कोर्ट ने कहा आत्मरक्षा का अधिकार न केवल एक व्यक्ति के शरीर के लिए, बल्कि दूसरे व्यक्ति और संपत्ति की सुरक्षा के लिए भी, पुलिस और सुरक्षाबलों द्वारा इसके दुरुपयोग की लगातार बनी रहेंगी आशंकाएं….

जेपी सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

उच्चतम न्यायालय ने आत्मरक्षा के अधिकार का दायरा और व्यापक करते कहा है कि यह अधिकार दूसरे व्यक्ति के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा तक फैला हुआ है। इसके तहत न्यायालय ने एक तमिलनाडु वन रेंजर को बरी कर दिया है, जिसे 1988 में एक कथित चंदन तस्कर को गोली मारने के लिए जेल में डाल दिया गया था।

देखने में यह फैसला जितना अच्छा लग रहा है, व्यवहार में उतना ही खतरनाक है, क्योंकि पुलिस और सुरक्षाबलों द्वारा इसके दुरुपयोग की आशंकाएं लगातार बनी हुई हैं।

उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) आत्मरक्षा का अधिकार के प्रावधानों की व्यापक व्याख्या करते हुये कहा है कि आत्मरक्षा का अधिकार न केवल एक व्यक्ति के शरीर के लिए, बल्कि दूसरे व्यक्ति और संपत्ति की सुरक्षा के लिए है। 7 मार्च 2019 को दिए गए अपने फैसले में जस्टिस एएम सप्रे और आर सुभाष रेड्डी की पीठ ने आत्मरक्षा के अधिकार पर व्यापक रूप से विचार किया है।

आईपीसी की धारा 96 से 106 तक आत्मरक्षा के अधिकार के प्रावधान हैं।1988 में तमिलनाडु के धर्मपुरी वन क्षेत्र में एक चंदन तस्कर की गोली मारकर हत्या करने वाले एक वन रेंजर को उच्चतम न्यायालय ने बरी कर दिया है।

ट्रायल कोर्ट ने रेंजर सुकुमारन को हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मद्रास उच्च न्यायालय ने इस सज़ा को घटाकर पांच साल कर दिया था। अपील में उच्चतम न्यायालय ने निष्कर्ष दिया कि सुकुमारन ने चन्दन तस्कर बाशा को अपनी जान और अपने ड्राइवर चिननकोलंदाई की जान बचाने के लिए गोली मार दी थी।

अभियोजन पक्ष का कहना था कि सुकुमारन ने बाशा को पीठ में गोली मारी थी। रेंजर और उनका ड्राइवर तड़के अपनी जीप में थे। जंगल के चक्कर लगाते हुए जब उन्होंने एक ट्रक को देखा तो उन्होंने उसका पीछा किया। ट्रक रुक गया और बाशा समेत चार लोग बाहर निकल गए। सुकुमारन ने अपनी बंदूक निकाली और बाशा पर गोली चला दी, जिससे उसकी मौत हो गई।

दलील दी कि सुकुमारन ने ट्रक में एक बंदूक रखवाई और 276 किलो चंदन की लकड़ी लदवाई, ताकि बाशा को चन्दन तस्कर के रूप में फंसाया जा सके, मगर उच्चतम न्यायालय ने अभियोजन पक्ष की कहानी पर पूरी तरह से अविश्वसनीय माना और सुकुमारन की दलील पर विश्वास किया। सुकुमारन का कहना था कि बाशा और उनके साथियों ने पहले उनकी जीप पर पथराव किया, जिसके बाद उन्होंने रेंजर पर बंदूक तान दी। सुकुमारन ने इसे तत्काल भांपकर आत्मरक्षा में बाशा पर गोली चला दी। घटना के बाद तुरंत शिकायत दर्ज की गई और बाशा के दो साथियों को पुलिस स्टेशन लाया गया।

उच्चतम न्यायालय का कहना था कि इतने तड़के बाशा और उसके साथियों के लिए वन क्षेत्र में घंटों घूमने का कोई कारण नहीं था। चंदन एक महंगी वस्तु है। सुकुमारन केवल अपने जीवन और अपने चालक की रक्षा करने की कोशिश कर रहे थे। वह अपना कर्तव्य निभा रहे थे। इसके अलावा, अभियोजन पक्ष के चार गवाह पक्षद्रोही हो गये और बाकी की गवाही से 1988 में हुई घटना किसी तरह प्रमाणित नहीं हुई। अभियोजन पक्ष ने अपने आरोप पत्र में जिस तरह कथित रूप से घटना घटने का वर्णन किया उसे साबित नहीं कर सका। इस मामले में अपीलकर्ता सुकुमारन के खिलाफ कोई भी सबूत नहीं है, इसलिए वह आरोप से बरी होने का हकदार है।

