जब सुप्रीम कोर्ट ने मामला बीसीसीआई की प्रशासनिक कमेटी को सौंप दिया है तो खेल मंत्री का बैठक बुलाना सुप्रीम कोर्ट की खुली अवमानना…

देहरादून, जनज्वार। उत्तराखण्ड के खेल मंत्री अरविंद पाण्डेय का विवादों से पुराना नाता है। पाण्डेय जी बतौर खेल मंत्री भले ही खेल के क्षेत्र में कुछ खास नहीं कर पाये हों लेकिन कई मौकों पर प्रदेश सरकार की फजीहत करवाना इनके खाते में दर्ज मे हैं। प्रदेश में रणजी मैच का ऐलान कराकर वाहवाही लूटने और बीसीसीआई द्वारा मैच निरस्त किये जाने से देशभर में उत्तराखण्ड की किरकिरी हुई।

प्रदेश सरकार की फजीहत कराने का कोई मौका पाण्डेय जी छोड़ते नहीं हैं। लगता है रणजी मैच प्रकरण के बाद बाद अब उत्तराखण्ड क्रिकेट की मान्यता के मामले में पाण्डेय जी दोबारा फजीहत कराने की तैयारी में हैं। वो अलग बात है कि मंत्री जी पहली बार अपनी गलती के लिये सार्वजनिक माफी मांग चुके हैं।

बताते चले कि उत्तराखण्ड राज्य की किसी भी एसोसिएशन को बीसीसीआई ने मान्यता नहीं दी है। नतीजतन उत्तराखण्ड के खिलाड़ियों को अन्य राज्यों से खेलना पड़ता है। राज्य में सक्रिय कई एसोसिएशनों की आपसी खींचतान, राजनीति और अहम् के चलते मान्यता का मामला पिछले सत्रह वर्षों से लम्बित है। एकाध क्रिकेट एसोसिएशन को छोड़कर तमाम एसोसिएशनों के पदाधिकारी राजनीति, जोड़-तोड़ के द्वारा अपना उल्लू सीधा करने की कोशिशों में लगे हैं।

प्रदेश सरकार या किसी एसोसिएशन ने मान्यता के लिये गंभीर प्रयास करने की कोशिश की तो दूसरी एसोसिएशनों ने अडंगेबाजी लगाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। वहीं उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (यूपीसीए) भी इस मामले में निगेटिव भूमिका निभा रही है।

उत्तराखण्ड क्रिकेट की मान्यता के लम्बित मामले को सुलझाने के लिऐ गत 16 नवंबर को राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की अध्यक्षता में राज्य में कार्यरत क्रिकेट एसोसिएशनों की एक बैठक बुलायी गयी थी। बैठक में प्रदेश के खेल मंत्री अरिवन्द पाण्डेय, मुख्य सचिव, खेल सचिव, खेल निदेशक सहित तमाम अधिकारी उपस्थित थे। बैठक का एजेण्डा प्रदेश क्रिकेट की मान्यता को लेकर था।

बैठक में एक एसोसिएशन के पदाधिकारी ने बताया कि उत्तराखण्ड क्रिकेट की मान्यता का मामला सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है। इसलिये सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद ही कोई कदम उठाया जाए। इस तथाकथित एसोसिएशन की अडंगेबाजी के चलते बैठक बेनतीजा रही। जबकि असलियत यह थी कि सुप्रीम कोर्ट में कोई मामला लम्बित नहीं था।

इस एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री, खेल मंत्री, मुख्य सचिव समेत तमाम आलाअधिकारियों को झूठी व भ्रामक जानकारी दी। हैरत की बात है मुख्यमंत्री, खेल मंत्री व आलाअधिकारियों ने बिना किसी सुबूत के इसे स्वीकार भी कर लिया।

प्रदेश सरकार के उदासीन रवैये और तथाकथित क्रिकेटों एसोसिएशनों की अडंगेबाजी से आजिज आकर उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन (यूसीए) ने मान्यता के मामले को सुझलाने के लिये सुप्रीम कोर्ट (सिविल अपील संख्या 4235/2014 बीसीसीआई अन्य बनाम बिहार क्रिकेट एसोसिएशन व अन्य में प्रार्थना पत्र संख्या आई.ए.एन. 124996/2017) के दरवाजे पहुंच गई।

असल में उत्तराखण्ड क्रिकेट की मान्यता के लिये पिछले सत्रह वर्षों में पहली बार राज्य की किसी एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रार्थना पत्र पर सुनवाई करते हुये मामले को बीसीसीआई की प्रशासनिक कमेटी के सुपुर्द कर दिया है।

बीसीसीआई, मीडिया व प्रदेश सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की जानकारी है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में मामले की अगली सुनवाई जनवरी के दूसरे हफ्ते में होना तय है। ऐसे में राज्य के खेल मंत्री का मान्यता मामले में आगामी 28 दिसंबर (पत्र सं0 1356/रा0क्रि0एस0पत्र0/2017-18/दे0दून दिनांक 21 दिसंबर 2017) को क्रिकेट एसोसिएशन की बैठक बुलाना सुप्रीम कोर्ट की खुली अवमानना है।

वहीं सवाल यह भी है कि जब मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में मान्यता प्रकरण की बैठक बेनतीजा रही तो खेल मंत्री की बैठक से क्या हासिल होगा। वहीं अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है। लगता है खेल मंत्री को कोर्ट के आदेश व अवमानना का कोई डर नहीं है।

विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार खेल मंत्री अरविंद पाण्डेय ने अपनी एक खास एसोसिएशन को फायदा पहुंचाने के लिये बैठक बुलायी है। सूत्रों की माने तो देहरादून स्थित राजीव गांधी क्रिकेट स्टेडियम भी मंत्री जी अपनी चहेती एसोएिशन को लीज पर देने की तैयारी कर चुके हैं।

कानून के जानकारों की मानें तो जब सुप्रीम कोर्ट ने मामला बीसीसीआई की प्रशासनिक कमेटी को सौंप दिया है तो खेल मंत्री का बैठक बुलाना सुप्रीम कोर्ट की खुली अवमानना है। लगता है, खेल मंत्री इस मामले में एक बार भी प्रदेश सरकार की किरकिरी और फजीहत कराकर ही मानेंगे।


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