Last Update On : 09 08 2018 08:21:41 AM

शारीरिक और मानसिक रूप से अर्द्ध-विक्षिप्त रमेश कुमार का नाम न तो बीपीएल कार्डधारकों में शुमार था, न ही राशनकार्ड जैसी साधारण सी सुविधा उसके ताईं उपलब्ध हो पाई…

सुशील मानव

बिहार के शेखपुरा जिले के बारबीघा प्रखंड में एक गाँव है धरसेनी। दो रोज पहले मंगलवार 7 अगस्त को धरसेनी के कुठौत मौजा में रमेश कुमार सिंह की भुखमरी के चलते मौत हो गई। कहने को तो रमेश कुमार सिंह भूमिहार जाति से थे, लेकिन विपन्नता का आलम ये था कि घर में खाने को कुछ भी नहीं था।

बरबीघा विधानसभा से विधायक जदयू नेता गजानंद शाही हैं। बरबीघा प्रखंड नवादा संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है जिसके चुने हुए सांसद हिंदू-हृदयी भूमिहार गिरिराज सिंह हैं। जबकि सबसे बड़ी बात यह है कि न तो सांसद विधायक न ही पंचायती राज के ग्रामीण प्रतिनिधि तक जीवित रहते रमेश के किसी काम आ सके।

शारीरिक और मानसिक रूप से अर्द्ध-विक्षिप्त रमेश कुमार का नाम न तो बीपीएल कार्डधारकों में शुमार था, न ही राशनकार्ड जैसी साधारण सी सुविधा उसके ताईं उपलब्ध हो पाई। धरसेनी गाँव की प्रधान बॉबी देवी है, कुठौत इसी गांव का एक मौजा है।

थोड़ा बहुत स्वास्थ्य ठीक रहने तक मजदूरी करने वाला रमेश जब बिल्कुल लाचार हो गया तो पड़ोसियों के रहमोकरम से मिलने वाले खाने को अपने बेटे—बेटी का पेट भर कर खुद भूख का शिकार होता रहा। तिल तिलकर मरते हुए उसे अंत में मौत नसीब हो ही गई, पर रमेश के हिस्से आई मौत बेहद पीड़ादाई और बेहद भयावह, बर्बर थी।

अच्छा होता कि गाँव समाज के लोग उस पर तरस खाकर रोटी फेंकने के बजाय उसके लिए संघर्ष करते उसे सरकरी मदद दिलाते। राशन दिलाते उसका, इलाज कराते। लेकिन नहीं समाज के लोग तो रोटी का टुकड़ा फेंकने को ही अपनी मानवता और धर्म समझकर निभाते रहे। समझा जा सकता है कि बीमार कौन है। कौन है विक्षिप्त और इलाज़ की ज़रूरत किसे है।

भुखमरी से मरे रमेश का बेटा

प्रखंड के कुठौत गांव निवासी रमेश कुमार सिंह पुत्र स्वर्गीय सकलदेव सिंह बची खुची संपत्ति वक्त और हालात के हाथों पहले ही बिक गई थी। वजह जो भी हो पर करीब तीन साल पहले दो छोटे बच्चों को अपने संग लेकर जबकि दो बच्चों को पिता के भरोसे छोड़ रमेश का घर-वार छोड़कर पत्नी भी कहीं चली गई थी।

गाँव वालों के मुताबिक़ विगत कई वर्षों से शारीरिक रूप में बेहद कमजोर और आर्थिक रुप से विपन्न हो चले रमेश कुमार ग्रामीणों के ही सहानुभूति और दया पर किसी तरह से जी रहे थे। दया और सहानुभूति की चंद रोटियां उसके साथ रहने वाले किशोर उम्र के बेटे-बेटी के लिए भी पर्याप्त नहीं हुआ करते थे।

केंद्र की मोदी और राज्य की नीतीश सरकार सुशासन और अच्छे दिन का कितना भी डंडा पीटें पर हक़ीकत यही ह कि इस सुशासन में मुजफ्फरपुर शेल्टर होम जैसे कांड हो रहे हैं जबकि अच्छे दिन में लोग भूख से मर रहे हैं। गर भूखे को भोजन और बीमार को इलाज नहीं दे सकता तो किस काम का है ये विकास और किसके लिए है ये विकास।

अभी पंद्रह रोज पहले एक पिता का किराये का रिक्शा चोरी हो जाने के बाद 25 जुलाई को देश की राजधानी दिल्ली में तीन मासूम बच्चियों आठ साल की मानसी, चार साल की शिखा और दो साल की पारुल की भुखमरी के चलते मौत हो गई थी। जिनके पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला था कि तीनों की मौत कुपोषण से हुई थी। बच्चियों के शव के पोस्टमार्टम में खाने का एक भी अंश नहीं मिला थी डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें भी सात-आठ दिन से खाना नहीं मिला था।

वहीं रघुवरदास के शासन काल में झारखंड भी अब केवल लगातार भुखमरी से होने वाली मौतों के चलते ही चर्चा में आता है।

तो अब भुखमरी के चलते रमेश की आसमयिक मौत के बाद जो सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है वो ये की उसके जाने के बाद अब इन दो बेसहारा किशोर बच्चों का क्या होगा?

क्या इन्हें भी बिहार सरकार के प्रशासन द्वारा जीवन की नारकीय यातना सहने के लिए किसी सेक्स रैकेट चलाने वाले शेल्टर होम में डाल दिया जाएगा? या फिर इन्हें इनके हाल पर छोड़ दिया जाएगा चोरी करके या भीख माँगकर अपना पेट भरने के लिए?

या फिर गाँव का ही कोई सामंतवादी व्यक्ति इन बच्चों पर तरस खाकर इन्हें अपने घर का नौकर बनाकर रख लेगा? क्या इस बलात्कारी समय में मरहूम रमेश की बेटी के पास खुद को यौन उत्पीड़न से बचाकर रख पाने का कोई सुरक्षित रास्ता मिल सकेगा कभी? क्या कभी इन अनाथ और बेसहारा को बच्चों को अच्छी शिक्षा और अच्छा जीवन हासिल हो सकेगा? सवाल तो और भी बहुत से हैं बस इनसे जूझने वाले ही नहीं मिल रहे कोई।