कहानी क्या है? यह हमेशा से साहित्य में विवाद का विषय रहा है। हर लेखक अपने हिसाब से अपने अनुभवों के आधार पर कहानियां लिखता रहा है। हिन्दी कहानी के सौ सवा साल के इतिहास में कई तरह की कहानियां लिखी गयीं। हिंदी कहानी में इतनी विविधताएं हैं कि वह विश्व की कहानियों के समकक्ष है, फिर भी समाज और जीवन के कई कोने अलक्षित हैं। युवा कहानीकार सुधांशु गुप्त की यहां दी जा रही कहानी ‘अक्स’ में उन्होंने खुद का ही अन्वेषण किया है। क्या कहानीकार मूलतः अपना ही अन्वेषक होता है। सुधांशु का हाल ही में एक कहानी संग्रह ‘चाय का आखिरी कप’ आया है। उनके दो संग्रह आये हैं और देश की सभी पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं छप चुकी हैं। आइए पेशे से पत्रकार रहे सुधांशु गुप्त की कहानी अक्स —विमल कुमार, वरिष्ठ पत्रकार और कवि

सुधांशु गुप्त

अक्स

मैंने कई बार सोचा है एक कहानी लिखूं। सोचता हूं। कहानी क्या होती है? क्यों लिखता है आदमी कहानी? क्या अधिकार है उसे किसी के बारे में लिखने का? क्यों लिखता है वह किसी के बारे में। क्या सिर्फ आत्मतुष्टि के लिये? या खुद को दूसरों पर जाहिर करने के लिये? या हो सकता है अपना अस्तित्व सिद्ध करने के लिए। क्या अंदर उठती हुई कल्पनाओं को कागज पर बिखेर देने को ही कहानी कहा जा सकता है? कुछ भी हो…!

मैं आज कहानी लिखूंगा।

तुम्हारे बारे में। हां, हां तुम्हारे बारे में जरूर लिखूंगा। आज जरूर लिखूंगा। मैं रोज ऐसे ही सोचता हूं। सिर्फ सोच ही पाता हूं। लिख नहीं पाता। कमजोरी है। पर तुम जानती हो मैं बहुत कम निश्चय करता हूं। जानता हूं न अपनी सामर्थ्य को। कुछ भी हो मैं अपने इस निश्चय को जरूर पूरा करूंगा।

अकसर क्या होता है मैं जब भी कहानी लिखने बैठता हूं मेरे अंदर, न जाने कहां से अपराधबोध जन्म ले लेता है। बस फिर मैं कहानी नहीं लिख पाता। सफेद कागज काले हो जाते हैं, स्याही पैन में ही सूख जाती है। कहानी अधूरी रह जाती है। हर बार की तरह। मैं फिर तय कर लेता हूं कि मैं कहानी लिखूंगा।

मेरी यह अपराध करने की इच्छा मरती नहीं है। बढ़ रही है। धीरे-धीरे तेज हो रही हो रही है। अंदर अपराध करने की इच्छा हो तो आदमी भयानक हो जाता है। भयानक आदमी से डर लगता है। अंदर अपराध करने की इच्छा हो और मर जाये तो आदमी जानवर हो जाता है। जानवर आदमी और भी खतरनाक लगता है। मैं नहीं चाहता कि मेरी यह इच्छा मरे। मैं भयानक नहीं होना चाहता। मैं जानवर नहीं होना चाहता।

हां, मुझे एक कहानी लिखनी है। तुम्हारे बारे में। सिर्फ तुम्हारे ही बारे में।

मुझे नहीं मालूम तुम कौन हो। मैं यह भी जानता हूं कि तुम्हें भी यह नहीं मालूम होगा कि मैं कौन हूं। बस मुझे यह मालूम है कि तुम हो… तुम्हारा होना ही मेरे लिये तुम्हारा परिचय है।

न जाने आदमी इतनी मूर्खताएं क्यों करता है। कोई चीज देखी और पसंद कर ली और उसे पाने की लालसा पाल ली। बस इसी लालसा को वह अपना उद्देश्य मान लेता है। यह सोचकर खुश हो लेता है कि चलो सार्थकता का बोध ही सही, हुआ तो। निरर्थक जीवन सार्थक हो गया। जीवन धन्य। सुख की इस अनुभूति के पीछे न जाने क्या-क्या होता रहता है।

हां, तो मुझे एक कहानी लिखनी है।

मैं कहानी लिख लूंगा। उसको दिखाऊंगा। वह खुश होगी। मुस्करायेगी। मुस्कराते समय वह अच्छी लगती है। अच्छी है। अच्छी कहानी है।

क्या सचमुच अच्छी है?

