राजनीति में अपराधीकरण और भ्रष्टाचार, लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है। उच्चतम न्यायालय ने इस मसले को संसद के पाले में डाल दिया है…

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने राजनीतिक के अपराधीकरण मामले में फैसला सुनाते हुए आज 25 सितंबर को कहा है कि भ्रष्टाचार एक संज्ञा है। भ्रष्टाचार राष्ट्रीय आर्थिक आतंक बन गया है और भारतीय लोकतंत्र में संविधान के बावजूद राजनीति में अपराधीकरण का ट्रेंड बढ़ता जा रहा है। कानून का पालन करना सबकी जवाबदेही है। अब वक्त आ गया है कि संसद ये कानून लाए, ताकि अपराधी राजनीति से दूर रहें।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि सांसदों और विधायकों के वकालत करने से नहीं रोक सकते। संविधान कहता है कि कोई भी तब तक निर्दोष है, जब तक वह दोषी करार न दिया गया हो। कानून बनाना संसद के अधिकार-क्षेत्र में है, अयोग्यता का प्रावधान अदालत नहीं जोड़ सकती। यह संसद का काम है कि वह राजनीति के अपराधीकरण पर रोक लगाने का काम करे। अपराधियों को राजनीति में आने से रोकने के लिए संसद कानून बना सकती है।

उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि वह विधायिका के दायरे में जाकर दागी नेताओं को चुनाव से प्रतिबंधित कर लक्ष्मण रेखा नहीं लांघ सकता। एक और याचिका पर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि विधायक-सांसद देश की विभिन्न अदालतों में वकालत करना जारी रख सकते हैं।

उच्चतम न्यायालय ने पांच साल या उससे ज्यादा सजा होने वाले मामले में आरोप तय होने के बाद चुनाव लड़ने से अयोग्य करार देने से इनकार कर दिया है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अयोग्यता का प्रावधान अदालत नहीं जोड़ सकती। यह काम संसद का है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सरकार को चाहिए कि इस मामले में प्रावधान के बारे में सोचे। राजनीति में अपराधीकरण और भ्रष्टाचार, लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है। उच्चतम न्यायालय ने इस मसले को संसद के पाले में डाल दिया है।

उम्मीदवारों को अपने ऊपर दर्ज आपराधिक केसों की जानकारी देनी होगी। पार्टियों को चुनाव में उतरे उम्मीदवारों के बैकग्राउंड की जानकारी इंटरनेट और मीडिया पर देनी चाहिए। चुनाव आयोग का फॉर्म बोल्ड लेटर्स में भरा जाना चाहिए। उम्मीदवारों पर दर्ज आपराधिक मामलों के संबंध में पार्टियों को भी जानकारी होनी चाहिए। उम्मीदवारों की ओर से अपनी बैकग्राउंड और खुद पर दर्ज आपराधिक मामलों की जानकारी देना जरूरी है।

राजनीति के अपराधीकरण में इजाफा हो रहा है। इस पर रोक लगनी ही चाहिए। भ्रष्टाचार आर्थिक आतंकवाद की तरह से है। किसी को चुनाव लड़ने से सिर्फ चार्जशीट दाखिल होने पर नहीं रोका जा सकता। गौरतलब है कि कुल 1518 नेताओं पर केस दर्ज हैं, इसमें 50 से ज्यादा सांसद हैं। 35 नेताओं पर बलात्कार, हत्या और अपहरण जैसे गंभीर आरोप हैं। महाराष्ट्र के 65, बिहार के 62, पश्चिम बंगाल के 52 नेताओं पर केस दर्ज़ हैं।

उच्चतम न्यायालय ने दागी नेताओं को चुनाव लड़ने से तो नहीं रोका, लेकिन काफी सख्ती जरूर दिखाई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन कैंडिडेट के खिलाफ क्रिमिनल केस पेंडिंग हो, वह नामांकन के वक्त हलफनामा जब दाखिल करें तो क्रिमिनल केस के बारे में बोल्ड अक्षरों में लिखें। वोटर को इस बात का पूरा अधिकार है कि वह जाने कि कैंडिडेट का क्रिमिनल रिकॉर्ड क्या है। न्यायालय ने कहा कि अगर कोई कैंडिडेट चुनाव के लिए खड़ा होता है तो पॉलिटिकल पार्टी उसके क्रिमिनल रिकॉर्ड के बारे में मीडिया के जरिये विस्तार से लोगों को बताए। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक सभी प्रकार के विज्ञापनों में इसकी जानकारी देने को कहा गया है।

