Last Update On : 30 08 2018 07:06:27 PM

देश के लोकप्रिय जनकवि और मानवाधिकार कार्यकर्ता वरवर राव की बेटी से पूछा गया यह सवाल बताता है कि देश की पुलिस और खुफिया एजेंसियां कितनी सांप्रदायिक, स्त्री विरोधी और जातिवादी हो चुकी हैं…

सुशील मानव की रिपोर्ट

तुमने सिंदूर क्यों नहीं लगाया, तुम्हारे घर में देवी देवताओं की तस्वीरें क्यों नहीं हैं? क्या ये पुलिस के सवाल हो सकते हैं। क्या ये धर्मनिरपेक्ष देश की पुलिस के सवाल हैं। जी नहीं धर्मनिरपेक्ष नहीं हिंदुत्ववादी देश की पुलिस के सवाल हैं जो कवि वरवर राव के बेटी और दामाद से पुणे पुलिस ने छापेमारी के दौरान पूछे।

ऐसे एक नहीं कई सवाल हैं जो निहायत ही बेतुके और मूर्खतापूर्ण हैं। पुणे पुलिस के ये प्रश्न बताते हैं कि पुलिस का किस कदर सांप्रदायीकरण हो चुका है। ऐसी पुलिस से आप क्या उम्मीद करते हैं कि समाज में सांप्रदायिक दंगों को रोकेंगे या और फैलाएगे? ऐसी पुलिस की मौजूदगी से दंगाई खौफ नहीं खाएंगे या उलटे उन दंगाइयों का मनोबल और बढ़ेगा?

गौरतलब है कि भीमा कोरेगांव हिंसा से संबंध होने के शक में छापेमारी के दौरान पुणे पुलिस ने वरवर राव की बेटी से कहा ‘आपके पति दलित हैं, इसलिए वो किसी परंपरा का पालन नहीं करते हैं। लेकिन आप तो ब्राह्मण हैं। फिर आपने कोई गहना या सिंदूर क्यों नहीं लगाया है? आपने एक पारंपरिक गृहिणी की तरह कपड़े क्यों नहीं पहने हैं? क्या बेटी को भी पिता की तरह होना ज़रूरी है?’

वरवर राव के दामाद के. सत्यनारायण से पुणे पुलिस ने पूछा , ‘आपके घर में इतनी किताबें क्यों है? क्या ये आप सारी किताबें पढ़ते हैं? आप इतनी किताबें क्यों पढ़ते हैं? आप मार्क्स और माओ के बारे में किताबें क्यों पढ़ते हैं? आपके घर में फ़ुले और आंबेडकर की तस्वीरें हैं लेकिन देवी-देवताओं की क्यों नहीं?’

पुणे पुलिस ने भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में गिरफ़्तार किए गए कवि और सामाजिक कार्यकर्ता वरवर राव की बेटी और दामाद से कथित तौर पर पूछे जब पुलिस ने वरवर राव की बेटी और दामाद के घर पर छापेमारी की थी। वरवर राव के दामाद के. सत्यनारायण ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने उनकी पत्नी से ‘अपमानजनक और मूर्खतापूर्ण सवाल’ पूछे।

पुणे पुलिस के सवालों से स्पष्ट है कि वो इस समय किस पाले में खड़ी है, जाहिर है इसी के चलते वो भीमा-कोरेगांव के असली गुनाहगार संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे को पुलिस छू भी नहीं रही है। जबकि इनके उस समय खिलाफ एट्रासिटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करके हिंसा फैलाने का आरोपी बनाया गया था।

जबकि भीमा-कोरेगांव की एकमात्र गवाह लड़की की हत्या को पुणे पुलिस ने आत्महत्या साबित करके मुख्य आरोपियों को बचा लिया है। पुणे पुलिस द्वारा कवि वरवरा राव के बेटी-दामाद से पूछे गए सांप्रदायिक सवालों से स्पष्ट है कि इन पुलिसवालों की ट्रेनिंग नागपुर के हेड ऑफिस में हुई है। और इनका असली मकसद क्या है और किस दुराग्रह और सरकारी आदेश के चलते ये जबर्दस्ती की, क्यों ये अर्बन नक्सल की संघी थ्योरी गढ़कर उनके मुताबिक कार्रवाई कर रहे हैं।

इन पुलिसकर्मियों के सहारे ही सांप्रदायिक सत्ता व संगठन आवाज उठाने वालों को ठिकाने लगाने में जुटे हैं। कोई ताज्जुब नहीं कि अगली बार ये किसी बुद्धिजीवी मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखक, वकील, पत्रकार को पकड़ने के बजाय सीधे एनकाउंटर कर दें।