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सच्चर कमेटी दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश व भारत में नागरिक आजादी की बुलन्द आवाज राजेन्द्र सच्चर की अगुवाई में बनी थी। राजेन्द्र सच्चर की मृत्यु के साथ वह आवाज सुनाई नहीं देगी, मगर उसकी गूंज हमेशा सुनवाई देती रहेगी….

राजीव गोदारा

भारत में मुस्लिम समुदाय की आर्थिक, सामाजिक व शैक्षणिक स्तर पर दयनीय स्थिति को रेखांकित करने वाली सच्चर कमेटी की रिकमेंडेशन का जिक्र पिछले सालों में भारतीय सामाजिक विमर्श का हिस्सा बना रहा है। वह सच्चर कमेटी दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश व भारत में नागरिक आजादी की बुलन्द आवाज राजेन्द्र सच्चर की अगुवाई में बनी थी। राजेन्द्र सच्चर की मृत्यु के साथ वह आवाज सुनाई नहीं देगी, मगर उसकी गूंज हमेशा सुनवाई देती रहेगी।

नागरिक स्वतंत्रता के आंदोलन के प्रमुख चेहरे व आपातकाल के समय जब अनेक न्यायाधीश सत्ता के सामने रेंगने लगे थे, तब भी न्यायाधीश रहते सत्ता के सामने न झुकने की वजह से उनका तबादला किया गया, मगर वे अडिग रहे। मौलिक अधिकारों के पक्षधर रहे, मानवाधिकारों के हनन वाले पोटा जैसे कानून के खिलाफ आवाज उठाने वाले, पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज के अध्यक्ष रहे व देशभर में कानून की प्रक्रियाओं का उल्लंघन करने वाली घटनाओं के खिलाफ मजबूत व सतत आवाज के तौर पर जिन राजेन्द्र सच्चर को मैं पहचानता था, उन्हें व्यक्तिगत रूप से मिलने का अवसर 2004 में मिला।

2002 में हरियाणा में सिरसा के निर्भीक पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति की हत्या कर दी गई थी। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने उस मामले की सीबीआई से जांच करवाने का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ डेरा सच्चा (जिन पर छत्रपति की हत्या का आरोप था) ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी थी।

सिरसा में छत्रपति के दोस्तों के बीच यह चर्चा हुई कि सुप्रीम कोर्ट में डेरे के खिलाफ कौन वकील मजबूती के साथ खड़ा हो सकता है, जो बिना फीस के छत्रपति के बेटे का वकील बन सके। तब राजेन्द्र सच्चर का नाम सभी की जुबान पर था व तय हुआ कि सच्चर जी से मिलकर निवेदन किया जाए।

तब योगेंद्र यादव के रेफरेंस से अंशुल छत्रपति (पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति के बेटे) व अन्य दोस्त वीरेंद्र भाटिया के साथ राजेंद्र सच्चर से उनके घर में पहली मुलाकात हुई। जब छत्रपति की हत्या व डेरे की ताकत व भूमिका बारे उन्हें बताया, तो वे तुरन्त ही बिना फीस के छत्रपति का केस लड़ने को तैयार हो गए व सुप्रीम कोर्ट से सीबीआई जांच किये जाने के फैसले को बहाल रखवाया, जिसके बाद हुई जांच के बाद डेरा प्रमुख आज भी हत्या के केस आरोपी के बतौर ट्रायल भुगत रहे हैं।

इसके बाद के वर्षों में समाजवादी आंदोलन व वैकल्पिक राजनीति की राजनीतिक धारा को मजबूत करने वाले प्रयास के साथी के नाते मुलाकात हुई। 2009 में लोक राजनीति मंच के गठन की बैठकों में उनकी ऑब्जेटिविटी व वैचारिक स्पष्टता ने प्रभावित किया।

राजेन्द्र सच्चर लोक राजनीति मंच के अध्यक्ष मंडल के सदस्य थे। 2010-11 में देशभर के वैचारिक समाजवादियों को एक मंच पर लाने के प्रयास का अहम हिस्सा रहे राजेन्द्र सच्चर। इसी दौरान चण्डीगढ़ में देश भर के समाजवादियों की बैठक का आयोजन हुआ, जिसमें सच्चर ने वैकल्पिक राजनीति की दशा व दिशा को रखते हुए तात्कालिक परिस्थितियों का बेबाकी से जिक्र किया। वहां हुई लम्बी व खुली चर्चा में जाना कि वे वैकल्पिक राजनीति के साथियों की स्पष्ट पहचान कर पाने में सक्षम थे। 1923 में जन्में सच्चर ढलती उम्र के पड़ाव पर नए राजनीतिक पार्टी’सोशलिस्ट पार्टी इंडिया’ के मजबूत साथी के तौर पर खड़े हुए।

पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज के लंबे समय से मजबूत स्तम्भ रहे राजेन्द्र सच्चर से चंडीगढ़ में इस संगठन की बैठकों में अनेक बार मिलने का अवसर मिला। हर बैठक में उनकी सक्रिय भागीदारी बताती थी कि किसी विचार के प्रति गहरी प्रतिबद्धता किस तरह से कर्मठता व लगन को उत्पन करती है।

जस्टिस सच्चर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार सुरक्षा व कानून की समीक्षा करने वाली अनेक कमेटियों के सदस्य रहे व उनका योगदान हमेशा सारगर्भित व ठोस रहा। चाहे वह कंपनीज एक्ट की समीक्षा का मामला हो, इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट का या फिर प्रोटेक्शन ऑफ ह्यूमन राइट्स एक्ट का।

सिविल लिबर्टीज के प्रहरी के नाते 1990 में कश्मीर की स्थिति से लेकर मानवाधिकार व नागरिक स्वतंत्रता की अनेक घटनाओं से जुड़े मामलों में कई रिपोर्ट उनके नेतृत्व व सहयोग से पीयूसीएल ने जारी की। एक वकील के नाते, हाईकोर्ट जज बनने से पहले व रिटायरमेंट के बाद भी पोटा के मामले से लेकर तमिलनाडु में हुई आंदोलनकारियों की गिरफ्तारियों के केस अनेक मामलों को अदालत में मजबूती से लड़ा।

केन्या में हाउसिंग के सवाल पर यूनाइटेड नेशन के प्रतिनिधि के तौर पर 2000 में अपनी रिपोर्ट दी, वहीं मुंबई में झुग्गी झोंपड़ी वालों के अधिकारों के हनन की भी जांच रिपोर्ट दी।

मार्च 2005 में भारत की केंद्र सरकार ने जसिस सच्चर को मुस्लिम समाज की आर्थिक,सामाजिक व शैक्षणिक स्थिति का आकलन कर रिपोर्ट सौंपने का जिम्मा दिया। जो रिपोर्ट उन्होंने नवम्बर 2006 में सौंप दी। रिपोर्ट ने भारत में मुस्लिम समुदाय में बढ़ती आर्थिक व सामाजिक असुरक्षा को रेखांकित किया, वहीं बताया कि मुस्लिम आबादी का प्रतिनिधित्व सिविल सर्विस, पुलिस, सेना व राजनीति में भी बहुत कम है।

आज जसिस सच्चर को याद करते हुए संवैधानिक व नागरिक अधिकारों के पक्ष में खड़े होने का संकल्प लेने का वक्त है। हर खतरे को देखते हुए निर्भीकता से मानवाधिकारों की आवाज उठाना उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

(पेशे से एडवोकेट राजीव गोदारा स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)