बताया गया था कि अडानी की आॅस्ट्रेलियाई परियोजना से लगभग दस हजार लोगों को रोजगार मिलेगा और देश को होगा अरबों रुपये का राजस्व प्राप्त, मगर अभी हाल यह कि अडानी की ऑस्ट्रेलियाई कंपनी से अनेक कर्मचारियों की कर दी गयी है छुट्टी…

वरिष्ठ लेखक महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

अडानी ग्रुप ने आस्ट्रेलिया में कोयला खदान से सम्बंधित एक के बाद एक अनेक घोषणायें की हैं। स्पष्ट होता है कि कहीं से भी इस परियोजना को आर्थिक मदद नहीं मिलने के कारण इसका उत्पादन कम किया जाएगा और इससे सम्बंधित दूसरी परियोजनाओं, जैसे रेल लाइन और पोर्ट में भी संभावित कटौती कर दी जायेगी। जाहिर है ऐसे में रोजगार के अनुमानित आंकड़े भी बदल जायेंगे, गरर इस पर ग्रुप ने चुप्पी साध ली है।

पिछले महीने अडानी ग्रुप ने ऐलान किया है कि जल्दी ही परियोजना का काम शुरू कर दिया जाएगा। एक ऐसे समय जब आॅस्ट्रेलिया में वायु प्रदूषण और तापमान वृद्धि से सम्बंधित आन्दोलन चल रहे हैं, स्कूलों के छात्र भी सड़कों पर उतरकर आन्दोलन कर रहे हैं, अडानी ग्रुप की घोषणा के बाद 8 दिसम्बर को अडानी की कोयला खनन परियोजना के विरूद्ध ऑस्ट्रेलिया के सभी बड़े शहरों में विरोध प्रदर्शन किया गया।

ये विरोध प्रदर्शन ब्रिसबेन, जहाँ अडानी ग्रुप का मुख्यालय है, के साथ-साथ सिडनी, मेलबोर्न और कैर्न्स में भी किये गए। इन आन्दोलनों में आम लोगों के साथ-साथ बड़ी संख्या में विद्यालयों और विश्वविद्यालय के छात्र भी सम्मिलित हुए। कुछ समय पहले गार्डियन में छपी एक खबर के अनुसार निवेश की कमी से परेशान अडानी की ऑस्ट्रेलिया स्थित कोयला खदान कंपनी फिर से चर्चा में है।

13 सितम्बर को कंपनी की तरफ से बताया गया कि खदान से बंदरगाह तक जो रेल लाइन बिछानी थी, अब उसकी लम्बाई को लगभग आधा कर दिया जाएगा और स्टैण्डर्ड गेज के बदले नैरो गेज की रेलवे लाइन बिछाई जायेगी। अब कोयला उत्पादन को भी 120 से 150 लाख टन प्रतिवर्ष तक सीमित करने की बात की जा रही है, जबकि आरम्भ में उत्पादन 600 लाख टन की चर्चा थी। इससे खदान के लिए अपेक्षाकृत कम निवेश की जरूरत पड़ेगी।

इस परियोजना पर अब पूंजी की कमी का असर पड़ने लगा है। ऑस्ट्रेलिया में क्वीन्सलैंड की सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वहाँ की कोई भी सरकारी संस्था या बैंक इस परियोजना की कोई सहायता किसी भी तरह से और किसी भी चरण में नहीं करेगा। इसके बाद सरकारी मदद की कोई उम्मीद नहीं बची, और सभी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी अपनी साख बचाने के लिए इस परियोजना से अपना पल्ला झाड़ चुकी हैं।

ऑस्ट्रेलिया के चार सबसे बड़े बैंक पहले ही अडानी को लोन देने से मना कर चुके हैं। गार्डियन में प्रकाशित एक खबर के अनुसार ऑस्ट्रेलिया सरकार को लगता है कि इस परियोजना के लिए वित्तीय मदद चीन की कुछ संस्थाओं ने दी है, इसीलिए ऑस्ट्रेलिया सरकार ने चीन की सरकार को इस बारे में पत्र भेजा है।

वर्ष 2010 में बताया गया था कि अडानी की इस परियोजना से लगभग दस हजार लोगों को रोजगार मिलेगा और देश को अरबों रुपये का राजस्व प्राप्त होगा, पर तमाम अर्थशास्त्रियों ने इन दावों को उसी समय झुठला दिया था। वर्तमान में हालत यह है कि अडानी की ऑस्ट्रेलिया की कंपनी से अनेक कर्मचारियों की छुट्टी कर दी गयी है।

पहले कभी ऑस्ट्रेलिया को पर्यावरण संरक्षण के अग्रणी देशों में शुमार किया जाता था, पर आज के दौर में यहाँ के पर्यावरण को बुरी तरीके से बर्बाद किया जा रहा है। बड़े पैमाने पर जंगल काटे जा रहे हैं, समुद्री जीवन नष्ट किया जा रहा है, कोरल रीफ मर रहे हैं और जैव-विविधता नष्ट हो रही है।

कुछ समय पहले प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के जिन पांच देशों में जैव-विविधता सबसे तेजी से नष्ट की जा रही है, उसमें भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र की नयी रिपोर्ट के अनुसार ऑस्ट्रेलिया भी उन देशों में सम्मिलित है जो तापमान वृद्धि को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे हैं। इसे ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने नकार दिया, पर वहाँ की सरकारी रिपोर्ट के अनुसार पिछली तिमाही में ही ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 1.3 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है।

कुछ समय पहले तक पर्यावरण आंदोलनों में केवल कुछ गैर-सरकारी संगठन ही शामिल होते थे, फिर सामान्य जनता भी जुड़ती गयी। अब तो स्कूलों के विद्यार्थी भी अपने बलबूते पर तापमान वृद्धि के खिलाफ सड़कों पर आन्दोलन कर लेते हैं।

पिछले सप्ताह ही प्रधानमंत्री की अपील ठुकराकर हजारों की संख्या में स्कूलों के विद्यार्थी तापमान वृद्धि के मामले में सरकार की आँखें खोलने के लिए सड़कों पर उतर आये थे। अडानी की कोयला खान के विरोध में भी बड़ी संख्या में स्कूलों और यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया।

अडानी ग्रुप के खदान पर काम शुरू करने के ऐलान से सरकार के साथ-साथ जनता भी हैरान है। काम शुरू करने के लिए आवश्यक स्वीकृतियों में से कम से कम दो स्वीकृतियां अभी तक इसे नहीं मिली हैं और निकट भविष्य में मिलने की संभावना भी नहीं है। ऐसे में काम शुरू करने का दावा सबकी समझ से परे है।

क्वीन्सलैंड के डिपार्टमेंट ऑफ़ एनवायरनमेंट एंड साइंस ने स्पष्ट कर दिया है कि बिना पूरे अप्रूवल के खनन स्थल पर कोई प्रभावी काम नहीं किया जा सकता है।


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