हां, वाकई अच्छी है वह दोबारा दोहरा देगी।

और मुझे विश्वास दिलाने के लिये वह कहेगी-क्यों विश्वास नहीं होता कि तुम अच्छी कहानी लिख सकते हो।

बस, फिर मैं मान लूंगा कि अच्छी कहानी है।

लेकिन ऐसा भी हो सकता है वह नाराज हो जाये। तो मुश्किल हो जायेगी।

‘देखो तुम ऐसी कहानी मत लिखा करो।’ वह कहेगी।

मैं जानते हुए भी पूछूंगा- ‘ऐसी मानी।’

‘ऐसी मानी, मुझ पर। हां, मुझ पर तुम कहानी बिल्कुल नहीं लिखोगे।

मैं भोले बच्चे की तरह कह दूंगा ‘‘ठीक है आगे से नहीं लिखूंगा। और अगर लिखूं भी तो दण्ड दे देना, मैं स्वीकार कर लूंगा।

‘नहीं-नहीं अब तुम कभी लिखोगे ही नहीं।’

‘अच्छा, बाबा! माफ कर दो अब नहीं लिखूंगा। कभी नहीं।’

‘पर आज मैं निश्चय कर चुका हूं, और कहानी जरूर लिखूंगा।’

मैंने फाइल में से चार ‘फुल स्केप’ कागज लिये। मेज को सरकाया और हाथों को मेज पर रखकर बैठ गया। पैन खोला, सिक्के वाला। सिक्के वाला पैन अच्छा रहता है। निब टूटने का खतरा नहीं रहता। कागजों को एक हाथ से दबाकर पैन चलाया। एक कोरी लाइन खिंच गई। सिक्का खत्म हो गया। अभी तो डलवाया था। ये दुकानदार भी बड़े समझदार होते हैं। दूसरों को अपराध करने से रोकते हैं।

मैंने दूसरा पैन निकाला है।

मैंने इधर-उधर देखा सब सोये पड़े हैं। छोटी सी आलमारी में से घड़ी झांक कर कह रही है ग्यारह बजने में दस मिनट शेष हैं। सुबह कॉलेज जाना है। घड़ी की ही बगल में डिब्बेनुमा रेडियो बोल रहा है। आखिरी समय है। इसके बाद वह भी चुप हो जायेगा। सब चुप हो जाएगा। कमरे में लगा साठ वाट का बल्ब अंधेरे को काफी बस में किये हुए है। फिर भी कहीं न कहीं से अंधेरा फूट कर निकल रहा है। मैंने बाहर की तरफ देखा है। सब सोये पड़े हैं। हां, शायद सोये ही पड़े हैं। रसोई में अंधेरा है। बल्ब बुझा चुके हैं। रसोई में बंधी रस्सी पर कुछ कपड़े लटक रहे हैं, जो बराबर आदमियों के लटकने का भ्रम पैदा कर रहे हैं। मैंने फिर बाहर देखा है। एक खाट बिछी है। उस पर कोई औरत सो रही है। हां, एक जीवित औरत सो रही है। दोनों शायद जीवित पति-पत्नी हैं। अंधेरा बराबर बढ़ रहा हैं। मैंने बाहर देखना बंद कर दिया है।

एक बार फिर घर को अच्छी तरह देखा है। घर में अभी कुछ दिन पहले पुताई हुई है। दीवारों की गंदी परत पर अच्छी परत पोत दी गई है, जो फिर से दीवारों के साफ होने का भ्रम पैदा कर रही है। उन्हें शायद नहीं मालूम गंदी परत अच्छी परत में से दोबारा झांकने लगती है। जैसे कोई गरीब अपनी झोपड़ी में से मुंह निकालकर किसी अमीर की कोठी निहार रहा हो।

कुछ भी हो पुताई कुछ दिन घर को कोठी जरूर बना देती है और कुछ दिन बाद वीभत्स शक्लें दीवारों पर ऐसे उभरने लगती हैं जैसे किसी गधे के सिर सींग उग रहे हों। इन शक्लों को देखकर डर लगता है।

मैं फिर से कहानी लिखने की कोशिश करने लगा। मेज के सामने कुर्सी पर बैठकर। तुम जानती हो हमारे घर में घुसते ही सामने की दीवार हमेशा गंदी रहती है। कितनी बार पुताई भी करवाई है। कुछ दिन के बाद फिर वैसे ही हो जाती है। कई बार भारत और विश्व के नक्शे भी लगाये मगर वो भी कुछ दिन ही चले। आंधी आयी, फट गये। और दीवार का वह हिस्सा फिर उभर आया। मेरा ध्यान उसी दीवार की ओर गया। परत अब भी गायब है।

मैंने आश्चर्य से देखा। दीवार में मुझे कुछ अजीब सा नजर आया। मैंने गौर से देखा। देखता रहा, लगातार देखता रहा। मुझे ऐसा लगा कि दीवार पर पुताई की परत उतरने से एक चेहरा उभर रहा है। मैं पहचानने की कोशिश करने लगा। ध्यान से देखा। अरे! ये तो… नहीं-नहीं। मैंने फिर और ध्यान से देखा। हां, ये तो जाना पहचाना लग रहा है, हां-हां… तुम्हारा… तुम्हारा ही चेहरा तो है… मैंने कागजों की तरफ देखा बिल्कुल खाली… मैंने कहानी लिखना बंद कर दिया है…। कहानी फिर अधूरी छूट गयी।


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