Last Update On : 10 06 2018 07:32:53 PM

असम के गुवाहाटी में रहने वाले दो साउंड इं​जीनियरों को भीड़ ने सिर्फ इसलिए मार डाला क्योंकि उनमें से एक के बाल लंबे था और भीड़ लंबे बाल वाले अपराधी की तलाश में थी…

जनज्वार। सच और झूठ का फैसला, तथ्य और भ्रम का भरोसा अगर वाट्सअप यूनिवर्सिटी पर फैले संदेशों के आधार पर होने लगा तो वह दिन दूर नहीं जब यह देश बर्बरता और अराजकता के सिरमौर होने का तमगा हासिल कर लेगा। आखिर उन कलाकार दोस्तों का क्या गुनाह था जिन्हें भीड़ ने बच्चा चोर गैंग का सदस्य समझकर मार डाला।

असम की राजधानी गुवाहाटी में रहने वाले दो साउंड इंजीनियर ‘आवाज के तकनीकी पर काम करने वाले’ नीलोत्पल दास और अभिजीत नाथ शु​क्रवार 8 जून को असम के कार्बी आंगलॉन्ग जिले के डोकमोका इलाके में घूमने गए।

असम के प्रमुख दैनिक ‘असोमिया प्रतिदिन’ में छपी खबर के अनुसार अभिजीत नाथ ने निलोत्पल से कहा कि आज छुट्टी लेकर डोकमोका चलते हैं और वहां से एक्वेरियम के लिए खास तरह की ​म​छलियां खरीद कर लाएंगे।

इस बीच शाम होते—होते कार्बी आंगलॅन्ग शहर और उसके आसपास के इलाकों में तेजी से वाट्सअप पर खबर फैल गयी कि बच्चा चोरी और अपहरण करने वाला गैंग नागालैंड के दीमापुर के आसपास के इलाकों में छिपा हुआ है। दीमापुर की यह सीमा असम के कार्बी आंगलॉन्ग जिले से लगी हुई है। ग्रुप में भेजी जानकारी में बताया गया कि चोरी गैंग के एक सदस्य के बाल लंबे हैं।

यही आधार बना गुवाहाटी के रहने वाले दो कलाकारों ​निलोत्पल दास और अभिजीत नाथ की बच्चा चोरी गैंग से जुड़े होने का और फिर भीड़ ने पीट—पीट कर मार डाला।

8 जून की देर रात काथिलांगसो झरने से वापस लौट रहे दोनों युवकों लोगों ने रोक लिया। भीड़ को शक था कि दोनों युवक बच्चों का अपहरण करने वाले गिरोह के सदस्य हैं। भीड़ ने दोनों को कार से नीचे उतारा और वे उन्हें बांधकर पीटने लगे। हालांकि दोनों लगातार कहते रहे कि वे असम के ही हैं और यहां केवल घूमने आए हैं। लेकिन भीड़ ने उनकी एक न सुनी और पीट-पीट कर जान से मार डाला।

इस मामले में प्रदेश के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने मारे गए युवकों के परिजनों के प्रति संवेदना प्रकट की और इस जघन्य हत्या की निंदा की। मुख्यमंत्री ने कहा, यह काफी निंदनीय है कि लोग अफवाह और अंधविश्वास से प्रभावित होकर लोगों की हत्या कर देते हैं। मुख्यमंत्री ने इस मामले में जांच के आदेश दिए हैं।

हो सकता है जांच के आदेश के बाद कुछ लोग पकड़ लिए जाएं, पर सवाल तो बचा रह जाता है कि भीड़ को फैसले का यह साहस कहां से मिल रहा है? इस पर जरूर सोचा जाना चाहिए और रोका जाना भी, क्योंकि भीड़ के हाथ अगर ऐसे लंबे होते रहे फिर कानून और व्यवस्था कहां टिक पाएगी।