विश्व स्वास्थ्य दिवस 7 अप्रैल पर विशेष

भारत की पारम्परिक और बेहद महत्चपूर्ण आरोग्य प्रणाली आयुर्वेद, सिद्धा, प्राकृतिक चिकित्सा, योग की समृद्ध विरासत के बावजूद आज इनकी स्थिति देश में है बेहद खराब….

डाॅ ए.के. अरुण, वरिष्ठ चिकित्सक

1995 में ही जारी एक रिपोर्ट में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अत्यधिक गरीबी को अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण में एक रोग माना है। इसे जेड 59.5 का नाम दिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गरीबी तेजी से बढ़ रही है और इसके कारण विभिन्न देशों में और एक ही देश के लोगों के बीच की दूरियां बढ़ती जा रही हैं। इससे स्वास्थ्य समस्या और गंभीर हुई है।

एक आकलन के अनुसार, भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में प्रत्येक तीन में से दो बच्चे कुपोषित हैं। इन बच्चों में से 40 प्रतिशत बच्चे बिहार के हैं।

जाहिर है भोरे समिति ने ‘एलोपैथी’ को सर्वाधिक महत्व दिया और स्वास्थ्य का पूरा ढांचा एलोपैथी की ही बुनियाद पर खड़ा करने का रोड मैप बनाया। उस ढांचे का अहसास आज भी हम सब लोग कर रहे हैं और सच यह है कि भारत की पारम्परिक और बेहद महत्चपूर्ण आरोग्य प्रणाली आयुर्वेद, सिद्धा, प्राकृतिक चिकित्सा, योग की समृद्ध विरासत के बावजूद भी आज इनकी स्थिति अपने देश में ही बेहद खराब है।

होमियोपैथी की बात करें तो 200 वर्ष पुरानी यह चिकित्सा पद्धति एलोपैथी की विसंगतियों से ही पनपी और उस समय के विलक्षण एलोपैथ डाॅ. सैमुअल हैनिमैन ने एलोपैथी की कमियों को पहचान कर रोग को जड़ मूल से खत्म करने की एक बेहद सुरक्षित एवं वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति होमियापैथी को जन्म दिया।

आज की हकीकत है कि होमियोपैथी की विकास दर बिहार की विकास दर की दो गुनी है। यानी सालाना 25 फीसद की रफ्तार से विकास कर रही होमियोपैथी तथा भारत की देशी चिकित्सा पद्धति को अब देश के स्वास्थ्य ढांचे में एलोपैथी की ही तरह मुख्यधारा में लाने की जरूरत है। हालांकि योजना आयोग ने अपने 12वीं योजना दस्तावेज में स्पष्ट किया है कि आयुष पद्धतियों को मुख्यधारा में लाया जाए। केन्द्रीय वित्त मंत्री ने वर्ष 2013-14 के बजट भाषण में भी स्पष्ट किया है कि सरकार आयुष पद्धतियों को मुख्यधारा में लाने का संकल्प व्यक्त करती है।

हमें इस बात की भी विवेचना कर लेनी चाहिये कि बिहार में बीमारियां किस तरह की होती हैं। अगर हमें पता हो कि अपने प्रदेश में बीमारियों का प्रकार किस तरह का है तो इसके निराकरण की दिशा में भी बेहतर तरीके से प्रयास किया जा सकता है।

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, कैंसर, डाइबिटीज, श्वसन तंत्र की बीमारी तथा मानसिक रोग के कारण मौत के मुँह में समाने वालों की संख्या 42 प्रतिशत है। संक्रमण यानी छूत तथा फैलने वाली बीमारियां जैसे कालाजार, डेंगू, चिकनगुनिया, मलेरिया, पेट की बीमारी तथा जापानी एन्सेफेलाइटिस के कारण जिन लोगों की मौत होती है, उनकी संख्या 38 प्रतिशत है। इसके अलावा दुर्घटना एवं चोट तथा बुढ़ापे की बीमारियों की कारण मरने वालों की संख्या 10-10 प्रतिशत है।

2011 के आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल 7 लाख 12 हजार 1 सौ 21 आयुष चिकित्सक हैं। इनमें आयुर्वेद के 4 लाख 29 हजार 2 सौ 46, यूनानी चिकित्सा के 49 हजार 4 सौ 31, सिद्धा के 7 हजार 5 सौ 68, होम्योपैथी के 2 लाख 24 हजार 2 सौ 79 और प्राकृतिक चिकित्सा के 1 हजार 5 सौ 97 चिकित्सक शामिल हैं।

आज यह हमारी ज़रूरत है कि ऐलोपैथी के अलावा आयुष चिकित्सा को भी गंभीरता से लिया जाये और इनके विकास के लिये भी संसाधन उपलब्ध कराये जायें। प्रदेश के सभी 36 जिलों में एक-एक आयुष चिकित्सालय की स्थापना सुनिश्चित करने की बात भी हम सोच सकते हैं। जनता को इस बात के लिये उपयुक्त अवसर प्रदान किया जाये कि वह अपनी पसंद की चिकित्सा पद्धति का चुनाव कर सके।

(डॉ. ए.के. अरुण जन स्वास्थ्य कार्यकर्ता एवं जाने माने होमियोपैथिक चिकित्सक हैं।)


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