दलितों का इस दहलीज से आगे प्रवेश है वर्जित : लोहाघाट रेगड़ू का शिव मंदिर

देवभूमि के नाम से ख्यात उत्तराखंड में दलितों के साथ हो रहा है यह अपराध, लेकिन समाज से लेकर सरकार ने साध रखी है चुप्पी

उत्तराखंड में अकेले लोहाघाट में नहीं है ऐसी जातिद्वेष की व्यवस्था, बल्कि गांवों में अगड़ों के कुल देवता के मंदिरों में भी दलितों को नहीं रखने दिया जाता पांव, देवता का डर दिखा खदेड़ दिए जाते हैं मंदिरों के द्वार से

जनज्वार। आमतौर पर जितने बड़े पैमाने पर देशभर से दलित उत्पीड़न की घटनाएं सामने आती हैं, उस तरह देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखण्ड से ऐसी खबरें मीडिया में आमतौर पर बहुत कम आती हैं। इससे सामान्य सी धारणा बनती है कि शायद वहां दलितों के प्रति वैसा दुर्व्यवहार न होता हो, जैसा कि पूरे देश में होता है।

मगर यह सच नहीं है, दलित वहां भी भेदभाव—छुआछूत के शिकार होते हैं। हालांकि आर्थिक रूप से मजबूत दलितों को इस दुर्व्यवहार को थोड़ा कम झेलना पड़ता है। वहां ज्यादातर जगहों पर दलित मंदिरों में प्रवेश नहीं कर पाते। पुजारी मंदिर में प्रवेश लेने वाले लोगों से पहले जाति पूछता है, तब उन्हें भगवान के दर्शन करने देता है।

ऐसा ही एक मामला सामने आया है चंपावत जनपद के लोहाघाट स्थित रेगड़ू के शिवमंदिर का। यहां एक दलित महिला चंपा देवी (बदला हुआ नाम) जब इस मंदिर में पूजा करने गई तो पुजारी ने पहले उससे उसकी जाति पूछी। दलित जाति का जानने पर उसने चंपा देवी को मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया। कहा कि मैं तुम्हारे बदले भगवान को चढ़ावा चढ़ा दूंगा, तुम्हारे प्रवेश से भगवान अपवित्र हो जाएंगे। तुम्हें यहीं मंदिर के बाहर प्रसाद दे दिया जाएगा।

चंपा देवी अकेली महिला नहीं हैं जिन्हें दलित होने के चलते मंदिर में प्रवेश न करने दिया गया हो, यहां आने वाले किसी भी दलित को मंदिर में नहीं जाने दिया जाता। गौरतलब है कि रेगड़ू शिवमंदिर लोहाघाट शहर में स्थित है। सवाल है जब शहर—कस्बों में दलितों को जाति पूछकर मंदिर में प्रवेश न करने दिया जाता हो तो गांवों में तो अगड़ी जाति के लोग उन्हें मंदिर के पास फटकने भी न देते होंगे।

मगर बजाय प्रतिकार के दलितों में अगड़ी जातियों का इतना ज्यादा डर और अंधविश्वास इस तरह हावी है कि कोई इस बात की शिकायत प्रशासन से नहीं करता। तभी तो खुद जाति से दलित होने के बावजूद लोहाघाट के एसडीएम दलित उत्पीड़न से परिचित नहीं हैं। लोहाघाट एसडीएम रमेश चंद्र गौतम ने जनज्वार से हुई बातचीत में कहा, ‘ऐसा कुछ नहीं है, न ही दलितों के मंदिर प्रवेश पर किसी तरह की कोई मनाही है। हमारे पास अभी तक इस तरह की कोई शिकायत भी नहीं आई हैं। यहां देवीढोरा बग्वाल मेला लगता है, वहां भी इस तरह की कोई घटना सामने नहीं आई। हालांकि गांवों की अगड़ी जातियों के लोग अपने कुलदेवता के मंदिरों में दलितों को प्रवेश नहीं करने देते, यह बात सही है। लेकिन यह उनका निजी मंदिर है, इसलिए प्रशासन उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करता।’

चंपावत जिले के पूर्व एडीएम और इस समय उत्तरकाशी में तैनात हेमंत वर्मा भी कहते हैं कि ‘मैं यहां करीब 2 साल रहा, लेकिन कभी ऐसी कोई शिकायत सामने नहीं आई।’

