सालों तक हर रोज मैंने व्हीलचेयर पर उस आदमी को आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में आते—जाते देखा, जो न सिर्फ विज्ञान और भौतिकी के क्षेत्र की महानतम वैज्ञानिक है, बल्कि इंसानी जिंदगी को जीवटता के साथ जीने का एकमात्र अविश्वनीय उदाहरण भी है…

वसी हैदर, भौतिकी के प्रोफेसर

मेरी पहली मुलाकात स्टीफन हॉकिंस से 1982 में तब हुई जब मैं इंग्लैंड के आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में रॉयल सोसाइटी के पोस्ट डॉक्टोरल फेलोशिप पर रिसर्च कर रहा था। एक दिन अचानक विश्वविद्यालय में बताया गया कि स्टीफन हॉकिंस आॅक्सफोर्ड आ रहे हैं। वे यहां अपनी रिसर्चों खासकर कॉस्मोलॉजी और टाइम के मुताल्लिक लेक्चर देंगे।

आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा लैक्चर थियेटर जीवविज्ञान विभाग का था। उनकी लोकप्रियता को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनका लेक्चर वहीं रखा। उस दिन समां ये था कि पूरा विश्वविद्यालय बंद हो गया। हर कोई उनको सुनना चाहता था। जिसे देखो वह लेक्चर हॉल की ओर बढ़े जा रहा था और हॉकिंस का लेक्चर शुरू होने से पहले ही हॉल भर गया। फिर प्रशासन ने थियेटर के बगल में एक हॉल था वहां वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए लोगों को उन्हें सुनने की व्यवस्था की। मैं चूंकि एक घंटा पहले पहुंच गया था तो मैं पहले वाले हॉल के अंदर था, जहां हॉकिंस भी मौजूद थे।

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उनका लेक्चर एक मशीन के माध्यम से शुरू हुआ, क्योंकि वह खुद बोल नहीं सकते थे। पूरा हॉल बिल्कुल शांत था। लोगों ने खूब ध्यान से कॉस्मोलॉजी और टाइम पर उनकी बातें सुनीं। वह उस समय भी और आज भी इन दोनों विषयों के सबसे लोकप्रिय और जानकार वैज्ञानिक थे। उस दिन मेरे लिए वह अद्भुत क्षण था, क्योंकि मैं उस आदमी दो घंटे तक सुनता रहा जो खुद जुबान से एक शब्द नहीं बोल सकता। आश्चर्य है कि उन्होंने सवाल—जवाब का सेशन भी किया और सबको संतोषपरक जवाब दिए जाने तक हॉल में मौजूद रहे।

उसके बाद मैं उनसे एक दिन अलग से मिला। मैंने उनसे वादा किया कि मैं आपका कोई न कोई एक लेक्चर हिंदी और उर्दू में अनुदित करूंगा। उसे मैं पिछले साल ही पूरा कर पाया हूं, जो कि हॉकिंस साहब का एक मशहूर लेक्चर है ‘ओरिजिन आॅफ यूनिवर्स’ के उपर। ये लेक्चर हॉकिंस साहब ने इजराइल के तेलअवीव विश्वविद्यालय में दिया था। उस लेक्चर का वीडिया तैयार कर मैंने उन्हें खत लिखा कि अगर आप कॉपीराइट अधिकार दें तो मैं उन्हें शिक्षा केंद्रों को भेजूं और यूट्यूब पर अपलोड करूं।

ये एक तरह से मेरा उनसे ताल्लुक रहा। लेकिन स्टीफन हॉकिंस निहायत ही उम्दा वैज्ञानिक थे। अगर मैं नाम लूं तो न्यूटन और आइंसटाइन के बाद मैं हॉकिंस को दुनिया का सबसे बड़ा वैज्ञानिक कहूंगा। उनकी सबसे प्रसिद्ध ‘ब्रीफ हिस्ट्री आॅफ साइंस’ किताब वर्ष 1988 में छपी और वह बेस्ट सेलर साबित हुई। उसकी 1 करोड़ से अधिक प्रतियां सिर्फ अंग्रेजी में बिकीं। इस किताब के अलावा उन्होंने 30 और किताबें लिखीं।

