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बजट में पर्यावरण कहाँ है मोदी जी? सवाल उठा रहे हैं वरिष्ठ लेखक महेंद्र पाण्डेय

जनज्वार। पिछले सप्ताह लगातार दो दिनों तक देशवासियों ने चुनावी भाषण सुना– पहले महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने संसद में जो कहा वह केवल सरकार की वाहवाही थी, फिर पीयूष गोयल ने जो बजट प्रस्तुत करने के नाम पर भाषण दिया वह तो पूरा का पूरा ही चुनावी रंग में रंगा था। जो रही सही कसर थी वो सड़क की तर्ज पर संसद के अन्दर मोदी-मोदी की गूँज ने पूरी कर दी।

वही चुनावी मसाला, जिसमें सरकार खुश है कि सबको कुछ न कुछ दे दिया और दूसरी तरफ सब परेशान हैं कि किसी को कुछ नहीं मिला। पर, इन सबसे अलग यह परखना भी जरूरी है कि इस बजट में पर्यावरण संरक्षण कहाँ था क्यों कि अब यह मुद्दा पूरे देश की जनता को प्रभावित करने लगा है।

बजट के बीच में मंत्री जी ने बताया देश के संसाधनों पर पहला हक़ गरीबों का है। सुनाने में तो अच्छा लगता है, पर किसी भी सरकार द्वारा इससे बड़ा झूठ और कोई दूसरा नहीं बोला जाता है। देश के किसी भी प्राकृतिक संसाधन पर स्थानीय लोगों का कभी अधिकार रहा ही नहीं। प्राकृतिक संसाधनों को लूटने की छूट तो केवल अमीर और उद्योगपति हैं और इस लूटपाट में सरकारें, स्थानीय प्रशासन और पुलिस पूरा साथ देती हैं।

विज़न 2030 में बताया गया कि भारत आधुनिक प्रौद्यौगिकी से संचालित एवं उच्च विकास दर के साथ एक समान और पारदर्शी समाज होगा। शब्दों में तो सब आदर्श लगता है पर वर्ष 2014 के बाद विज्ञान की जिस तरह से नेताओं ने धज्जियां उड़ाएँ हैं उससे कहीं लगता ही नहीं कि हम प्रोद्योगिकी में आगे बढ़ पायेंगे। उच्च विकास दर जिसे हम कहते हैं, वह संसाधनों के विनाश के बिना, और बिना प्रदूषण बढाए संभव नहीं है। सरकार लगातार उच्च विकास दर का दावा करती रही है और हमसब संसाधनों का विनाश और प्रदूषण की मार देख रहे हैं।

इस बजट में पर्यावरण मंत्रालय के बजट में लगभग 20 प्रतिशत का इजाफा हुआ है और यह राशि 3111.20 करोड़ रुपये है, पर किसी भी प्रभावी योजना में बढ़ोत्तरी नहीं की गयी है। बहुचर्चित प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलीफैंट में कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गयी है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का बजट पिछले वर्ष के संशोदित बजट से भी कम है और प्रदूषण निवारण के मद में 50 प्रतिशत की कटौती कर दी गयी है।

दूसरी तरफ नवीनीकृत ऊर्जा के क्षेत्र में बजट में कोई प्रभावी अंतर नहीं आया है, जबकि इस क्षेत्र की हालत वर्तमान में बहुत खराब है और जोरशोर से इस क्षेत्र में आने वाली अनेक कम्पनियां बंद होने के कगार पर हैं। नवीनीकृत ऊर्जा के क्षेत्र में बहुत उम्मीदें थीं, पर बजट के बाद अब निराशा है।

विज़न 2030 में साफ़ नदियों और सबके लिए सुरक्षित पीने के पानी की बात कही गयी है। अजीब लगता है कि जो सरकार स्वच्छ भारत का नारा लगाते नहीं थकती, वही सरकार सबके लिए पीने का साफ़ पानी उपलब्ध के लिए वर्ष 2030 तक का इंतज़ार करने को कहती है। गंगा समेत सभी नदियों की हालत तो हम पिछले चार सालों से देख ही रहे हैं। गंगा के अलावा किसी और नदी की बात ही नहीं होती, और मोदी जी का ड्रीम प्रोजेक्ट नमामि गंगे एक बड़ा जुमला है।

जब बजट में मंत्री जी प्रदूषणमुक्त देश की बात कर रहे थे, लगभग उसी समय थाईलैंड के राष्ट्रपति अपने देश की जनता से बढे हुए वायु प्रदूषण के लिए माफी मांग रहे थे। आप जानकार हैरान होंगे कि माफी माँगने के समप बैंकाक में पीएम 2.5 का स्तर 100 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से थोडा अधिक था, जबकि दिल्ली में जहाँ मंत्री जी बजट पेश कर रहे थे, कुछ जगहों पर इसी पीएम 2.5 का स्तर 400 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक था।

बैंकाक के वायु प्रदूषण के लिए केवल राष्ट्रपति ने माफी ही नहीं माँगी, बल्कि ड्रोन से पानी का छिड़काव भी कराया जिससे प्रदूषण का स्तर जल्दी कम किया जा सके। हमारे देश में जब प्रदूषण घातक हो जाता है तब हम चर्चा शुरू करते हैं और इसे नियंत्रित करने के उपाय तो कभी करते ही नहीं।

बजट भाषण के अनुसार स्वच्छ भारत का मतलब केवल खुले में शौच से मुक्ति है और जलवायु परिवर्तन का मतलब केवल अंतरराष्ट्रीय संधि है। प्रधानमंत्री से लेकर मंत्री तक, हरेक ने स्वच्छ भारत को केवल शौचालय के निर्माण से जोड़ा है, और फोटो खिंचाने के लिए झाडू का सहारा लिया है। पर, यह प्रश्न कोई नहीं पूछता कि शौचालय बनाने के बाद क्या भारत सही में स्वच्छ हो गया?

प्रदूषण मुक्त राष्ट्र के लिए इलेक्टिकल वाहनों और नवीनीकृत ऊर्जा पर जोर दिया जा रहा है। पर तथ्य यह है कि बड़े देशों में भारत ही अकेला ऐसा देश है जहाँ कोयले का उपयोग लगातार बढ़ रहा है।

बजट कम से कम पर्यावरण के क्षेत्र में नकारात्मक ही नजर आता है, न तो योजनायें नजर आती हैं और न ही कोई विज़न स्पष्ट होता है। आप प्रदूषण से बीमार होते रहेंगे, मरते रहेंगे और सरकार प्रदूषणमुक्त राष्ट्र की बातें करती रहेगी।


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