कोर्ट ने कहा कि सारे राजनीतिक दलों को अपनी वेबसाइट पर सभी उम्मीदवारों के आपराधिक इतिहास की जानकारी देनी होगी। फैसला सुनाते वक्त चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा ने कहा कि भ्रष्टाचार राष्ट्रीय आर्थिक आतंक है। उच्चतम न्यायालय में याचिकाएं दाखिल कर पांच साल या उससे ज्यादा सजा के मामले में अरोप तय होने के बाद चुनाव लड़ने से रोक की गुहार लगाई गई थी। क्या चुनाव आयोग ऐसी व्यवस्था कर सकता है कि जो लोग क्रिमिनल बैकग्राउंड के हैं उनके बारे में डीटेल सार्वजनिक की जाए।

अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि जहां तक सजा से पहले ही चुनाव लड़ने पर बैन का सवाल है तो कोई भी आदमी तब तक निर्दोष है जब तक कि कोर्ट उसे सजा नहीं दे देता और संविधान का प्रावधान यही कहता है।

क़ानून बनेगा तभी अपराधी राजनीति से दूर होंगे और वक़्त आ गया है कि संसद जल्द क़ानून बनाए। संविधान पीठ ने कहा कि पैसा, बाहुबल को राजनीति से दूर रखना संसद का कर्तव्य है और राजनीतिक अपराध लोकतंत्र की राह में बाधा है। पांच सदस्यीय पीठ ने कहा है कि उम्मीदवारों को लंबित आपराधिक मामलों को फ़ॉर्म में मोटे अक्षरों में लिखकर चुनाव आयोग को जानकारी देनी होगी। पार्टियों को भी आपराधिक केसों की जानकारी देनी होगी। पार्टियां इन जानकारियों को वेबसाइट पर डालेंगी, इनका प्रचार करेंगी।

पार्टियों को चुनाव से पहले नामांकन के बाद तीन बार प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर उम्मीदवारों के सभी रिकॉर्ड की तफसील से प्रकाशित प्रसारित करानी होगी। कहा कि ये संसद का कर्तव्य है कि वो मनी एंड मसल पावर को राजनीति से दूर रखे। किसी मामले में जानकारी प्राप्त होने के बाद उस पर फैसला लेना लोकतंत्र की नींव है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का अपराधीकरण चिंतित करने वाला है।

आपराधिक मामलों में मुकदमों का सामना कर रहे जनप्रतिनिधियों को आरोप तय होने के स्तर पर चुनाव लड़ने के अधिकार से प्रतिबंधित करना चाहिए या नहीं इस सवाल को लेकर दायर विभिन्न याचिकाओं सिविल रिट 536/2011 पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन एवं अन्य बनाम यूनियन तथा अन्य और कुछ दूसरी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने यह फैसला दिया है।

भाजपा नेता और पेशे से वकील अश्विनी उपाध्याय ने उच्चतम न्यायालय ने एक अन्य याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि जनप्रतिनिधि सरकारी वेतन, भत्ते और सुविधाएं लेते हैं। नियमों के मुताबिक वेतनभोगियों को प्रैक्टिस का अधिकार नहीं है। साथ ही संसद-विधानसभा में कानून बनाने वाले लोगों का कोर्ट में कॉरपोरेट घरानों की वकालत करना नैतिक रूप से भी गलत है।

इसमें पेशे से वकील जनप्रतिनिधियों (सांसद, विधायकों और पार्षदों) के कार्यकाल के दौरान अदालत में प्रैक्टिस करने पर रोक लगाने की मांग की गई थी। उच्चतम न्यायालय ने आज बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों को वकालत करने से नहीं रोका जा सकता। पीठ ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के हवाला दिया। पीठ ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम जनप्रतिनिधियों के वकीलों के तौर पर प्रैक्टिस करने पर रोक नहीं लगाते हैं। उच्चतम न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और की पीठ ने नौ जुलाई को भाजपा नेता एवं अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की उस जनहित याचिका पर आदेश सुरक्षित रखा था जिसमें सांसद, विधायक के विधायिका में कार्यकाल के दौरान अदालतों में वकालत करने पर पाबंदी लगाने की मांग की गई थी।

पीठ ने केन्द्र की इस दलील पर संज्ञान लिया था कि सांसद या विधायक निर्वाचित जनप्रतिनिधि होता है, सरकार का पूर्णकालिक कर्मचारी नहीं होता और इसलिए याचिका विचार योग्य नहीं है।

(विभिन्न समाचार पत्रों से जुड़े रहे जेपी सिंह कानूनी विषयों के जानकार हैं।)