Last Update On : 23 10 2018 06:48:52 PM

शुरू से ही विवादों में रही आॅलवेदर रोड (चारधाम महामार्ग विकास परियोजना) के लिए बेहद संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में न केवल 40000 से अधिक पेड़ काटे जा रहे हैं, बल्कि पहाड़ों के कटान से निकलने वाले हज़ारों टन मलबे के निस्तारण की भी नहीं बनाई गई है कोई योजना…

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

उच्चतम न्यायालय ने कल सोमवार 22 अक्टूबर को केंद्र और उत्तराखंड सरकार को तगड़ा झटका देते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के आदेश पर रोक लगा दी, जिसने महत्वाकांक्षी चारधाम आॅलवेदर रोड प्रोजेक्ट (चारधाम महामार्ग विकास परियोजना) को मंजूरी दी थी।

इस परियोजना में उत्तराखंड के चारों पवित्र शहरों का हर मौसम में संपर्क स्थापित रखने का प्रस्ताव था। हर मौसम में सड़क संपर्क बनाए रखने के लिए पहाड़ी राज्य के चारों शहर यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ हैं।

जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की पीठ ने देहरादून के एनजीओ ग्रीन दून की विशेष अनुमति याचिका पर रोक का आदेश जारी करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर मांगा जवाब है। मामले की सुनवाई 15 नवंबर गुरुवार को होगी। एनजीओ ने एनजीटी के आदेश के खिलाफ एसएलपी दायर कर चुनौती दी थी।

हालांकि ऑल वेदर रोड से अविरल गंगा व हिमालय बचाने के संघर्षों में लगा मातृ सदन इसे सिर्फ जीत के एक पड़ाव के रूप में देखता है। मातृ सदन का कहना है कि जबतक ऑल वेदर रोड के प्रोजेक्ट को नहीं रोका जाता, जीत नहीं मानी जायेगी। स्टे का क्या है, कल को कोई और जज आएगा और स्टे हटा देगा।

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एनजीटी ने दी थी अनुमति
एनजीटी ने 26 सितंबर का आदेश देकर इस परियोजना को हरी झंडी दे दी थी और आॅलवेदर रोड के बनने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को देखने के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन कर दिया था। एनजीटी में ग्रीन दून और अन्य लोगों द्वारा इस परियोजना को चुनौती दी थी और कहा था कि इससे पहाड़ों के पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा।

याचिकाकर्ता के अनुसार परियोजना बिना किसी पर्यावरण मंजूरी के शुरू हुई है और उचित वन मंजूरी के बिना 25000 से अधिक पेड़ काटे गए हैं। इसके अलावा इससे पहाड़ों और गंगा की सहायक नदियों को व्यापक नुकसान होगा क्योंकि मलबे की डंपिंग के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं की गई है।

2016 से चल रही है परियोजना
चारधाम आॅलवेदर रोड परियोजना 889 किमी की है। परियोजना के तहत 440 किमी पर काम शुरू हो चुका है। यह परियोजना 12 हजार करोड़ की है। इसमें 132 ब्रिज, 25 हाई फ्लड लेबल ब्रिज, 13 बाईपास बनाये जाने हैं। इसके तहत 115 बस स्टैंड, 9 ट्रक स्टैंड, 3889 वाटर वार्ट बनेंगे। 2020 तक परियोजना को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

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आॅलवेदर रोड परियोजना का शुभारंभ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 दिसम्बर 2016 को किया था।परियोजना का काम इस समय तेजी से चल रहा है। बड़ी मात्रा में सड़कों का चौड़ीकरण किया जा रहा है। यदि काम अब बीच में रोका गया तो इससे सड़कों की स्थिति सुधारने में वक्त लगेगा।

चालाकी से बनायी गयी थी परियोजना
गौरतलब है कि केंद्रीय सड़क और परिवहन मंत्रालय ने 900 किलोमीटर लम्बी परियोजना को 53 टुकड़ों में बांटकर दिखाया था, ताकि इन्वायरमेंटल क्लीयरेंस यानी पर्यावरण संबंधी हरी झंडी न लेनी पड़े। चूंकि किसी भी 100 किलोमीटर से अधिक लम्बी सड़क के लिये पर्यावरणीय अनुमति अनिवार्य है, इसलिए एक ही परियोजना को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर मंत्रालय इस कानूनी अड़चन से छुटकारा पाना चाहता था।

लेकिन आॅलवेदर रोड महत्वाकांक्षी सड़क परियोजना शुरू से ही विवादों में रही, क्योंकि इसके लिये बेहद संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में न केवल 40000 से अधिक पेड़ काटे जा रहे हैं, बल्कि पहाड़ों के कटान से निकलने वाले हज़ारों टन मलबे के निस्तारण की भी कोई योजना नहीं बनायी गयी है।

पहाड़ को काटकर सीधे नदियों में गिराया जा रहा मलबा आने वाले दिनों में विनाशकारी आपदाओं की वजह बन सकता है। 2013 की केदारनाथ आपदा इसकी गवाह रही है जिसमें बांध परियोजनाओं की गाद ने विनाशलीला में अहम योगदान दिया यह बात सरकार द्वारा गठित कई विशेषज्ञ समितियों ने भी कही है, लेकिन परियोजना को क्रियान्वित करने वाले काफी जल्दबाज़ी में हैं।

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अति संवेदनशील भूकम्पीय क्षेत्र
पर्यावरणविदों के अनुसार उत्तराखंड के जिन पहाड़ों को अंधाधुंध तोड़ा जा रहा है वह अति संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र (ज़ोन 5) में हैं। यहां 100 से अधिक छोटी-बड़ी जल विद्युत परियोजनायें पहले से चल रही हैं और सैकड़ों प्रस्तावित हैं। इनके कारण भी नाज़ुक इकोज़ोन में काफी बर्बादी हो चुकी है, जिसे विकास के नाम पर ढका जा रहा है।

जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में बताया जा चुका है कि उत्तरकाशी से गंगोत्री के बीच ही तीन दर्जन से अधिक लैंड स्लाइड ज़ोन हैं, जहां हर साल भूस्खलन होते हैं।

तेजी से पिघल रहा गंगोत्री ग्लेशियर
वैधानिक शोध से साबित हो चुका है कि गंगोत्री ग्लेशियर हिमालय के तेज़ी से पिघलते ग्लेशियरों में है फिर भी गंगोत्री नेशनल पार्क के आसपास घने जंगलों को काफी तबाह किया जा चुका है। जिस बचे खुचे जंगल को काटा जा रहा है वह इस महत्वपूर्ण ग्लेशियर के लिये एक ढाल की तरह काम करता है।

अगर गंगोत्री ग्लेशियर का वजूद नहीं रहेगा तो चारधाम परियोजना क्या हासिल करेगा, क्योंकि यही ग्लेशियर तो नदियों का प्रमुख स्रोत है। नीति आयोग ने भी हिमालय के तेज़ी से सूख रहे जलस्रोतों पर चिन्ता जताते हुये कहा है कि 60 प्रतिशत से अधिक स्रोत खात्मे की कगार पर हैं।