लोहाघाट, रिकेसर का शिव मंदिर जहां पुजारी करवाता है जाति पूछकर भगवान के दर्शन

हालांकि जहां प्रशासनिक अधिकारी दलितों के मंदिर प्रवेश की शिकायतों से अनभिज्ञता जताते हैं, वहीं मीडिया में आई खबरें खुलासा करती हैं कि वहां भी कई मंदिरों में दलितों का प्रवेश पूर्णत: वर्जित है। 2016 में घटित वो घटना अभी लोगों के जेहन में ताजा होगी, जब उत्तराखण्ड में दलितों को देहरादून के पोखरी क्षेत्र के एक प्राचीन शिव मंदिर में प्रवेश दिलवाने जा रहे सांसद तरुण विजय को यह कहते हुए अगड़ी जाति के स्थानीय युवाओं ने बुरी तरह पीटा था कि हम किसी भी हाल में दलितों को मंदिर में प्रवेश नहीं करने देंगे, फिर चाहे हमें इसके लिए किसी भी हद तक जाना पड़े।

उत्तराखंड के जागेश्वर में स्थित ख्यात शिव मंदिर में भी दलितों का प्रवेश वर्जित है। यहां के वरिष्ठ पुजारी हीरा वल्लभ भट्ट और केशव दत्त भट्ट ने इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में स्वीकारा था कि निचली जाति के लोगों को प्रांगण के बाहर से प्रार्थना करने का अधिकार है, वे अंदर नहीं आ सकते। पहले तो दलित जाति के लोग इतना नजदीक भी नहीं आ सकते थे।

उत्तराखंड के ही बागेश्वर जनपद में स्थित बैजनाथ मंदिर उन कुछ मंदिरों में शुमार है जहां निचली जाति के लोगों के प्रवेश पर अघोषित रोक है। इंडिया टुटे में प्रकाशित खबर के मुताबिक ही यहां दलितों को प्रवेश की बिल्कुल इजाजत नहीं है। यहां सिर्फ ब्राह्मण और क्षत्रियों को प्रवेश मिलता है।

न सिर्फ मंदिर में प्रवेश मामले में बल्कि कई अन्य तरह से छुआछूत और अस्पृश्यता का सामना उत्तराखण्ड में रहने वाले दलित करते रहते हैं। लोहाघाट मूल के दलित युवा नितिन कालाकोटी कहते हैं, ‘अगर हम किसी राजपूत या ब्राह्मण के घर जाते हैं तो हमें चाय भी अलग से दी जाती है। अगर गलती से हमने खाना खाते वक्त या फिर चाय ​पीते वक्त अगड़ों को छू लिया तो वह लोग फिर उसे फेंक देते हैं। दिल्ली में रहने वाले नितिन एक घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं, हमारा परिवार शुरू से महानगर में रहा है, तो दलितों के साथ होने वाले भेदभाव को इस स्तर पर नहीं झेला था। लगता था उत्तराखण्ड में दलित उत्पीड़न उस तरह से नहीं होता, जैसा देश के अन्य राज्यों में, मगर सच्चाई तब सामने आई जब एक बार मैं अपने ग्राम प्रधान के घर किसी काम से गया था। उनकी पत्नी ने हमें चाय दी, मैंने चाय यह कहते हुए लौटा दी कि मैं नहीं पीता। उन्होंने मेरे सामने ही वह चाय इसलिए फेंक दी कि मैं उसे छू चुका था। उन्होंने तर्क भी दिया कि इसे तुमने छू लिया है इसलिए अब हममें से तो कोई इस चाय को पी नहीं सकता था।’

मंदिर में दलितों को प्रवेश न करने के सवाल पर लोहाघाट के राईकोट गांव के दलित युवा राजेंद्र राम कहते हैं, इन अगड़ों को हमारे हाथ की छूत तब नहीं लगती, जब हमसे अपने घर के तमाम काम करवाते हैं। भगवान के मंदिर में भी ये लोग हमारे घरों से पैसे या अनाज वगैरह तो तुरंत ले लेते हैं, मगर हमारा छूते ही मंदिर अस्पृश्य और भगवान अपवित्र हो जाता है, जबकि इसका निर्माण करने में हमारे ही जाति के लोग शामिल होते हैं। आखिर कौन से संविधान में लिखा है कि मंदिर में हम दलितों का जाना मना है।‘

