आज भले ही अनुपम खेर अपने राजनीतिक मित्रों को खुश करने के लिए ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ को ऑस्कर के लिए नामित करने की बात कर रहे हों, मगर संभवत: कुछ समय बाद जब वो अपनी सर्वश्रेष्ठ फिल्मों को गिनें तो द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर का नाम भी न सुनना चाहें…

वरिष्ठ पत्रकार अवनीश पाठक की टिप्पणी

पश्चिम में राजनीतिक सिनेमा विधा का रूप ले चुका है। गैरी ओल्डमैन को पिछले साल सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता का ऑस्कर पुरस्कार दिया गया था। फिल्म थी-डार्केस्ट ऑउर। ये 1940 के उन घंटों की कहानी थी, जब दूसरा विश्वयुद्ध चरम पर था, नार्वे और डेनमार्क की हार से ब्रिटेन सहम गया था। ये कोइ‍न्सिडेंट है या एक्सिडेंट, जिन्हें इतिहास में रुचि है, वो जानते होंगे कि विन्स्टन चर्चिल भी एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर थे। चर्चिल के उन्हीं घंटों के किरदार को गैरी ओल्डमैन ने पर्दे पर जिया है। प्रोस्थेटिक मेकअप और फिजिक पर किए मामूली से काम भर से उन्होंने मानो कायांतरण कर लिया है।

वैसे फिजिकल ट्रांसफार्मेशन या मेथड एक्टिंग बॉलीवुड में भी आम हो चुकी है। दंगल में आमिर खान ने 50 साल के पिता की भूमिका में खुद को कैसे ढाला, ये हमने देखा ही। संजू में रणबीर कपूर ने संजय दत्त की अलग-अलग उम्रों के मुताबिक खुद को ट्रांसफार्म किया। वो 21 साल उम्र में भी उतने ही परफेक्ट लगे, जितने 55 साल की।

पॉलिटिकल फिल्मों की लंबी लिस्ट है और मेथड एक्टिंग के 50 से ज्यादा उदाहरण हैं। ऐसे में द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर को क्या कहा जाए?

द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर में पॉलिटिकल फिल्म जैसी डिटेलिंग नहीं है, किरदारों और घटनाओं की लेयर्स भी नदारद है। फिल्म में परिप्रेक्ष्य भी एक ही है। तथ्यों को ऐसे तोड़ा—मरोड़ा गया है कि ये चुनावी विज्ञापन बन गई है।

प्रोपेगंडा फिल्मों की श्रेणी में भी इसे नहीं रख सकते। दी ग्रेट डिक्टेटर और बैटिलशिप पॉटमकिन भी प्रोपेगंडा फिल्में रही हैं, ये फिल्में कलात्मक रूप से भी उतनी ही महत्‍वपूर्ण हैं। ये फिल्में काफी पुरानी है। नई फिल्मों की बात करूं तो 2014 में आयी दी इंटरव्‍यू याद होगी। उत्तर कोरियाई शासन के खिलाफ बनी अमेरिकन प्रोपेगंडा फिल्म थी वो। अमेरिकन स्नाइपर, जीरो डार्क थर्टी, द हर्ट लॉकर, ब्लैक हॉक डाउन प्रोपेगंडा फिल्मे हैं, मगर ये कला और मनोरंजन दोनों स्तर पर उतनी ही शानदार फिल्में हैं।

द एक्सि‍डेंटल प्राइम मिनिस्टर डॉक्यूमेंट्री भी नहीं है और फिक्शन भी नहीं। इस फिल्म के निर्देशक विजय रत्नाकर गुट्टे का फिल्में बनाने का इतिहास भी नहीं है कि उनके निर्देशन की आलोचना की जाए या उनके निर्देशन को किसी पर्सपेक्टिव में देखा जा सके। पर्सोना इस्टैब्लिश करने के लिए जिस ‘लांग टू क्लोज अप शॉट’ को हम अब तक सैंकड़ों फिल्मों देख चुके हैं, उस शॉट को इस्टैब्लिश करने में गुट्टे का दिमाग लरज़ गया है। अगर विजय गुट्टे किसी फिल्म संस्थान के छात्र होते और ये फिल्म सीखने के लिए भी बनाई होती तो उन्हें फीस समेत वापस लौटा दिया गया होता। उन्हें फिल्में देखनें और पढ़ने की सलाह दी गई होती।

ये फिल्म मनमोहन सिंह की भी नहीं है। ये पूरी तरह से संजय बारू की फिल्म है, वही इसके नायक हैं और सूत्रधार भी। इस फिल्म की समीक्षा के लिए समीक्षा की तकनीकों का इस्तेमाल करना भी उनका निरर्थक इस्तेमाल है। चूंकि संजय बारू नायक हैं और सूत्रधार दोनों वहीं हैं तो खलनायक भी उन्होंने ही तय किया है। फिल्म के खलनायक अहमद पटेल हैं। इन्हीं दोनों अभिनेताओं यानी संजय बारू बने अक्षय खन्ना और अहमद पटेल बने विपिन शर्मा ने ही अपनी भूमिका से न्याय भी किया है।

अनुभव खेर इस फिल्म की त्रासदी हैं। ये कहना कि उन्होंने मनमोहन सिंह की मिमिक्री की है, बहुत सामान्य बात लगती है।

अनुपम खेर अभिनय की पाठशाला हैं, निश्चित रूप से उन्हें भविष्य में जैक निकल्सन, एंथनी हॉपकिंस, सैमुअल एल जैक्शन, माइकल केन, नसीरुद्दीन शाह या ओमपुरी जैसे समकालीन सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं की श्रेणी में रखा जाएगा। लेकिन वो फिल्म द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर नहीं होगी।

आज भले ही अपने राजनीतिक मित्रों को खुश करने के लिए वो इस फिल्म को ऑस्कर के लिए नामित करने की बात कर रहे हों, मगर संभवत: कुछ समय बाद जब वो अपनी सर्वश्रेष्ठ फिल्मों को गिनें तो द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर का नाम भी न सुनना चाहें। उन्हें हमेशा सारांश, डैडी, विजय या मैंने गांधी को नहीं मारा जैसी फिल्मों के लिए ही याद किया जाएगा।

बॉलीवुड के माथे पर ये कलंक हमेशा रहेगा कि पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री पर फिल्म बनाई और वो भी इतनी खराब।


Support to Janjwar Foundation: ₹ 500

Facebook Comment