Last Update On : 26 04 2018 12:58:00 PM

गढ़चिरौली में कथित मुठभेड़ की अंतर्विरोधी दास्तान

माओवादियों के हथियार लड़ाई में चूक गये तब क्या एक भी पुलिस वाला घायल नहीं हुआ? यदि वे चारों तरफ से घिरे थे और कैंप लगाये थे तो उनके सामान कहां गये, उनके किट आदि कहां हैं…

अंजनी कुमार, सामाजिक कार्यकर्ता

पिछले दो दिनों से गढ़चिरौली से माओवादियों के मारे जाने की खबर आ रही थी। एक के बाद दूसरे ‘एनकाउंटर’ में अब तक कुल 39 माओवादियों के मारे जाने की खबर भी सनसनीखेज नहीं बन सकी है।

इस कथित मुठभेड़ में पुलिस बल के एक भी सदस्य के घायल की खबर नहीं आई है। पुलिस डीआईजी देशमुख की मानें तो ‘हमारे आदमियों ने उन्हें पूरी तरह घेर लिया था। उनके लिए भागने की कोई जगह नहीं थी। कुछ इसी कारण से इंद्रावती नदी में कूद गये। उनमें से कई शायद घायल होने के कारण तैर नहीं सके और डूब गये। इस नदी में घड़ियाल भी हैं जिन्होंने उन पर हमला भी किया होगा। जो बच गये वे हमारी गोलियों का शिकार हो गये।(इंडियन एक्सप्रेस, 25 अप्रैल, 2018, आॅनलाइन अंक)।’

यह एक पुलिस प्रमुख द्वारा मुठभेड़ का साहित्यिक विवरण है। इंडियन एक्सप्रेस की उपरोक्त रिपोर्ट में कुछ और अंशों का पढ़ा जाना चाहिए। पुलिस ने एक भेदिये के माध्यम से यह खबर हासिल की थी कि सीपीआई-माओवादी के दलम के लोग कैंप लगाने वाले हैं। यह खबर पुलिस को पक्के तौर पर हासिल थी इसीलिए उन्होंने दो किलोमीटर के दायरे में घेराबंदी की, जिससे कि माओवादी भाग न सकें।

घेराबंदी के बाद उन पर 12-13 ग्रेनेड फेंके गये और 2000 राउंड गोलियां चलाई गई। इस तरह माओवादी पूरी तरह से घिरे हुए मारे गये। हालांकि पुलिस का मानना है कि कुछ बचकर निकल गये हैं और गांव, बाजार और डॉक्टरों के डिस्पेंसरी पर नजर रखी जा रही है जिससे कि उन्हें भी खत्म किया जा सके।

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पुलिस प्रमुख का कहना है कि ‘उनके भाग सकने का कोई अवसर ही नहीं था।’ और ‘उनके हथियार पूरी तरह खत्म हो चुके थे।’ पुलिस को माओवादियों से एक इंसास राईफल्स, एक .303, एक कार्बाइन, दो 8 एमएम की बंदूक, एक बारह बोर की बंदूक नदी के किनारे से मिली है।’ पुलिस के अनुसार एक दलम में लगभग 20 से 22 सदस्य होते हैं। पुलिस को खबर थी कि कैंप लगाने के लिए दो दलम के लोग आ रहे हैं। यानी कुल 40 से 44 माओवादी इकठ्ठा हैं। ‘ठोस खबर’ के आधार पर सी-60 की दो कंपनी ने 37 माओवादियों को मार डाला गया जिसमें 6 पास में ही अन्य मुठभेड़ में मारे गये।

पुलिस की कहानी से जिन बातों का उत्तर नहीं मिलता :

1- यदि यह दलम का कैंप था तो उनके हथियार कहां गये? क्या दलम के सदस्य खाली हाथ थे? या वे दलम के सदस्य नहीं थे? यदि दलम के सदस्य हथियारबंद थे और कैंप लगा रहे थे तो निश्चय ही गुरिल्ला ट्रेनिंग उसका हिस्सा होगा? यदि वे सांस्कृतिक कर्मी थे तब क्या वे पुलिस के साथ इतनी लंबी मुठभेड़ में लगे रहे?

2- माओवादियों के हथियार लड़ाई में चूक गये तब क्या एक भी पुलिस वाला घायल नहीं हुआ? यदि वे चारों तरफ से घिरे थे और कैंप लगाये थे तो उनके सामान कहां गये, उनके किट आदि कहां हैं?

3- पुलिस को जो ‘ठोस खबर’ थी उससे दो किमी के दायरे में घेराबंदी की गई। नदी के हिस्से को छोड़कर पीछे से घेराबंदी का दायरा दो किमी रखने पर सी-60 की दो कंपनियां घेराबंदी के लिए पर्याप्त थीं?

