख मांगने वाला भी पेटीएम की मशीन रखने लगा है। दरअसल यह खबर सोशल मीडिया पर उन दिनों तेजी से फ़ैल रही थी, जो बाद में झूठी साबित हुई।

हाल में ही रेल मंत्री पीयूष गोयल ने किसी नई ट्रेन का वीडियो साझा किया था, जिसमें ट्रेन की स्पीड वास्तविक स्पीड से दोगुना दिखाई गई थी। अमेरिका में भी डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद सरकारी स्तर पर झूठ की बाढ़ आ गयी है।

पर, सोशल मीडिया के फायदे या नुकसान निश्चित तौर पर इसका उपयोग करने वाले पर निर्भर करता है। एक नए अध्ययन में बताया गया है कि सोशल मीडिया के संदेश प्राकृतिक आपदा के समय बहुत कारगर रहते हैं। प्लोस वन नामक जर्नल में यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेहेमोंट के वैज्ञानिकों का यह अध्ययन प्रकाशित किया गया है। दावा है कि यह इस तरह का पहला अध्ययन है।

इसमें अमेरिका में इस दशक में आये पांच सबसे खतरनाक प्राकृतिक आपदा के 15 दिन पहले से लेकर 15 दिन बाद तक के दौरान ट्विटर मैसेज का विश्लेषण किया गया है, ये प्राकृतिक आपदा हैं, सैंडी तूफ़ान (अक्टूबर, 2012), आइरीन तूफान (अगस्त, 2011), ऑहियो वैली चक्रवात (अप्रैल, 2011), लुसिआना की बाढ़ (अगस्त, 2016) और साउथईस्ट चक्रवात (मई 2011)।

इस अध्ययन से दो तथ्य उजागर होते हैं – अपेक्षाकृत छोटे नेटवर्क (100 से 200 फोलोवर्स) ऐसे समय अधिक सक्रिय रहते हैं और अधिक उपयोगी सूचनाएं साझा करते हैं और आपदा के प्रकार (चक्रवात, तूफ़ान या बाढ़) से सूचनाओं की संख्या और समय बदलता है। छोटे नेटवर्क सम्भवतः इसलिए अधिक सक्रिय रहते हैं क्योकि इसमें अधिकतर संबंधी, पड़ोसी या घनिष्ट मित्र शामिल रहते हैं। आपदा के समय बहुत बड़े नेटवर्क या सेलेब्रिटी-स्टेटस वाले ट्विटर से शायद ही कोई महत्वपूर्ण जानकारी साझा की जाती है।

तूफ़ान की सूचना अक्सर पहले ही आ जाती है, इसलिए ट्विटर पर इससे सम्बंधित मैसेज की भरमार पहले ही साझा की जाते हैं और तूफ़ान जब आता है तब मैसेज की संख्या कम हो जाती है। इससे पहले ही लोग वास्तविक स्थिति, आपदा, ग्रोसरी, सुपरमार्केट और आपदा से निपटने की सूचनाएं साझा करते हैं।

चक्रवात और बाढ़ की सूचना ज्यादातर मामलों में पहले नहीं आती, ऐसी आपदा के समय सूचनायें या तो बाढ़ के दौरान या फिर इसके बाद साझा की जातीं है। ऐसी आपदा के बाद मैसेज में प्रमुख शब्द “शेल्टर”, “इमरजेंसी”, “विंड”, और “फ़ूड सिक्यूरिटी” रहते हैं।

पिछले वर्ष एक वैज्ञानिक अध्ययन से भी यह स्पष्ट होता है कि झूठी खबरें जल्दी और ज्यादा लोगों तक पहुंचती हैं। यह अध्ययन सोरौश वोसौघी की अगुवाई में वैज्ञानिकों के एक दल ने किया है। सोरौश वोसौघी एक डाटा साइंटिस्ट हैं और कैंब्रिज स्थित मस्सचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में कार्यरत हैं।

वर्ष 2013 में अमेरिका के बोस्टन मैराथन के दौरान बम फेंके गए थे, जिसमें अनेक लोग घायल हुए थे और कुछ मारे भी गए थे। उस दौरान सोरौश वोसौघी उसी संस्थान में शोध कर रहे थे और सोशल मीडिया, विशेष तौर पर ट्विटर पर, इससे सम्बंधित हरेक समाचार पर ध्यान दे रहे थे। कुछ दिनों बाद ही उन्हें स्पष्ट हो गया कि सही खबरों से अधिक झूठी खबरों को लोग अधिक फॉलो कर रहे हैं और ऐसी खबरें तेजी से फैलती हैं।

खबरें लोगों की जान बचा भी सकती हैं और झूठी खबरें लोगों की जान ले भी सकती हैं, यह तो हम पर निर्भर करता है कि हम क्या करना चाहते हैं। इस अध्ययन से इतना तो स्पष्ट है कि सगे-सम्बन्धियों और घनिष्ठ मित्रों वाले सोशल मीडिया पर सक्रिय छोटे ग्रुप संदेशों को फैलाने में अधिक कारगर और सक्रिय रहते हैं।


जन पत्रकारिता को सहयोग दें / Support people journalism


Facebook Comment