फैसले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दर्शनसिंह बनाम पंजाब मामले में प्रतिपादित कुछ दिशानिर्देशों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि निजी स्तर पर एक निश्चित क्षेत्राधिकार को सभी लोकतांत्रिक देशों में मान्यता दी गई है।आत्मरक्षा का अधिकार हर व्यक्ति को है, जब वह अचानक किसी खतरे में घिरा हो, जो स्वयं द्वारा निर्मित न हो। एक मामूली आशंका हो कि किसी तरह का खतरा है तो व्यक्ति आत्मरक्षा को अपना सकता है।

यह जरूरी नहीं है कि सामने वाला कोई कदम उठाए, फिर भी आपको आत्मरक्षा का अधिकार होता है। संदेह होते ही यह अधिकार शुरू होता है। यह एकदम अव्यावहारिक है कि जो व्यक्ति प्रताड़ित किया जा रहा है, वह अपनी खुद की रक्षा के लिए कदम-दर-कदम गणितीय विधा से आगे बढ़े।

आत्मरक्षा के लिए जो साधन प्रयोग किया है, वह मौके की नजाकत से अधिक सशक्त हो। शंका होने के बाद आत्मरक्षा करने वाले को कुछ साबित करने की जरूरत नहीं रहती है। शरीर के किसी अंग को नुकसान की शंका होने पर पलटवार कर सकते हैं, भले ही उससे हमलावर की मौत हो जाए।

कानून में आत्मरक्षा का अधिकार
भारतीय दण्ड संहिता 96 से लेकर 106 तक की धाराओं में हर एक व्यक्ति को आत्मरक्षा का अधिकार दिया गया है। लेकिन वो सिर्फ आत्मरक्षा होनी चाहिए, प्रतिरोध या उसे दी जाने वाली सज़ा नहीं।

भारतीय दण्ड संहिता 96 से लेकर 106 तक की धाराओं में हर एक व्यक्ति को आत्मरक्षा का अधिकार दिया गया है।अपनी संपत्ति की रक्षा, चोरी, डकैती, शरारत व अपराधिक गतिविधियों के खिलाफ आत्मरक्षा का अधिकार दिया गया है। इसमें आप ख़ुद को बचा सकते हैं, सामने वाले व्यक्ति को दण्ड नहीं दे सकते। दण्ड देना क़ानून का काम है।

अपनी संपत्ति की रक्षा, चोरी, डकैती, शरारत व अपराधिक गतिविधियों के खिलाफ आत्मरक्षा का अधिकार दिया गया है।आईपीसी की धारा 103 के मुताबिक लूट, रात में घर में सेंधमारी, आगजनी, चोरी जैसी किसी भी स्थिति में अगर जान का खतरा हुआ तो आक्रमणकारी की हत्या करना भी ग़लत नहीं होगा।

गौरतलब है कि इसके पहले उच्चतम न्यायालय ने भी आत्मरक्षा के अधिकार से जुड़े मामले में एक निर्णय के दौरान कहा था कि कानून का पालन करने वाले लोगों को कायर बने रहने की जरूरत नहीं है, ख़ासकर तब जबकि आपके ऊपर गैरक़ानूनी तरीके से हमला किया जाए। उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था कहा था कि हमले की स्थिति में आम आदमी को आत्मरक्षा के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। न्यायमूर्ति पीपी नावलेकर और न्यायमूर्ति लोकेश्वर पंटा की खंडपीठ ने पंजाब के अंतराम की हत्या के दोषी बाबूराम और इंद्रराज को आजीवन कारावास की सजा देने के फैसले को दरकिनार करते हुए यह व्यवस्था दी थी।

उच्चतम न्यायालय ने इसके पहले भी आत्मरक्षा का दायरा बढाते हुये व्यवस्था दी थी कि यदि किसी को अपनी जान का जरा सा भी खतरा हो तो वह आत्मरक्षा की पहल कर जवाब दे सकता है। इसमें साफ कहा गया है कि यदि किसी को अपनी जान का जरा सा भी खतरा हो तो वह आत्मरक्षा की पहल कर जवाब दे सकता है। यह जरूरी नहीं है कि पीड़ित के साथ कोई घटना हो। उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति एसए बोबड़े और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर ने सुरेश बनाम दिल्ली में यह व्यवस्था दिया था।

अब उच्चतम न्यायालय ने सुकुमारन मामले में आत्मरक्षा के अधिकार का दायरा और व्यापक करते हुये इसे न केवल एक व्यक्ति के शरीर के लिए, बल्कि दूसरे व्यक्ति और संपत्ति की सुरक्षा के लिए भी बढ़ा दिया है।


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