इस सवाल को पुलिस की कहानी के संदर्भ में रखें तो और भी साफ होता है जब बारिश के कारण माओवादियों की लाशें वे ढूंढ़ नहीं पा रहे हैं और अन्य गतिविधियां चलाने में उन्हें दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में साफ है कि यह इलाका कच्चा, जंगल से भरा और कठिन है।

और, दूसरी बात यह भी है कि माओवादी जिस गुरिल्ला रणनीति का पालन करते हैं, उसका टैरेन कठिन और जटिल होता है। ऐसे में ‘ठोस खबर’ पर ‘घेराबंदी’ और आत्मसमर्पण की अपील के बाद माओवादियों को ‘मार गिराने’ की बातों में कई अंतर्विरोध दिखते हैं जिस पर पत्रकारों की ओर से अभी तक रिपोर्ट नहीं दी गई है।

जो रिपोर्ट आई है वह उन्हें दी गई खबरों का ही अखबारी तर्जुमा जैसा दिखता है। ग्राउंड रिपोर्ट की उम्मीद है जिसे निश्चय ही पत्रकार अंजाम देंगे। लेकिन उससे भी अधिक मुख्य बात यह ‘मुठभेड़’ है। इस मुठभेड़ को एक जीत की तरह पेश किया गया है।

एक दूसरी तरह की मुठभेड़ से उत्तर प्रदेश भी गुजर रहा है, जहां पुलिस और मुख्यमंत्री ‘न्याय’ की कुर्सी पर बैठे हैं और जीवन और मौत को तय कर रहे हैं। पिछले 20 सालों से पुलिस, मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, प्रधानमंत्री, कॉरपोरेट घराने, विदेशी हथियारों के दलाल और गुप्तचर, मीडिया के घराने और पाटिर्यों के नेता, निजी हथियारबंद गिरोह, जातीय गिरोह आदि नक्सलवाद को खत्म करने में लगे हुए हैं। इ

सलिए गढ़चिरौली में हुई ‘मुठभेड़’ एक बहुत बड़े समूह का नक्सलवाद के खिलाफ युद्ध है। यह अपने ही देश की जनता के खिलाफ युद्ध है और इस युद्ध में युद्ध की संयुक्त राष्ट्र की न्यूनतम दिशा-निर्देशों को दरकिनार कर सारे तरीके अख्तियार किये जा रहे हैं। गढ़चिरौली में ‘मुठभेड़’ की कहानी भी यही है। यही कारण है तीन राज्यों की सरकारें पुलिस को करोड़ों रुपये इनाम दे रही हैं।

क्या यह सचमुच बहादुरी है? देश की सीमा पर लड़े जाने वाला युद्ध है? यदि यह युद्ध नहीं है तब सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार ईनाम देने के बजाय मुठभेड़ में शामिल लोगों पर हत्या का मामला दर्ज होना चाहिए, इसकी स्वतंत्र जांच होना चाहिए। लेकिन क्या यह संभव है? इशरत जहां आदि के मुठभेड़ के मसले पर न्यायपालिका में उठे संकट को हम देख रहे हैं।

मुठभेड़ के इसी दौर में नक्सलवाद खत्म करने के लिए सेना के हथियारों से लैस सीमा सुरक्षा बल और अन्य पुलिस बलों द्वारा कोल्हान में लगातार मोर्टार आदि से हमला किया जा रहा है और घेराबंदी कर रसद को रोक दिया गया है। यहां फिलहाल मुठभेड़ नहीं घेरकर माओवादियों को मारने की नीति का पालन किया जा रहा है। लेकिन जैसे ही किसी माओवादी की लाश मिली वैसे ही इसे ‘मुठभेड़’ में मार गिराने की खबर छप जायेगी।

युद्ध और मुठभेड़ के बीच का फर्क सिर्फ अखबारों की खबरों में तकनीकी पक्ष तक सीमित रह गया है। इस सच्चाई को ठीक से पढ़ने के लिए जरूरी है कि फर्क को हटाकर पढ़ा जाये।

मसलन, यूएपीए के प्रावधानों और देशद्रोह की धाराओं में देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की धारा को मुख्य माना गया है। लेकिन यहां ‘मुठभेड़’ को किस धारा में पढ़ा जाय? माननीय न्यायालयों ने तो इस ‘मुठभेड़’ पर अपनी राय और निर्देश दिये हैं, लेकिन क्या यह लागू हो पा रहा है? निश्चय ही मानवाधिकार कार्यकर्ता ही नहीं देश के सभी प्रबुद्ध समाज के लोगों को बहस-मुहाबिसे के माध्यम से मसले को उठाना चाहिए।

बहुत सारे लोग यह सवाल उठायेंगे और उठाते ही हैं कि माओवादी भी पुलिस को मारते हैं। हां, ऐसा होता है। और, इस बात को जरूर जानना चाहिए कि यह सिलसिला कब और कैसे शुरू हुआ? जब नक्सली नहीं थे तब भी पुलिस थी; तब भी पुलिस और सेना-अर्धसेना ऐसे ही मुठभेड़ों में लोगों को मार गिराती थी और कई बार दूसरे पक्ष लोग भी ऐसा करते थे। मरने वालों की संख्या हजारों में होती थी।

उसके पहले ब्रिटिश सरकार और उसकी पुलिस, सेना थी, लोगों को मुठभेड़ में मार डालने का काम वह भी खूब क्रूरता के साथ करते थे। सिलसिले को आगे करें या पीछे मुठभेड़ की कहानियां और मातें आपको दिखाई देंगी।

सत्ता रूप बदलते हुए हमारे सामने आज जिस रूप में दिख रहा है, उसमें यह सवाल उठाना जरूरी है कि मौतों का यह सिलसिला क्यों जारी है? हिंसा क्यों जारी है? हिंसा सत्ता में है या उन लोगों में जो जनता के बीच से उठते हैं और हिंसा का सहारा लेते हैं।

एक तुलनात्मक अध्ययन से यह बात साफ हो सकती है, यदि हम देश में साल भर में हिंसा का रास्ता अपनाने वाले सारे समूहों, संस्थानों, पार्टियों, संगठनों आदि जिसमें पुलिस के विविध रूप भी हैं, के द्वारा की गई हिंसक कार्यवाईयों का अध्ययन करें और यह न मानें कि पुलिस आदि शांति के दूत के रूप में काम करती हैं।