लखनऊ में कार्यरत लोहाघाट के पाटन गांव के दिनेश राम कहते हैं, हमारे प्रति आज भी छुआछूत किस हाइट तक है, अगर इसका पता लगाना है तो बहुत ही साधारण सा रास्ता है कि एक छात्र के बतौर पिथौरागढ़, लोहाघाट, बेरीनाग, थल, अल्मोड़ा जैसे शहरों में चले जाइए, वहां जाकर देखिए कि छात्रों तक तक को कमरा आपकी जाति के आधार पर मिलता है। अगड़ी जाति के लोग हम दलितों को अपना किराएदार तक नहीं बनाते।

वहीं क्लीगॉव और कोली के कई दलित युवा सामूहिक तौर पर कहते हैं कि पुराने जमाने में तो छोड़िए आज के इस शिक्षित समाज में भी हमें ये सब हमें झेलना पड़ता है तो बहुत तकलीफ होती है। किसी बड़े महानगर में बसने के बाद पहाड़ वापस लौटने का कोई मोह नजर नहीं आता, न ही अपनी जड़ों से कोई लगाव महसूस होता है, क्योंकि वहां हमें सिवाय अस्पृश्यता के कुछ नजर नहीं आता। शैक्षिक और आर्थिक रूप से तरक्की के बावजूद गांवों में हमें उसी नजर से देखा जाता है।

हल्द्वानी में पत्रकार नरेंद्र देव दलितों के मंदिर में प्रवेश न करने देने के मुद्दे पर कहते हैं, ‘उत्तराखण्ड में जातिवाद अन्य राज्यों से भी कहीं ज्यादा गहरी जड़ें जमाए हुए हैं। धार्मिक स्थलों पर भेदभाव अकसर नजर आता है। इस जातिवाद को प्रश्रय देने का काम कहीं न कहीं अंधविश्वास ने भी किया है। देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखण्ड में हल्द्वानी जैसे बड़े शहर में तक कुछ मंदिरों में दलित नहीं जा सकते। यह कोई एक मंदिर से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि् ऐसे दर्जनों मंदिर हैं जहां उन्हें प्रवेश नहीं करने दिया जाता। दूसरी बात कहीं न कहीं दलितों में भी यह अंधविश्वास गहरे पैठा हुआ है कि अगर हमने मंदिर में प्रवेश किया तो भगवान अछूत हो जाएंगे और हमें उसके बुरे परिणाम भुगतने होंगे। रिपोर्टिंग के दौरान यह बातें भी शिद्दत से अनुभव की कि इसी जातिवाद के कारण दलितों की आर्थिकी पर भी जबर्दस्त चोट पहुंची है। मंदिर में पुजारी तो दूर की बात वे कोई खाने—पीने की दुकान तक नहीं खोल सकते, कई अन्य तरह के व्यवसाय नहीं कर सकते, जिससे आमतौर पर आर्थिक तौर पर पिछड़े रहते हैं।’

उत्तराखण्ड में शैक्षिक हब कहे जाने वाले अल्मोड़ा तक में जातिवाद ने अपनी जड़ें बहुत गहरे बैठा रखी हैं। दलित युवाओं के लिए अल्मोड़ा शहर में किराए पर कमरा लेकर पढ़ना टेढ़ी खीर है। अगड़ी जाति के लोग देश के भविष्य बच्चों से तक जाति पूछ कमरा देते हैं, यानी उन्हें जाति का संस्कार देने का काम करते हैं।

दूसरी जो सबसे बड़ी बात है जिसे लोहाघाट स्थित रेगड़ू के दलित युवा महेश कालाकोटी भी स्वीकारते हैं, वह यह कि आमतौर पर पहाड़ के गांवों में में दलित बाहुल्यता बहुत कम है। एक गांव में मुश्किल से दलितों के 5—6 घर होते हैं, ऐसे में किसी भी उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने में वे हमेशा भयभीत महसूस करते हैं, और दूसरा डर उनमें अगड़ी जातियां देवताओं के नाम पर पैदा कर देती हैं। यानी छुआछूत और जातिवाद के सामाजिक कोढ़ से छुटकारा पाना अभी टेढ़ी खीर है।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक उत्तराखंड के जौनसर बावर इलाके में रहने वाले करीब एक लाख दलित आज भी उस क्षेत्र के 300 से अधिक मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते। 2016 में वहां का दलित समुदाय तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मंदिरों में प्रवेश के अपने अधिकार के लिए मिला था।

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