पर यह सारे महान काम उन्होंने उस लाइलाज बिमारी के साथ किया, जो उनको सिर्फ 22 साल की उम्र में हो गयी। उस बीमारी का नाम है एमिओट्रोफिक लैटेरल सिरोसिस (एएलएस)। इसमें तंत्रिका तंत्र फेल कर गया और उनका चलना—फिरना बंद हो गया। वह व्हीलचेयर पर आ गए।
कल्पना कीजिए कि वह 1970 से व्हीलचेयर पर रहे। जब 22 साल की उम्र में स्टीफन हॉकिंस की बीमारी का पता चला तो डॉक्टरों की राय थी कि वह बमुश्किल दो—चार साल जिएंगे। बावजूद इसके वह कैंब्रिज विश्वविद्यालय से अपने पीएचडी के काम में लगे रहे। वह बहुत रंगारंग व्यक्तित्व थे। वर्ष 1985 में बर्फीले इलाकों में वह स्किइंग के लिए निकल गए, जहां उन्हें निमोनिया हो गया। निमोनिया की वजह से उनकी आवाज चली गयी। इससे पहले तक वह बोल सकते थे। उनकी दो शादियां हुई थीं और दोनों शादी बीमारी के बाद हुईं।

मैंने उनको जैसा पाया उसके बाद कह सकता हूं कि जिंदगी के प्रति जैसी जिद और जीवटता उस इंसान में थी, इस धरती पर दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलेगा। हमें हल्का बुखार—नजला हो तो छुट्टियां ले लेते हैं और वह आदमी तमाम रोगों से लदे होने के बाद भी बिना छुट्टी के अनथक जीवन जीता रहा, काम करता रहा, दुनिया को और बेहतर और सुंदर बनाने के प्रयासों में जिंदगी के आखिरी क्षण तक लगा रहा।

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हॉकिंस का योगदान विज्ञान में है, सिर्फ इतना कहना कम होगा, क्योंकि उस आदमी का असल योगदान विज्ञान को लोकप्रिय बनाने और विज्ञान के जरिए तार्किकता को दुनिया में व्यापक तौर पर बहाल करने में है। आप उनके दसियों वीडियो यू ट्यूब पर देख सकते हैं, जिसमें वह बहुत कठिन और दुरूह माने जाने वाले वैज्ञानिक रहस्यों को आम भाषा और आसान तरीके से समझाकर चमत्कृत कर देते हैं।

हॉकिंस का मुख्य वैज्ञानिक योगदान सापेक्षता के सिद्धांत और बिग बैंग थ्योरी को लेकर है। यह आइंस्टाइन के समय से सवाल रहा है कि यूनिवर्स का जो निर्माण हुआ है, उसको सापेक्षता के सिद्धांत से कैसे मिलाया जाए। इसी बात को हॉकिंस ने साबित किया आइंस्टाइन के सिद्धांत को बिग बैंग के जरिए आगे बढ़ाया और बताया कि तारे, ग्रह—नक्षत्रों, सूर्य, चंद्रमा कैसे बनते हैं।

खैर! इन गंभीर कामों के बीच हॉकिंस साहब का सेंस आॅफ हयूमर बड़ा कमाल का था। वह कहते थे कि कुछ लोग कहते हैं कि सबकुछ भगवान ने बनाया है, एक पत्ता तक उसकी मर्जी के बगैर नहीं हिल सकता। पर ये लोग भी जब सड़क पार करते हैं तो इधर—उधर देख के चलते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि सबकुछ ईश्वर नहीं तय करता।

आखिर में मैं यही कहूंगा कि 1982 से 1993 तक हर रोज मैंने व्हीलचेयर पर उस आदमी को आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में आते—जाते देखा, जो न सिर्फ विज्ञान और भौतिकी के क्षेत्र की महानतम वैज्ञानिक है, बल्कि इंसानी जिंदगी को जीवटता के साथ जीने का एकमात्र अविश्वनीय उदाहरण भी है। जिसको जीना बहुत आसान है, लेकिन तब अगर आंखों में सपना हो।

(वरिष्ठ भौतिक विज्ञानी और आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के फेलो वसी हैदर 1982 से 1993 तक आॅक्सफोर्ड में फेलो रहे और उसी दौरान स्टीफन हॉकिंस आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में ही फिजिक्स के प्रोफेसर थे।)

(यह लेख अजय प्रकाश से बातचीत पर आधारित और दैनिक भास्कर से साभार।)


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