Last Update On : 28 04 2018 11:40:00 AM

कुशीनगर में 13 स्कूली बच्चों की मौत पर चक्रपाणि ओझा का विश्लेषण

जनज्वार। उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के दुदही स्टेशन के समीप गुरुवार 26 अप्रैल को स्कूली वैन मानव रहित क्रासिंग पर एक पैसेंजर रेलगाड़ी से टकरा गई, जिसमें एक दर्जन से अधिक बच्चे अचानक काल के गाल में समा गए। यह हृदय विदारक दुर्घटना सुबह के समय हुई जब ये बच्चे डिवाइन मिशन स्कूल में पढने को जा रहे थे। अचानक घटी इस घटना ने सभी को झकझोर दिया है। पूरा मंडल शोक में डूबा हुआ है। देशभर की निगाहें कुशीनगर में हुए इस हादसे की तरफ लगी हैं। 13 बच्चों की मौत और कई बच्चों का बुरी तरह जख्मी होना लापरवाह स्कूल प्रबंधन व सरकार की नीतियों पर गंभीर सवालिया निशान लगा रहा है।

कुशीनगर में हुआ यह हादसा देश में पहली बार नहीं हुआ है। बावजूद इसके संवेदनहीन रेल प्रशासन व सरकारों की संवेदनहीनता ने ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति करा दी है। पूर्व में हो चुके इस तरह की हादसों से सबक न लेने के कारण ऐसी घटनाएं हर बार हो रही हैं।

आंकड़ों पर गौर करें तो ज्ञात होता है कि जुलाई 2016 में वाराणसी के माधो सिंह स्टेशन के समीप स्कूली बच्चों से भरी मैजिक रेलगाड़ी से टकरा गई, जिसमें आठ बच्चों की मौत हो गई थी। साल 2014 के नवंबर में मऊ के समीप स्कूली बच्चों की वैन रेलगाड़ी से टकराई जिसमें 5 छात्रों की मौत हो गई और अब कुशीनगर के दुदही में 13 बच्चों की मौत ने सबको हिलाकर रख दिया है।

यह हादसा व्यवस्था की संवेदनहीनता की देन कहीं जा सकती है। यह आंकड़े सिर्फ स्कूली बच्चों की मानव रहित क्रॉसिंगों पर हुए हादसों के हैं जो कि ज्ञात हैं और न जाने कितने होंगे। पूरे देश में इसके अलावा अन्य हादसे भी इस तरह के ढालों पर होते ही रहते हैं, जिसमें दर्जनों लोग मारे जाते हैं।

इतनी घटनाओं के बाद भी अगर जिम्मेदार लोगों ने अपने आंख कान बंद किए रहे हैं तो यह उनकी संवेदनहीनता के अलावा और कुछ नहीं है। इसका मतलब स्पष्ट है कि न तो स्कूल संचालकों को बच्चों की सुरक्षा की कोई चिंता है और न ही सरकारों और उसके अधिकारियों को।

अगर इन जिम्मेदारों को तनिक भी शर्म होती तो वे इस तरह के स्कूलों की लापरवाही पर लगाम लगाते, प्रबंधन की गैर जिम्मेदाराना हरकतों को रोकने का प्रयास करते, मानक तय करते तथा लागू करवाने का काम करते। लेकिन इन लोगों ने ऐसा कभी नहीं किया। मानक विहीन स्कूलों को धडल्ले से चलाने की छूट भला कौन देता है।

स्कूलों में कौन पढा रहा है, उसे कितना वेतन मिलता है, कितनी फीस वसूली जाती है, सुरक्षित भवन, खेल का मैदान वाहनों की संख्या, वाहन चालकों की सूची प्रशासन के पास नहीं होती और उन्हें इसकी कोई आवश्यकता भी शायद महसूस नहीं होती।

जरा गौर करें जब कुकुरमुत्तों की भांति फैले इन शिक्षा की दूकानों का उद्भव नहीं हुआ था तब भी क्या ऐसे ही हादसे का शिकार नौनिहालों को होना पढ़ता था। शायद ऐसा नहीं था। अंग्रेजी की पढ़ाई करवाने के नाम पर अभिभावकों का जेब काटने वाले ये स्कूल कब किस बच्चों को मौत की नींद सुला दें, कोई नहीं जानता।

अभी कुछ ही माह पहले देवरिया के एक प्राइवेट स्कूल की छत से गिरने की वजह से एक छात्रा की मौत हो गई थी। सुरक्षा व अन्य किसी भी मानकों को पूरा न करने वाले ये स्कूल बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं।

देश में जबसे शिक्षा के निजीकरण की आंधी चली है तभी से इस तरह की घटनाओं में वृद्धि देखी जा रही है। जब तक स्कूल ज्ञान के केंद्र थे तब सब कुछ ठीक था जब स्कूल मुनाफे के केन्द्र बन गए तब से ऐसी घटनाएं आए दिन सुनने को मिल रही हैं। दुदही जैसा हादसा फिर आगे न हो इसके लिए समान एवं पड़ोसी स्कूल की शिक्षा की व्यवस्था पूरे देश में लागू करनी होगी। साथ ही सरकारी स्कूलों को आत्मनिर्भर बनाना होगा।

अंग्रेजी के नाम पर मची लूट को खत्म करने के लिए सरकारों को कड़े़ कदम उठाने चाहिए और जनता को भी अपने पाल्यों को मातृभाषा में शिक्षा दिलाने की कोशिश करनी चाहिए। कुशीनगर की इस मर्माहत करने वाली घटना पर टिप्पणी करते हुए स्ववित्तपोषित वित्तविहीन महाविद्यालय एसोसिएशन के प्रवक्ता चतुरानन ओझा कहते हैं कि आज के समय में प्राडवेट स्कूलों में पढना और पढाना दोनों पाप है।

प्राइवेट स्कूलों के प्रबंधकों में इस घटना के बाद गोरखपुर मंडल के सभी स्कूलों को एक दिन बंद करने का निर्णय लिया है इस पर उनका साफ कहना है कि शिक्षा के इन धंधेबाजों को फर्जी शोक प्रदर्शन बंद करना चाहिए। सवाल करते हुए कहा है कि क्या ये प्रबंधक नियमों के आधार पर आज से स्कूल संचालित करेंगे, क्या मानकों के हिसाब से शिक्षकों को तनख्वाह देंगे, क्या आज से वे छात्र-अभिभावक शोषण बंद करेंगे और ऐसा नहीं है तो यह बंदी महज दिखावा भर है।

इस हृदय विदारक घटना ने सभी संवेदनशील लोगों को सहमा दिया है। सूर्य की पहली किरण के साथ जो बच्चे अपने घरों से निकले थे उन्हें क्या पता था कि उनका स्कूल प्रबंधक एक ऐसे वाहन चालक को भेजा है, जिसकी खुद की उम्र अभी पढने की थी। कान में मोबाइल का लीड लगाकर गाड़ी चलाना गलत है, लेकिन इस पर निगाह रखना स्कूल संचालक का काम है। अगर स्कूल का संचालक बच्चों के प्रति इतना ही संवेदनशील होता तो उस वैन में एक जिम्मेदार कर्मचारी बच्चों की सुरक्षा के लिए अवश्य होता।

लेकिन शायद ऐसा नहीं था। कुल मिलाकर इस घटना के बाद मुख्यमंत्री ने घटना स्थल का औचक दौरा कर पीडितों को हर संभव मदद का आश्वासन भले ही दिया हो तथा अधिकारियों पर कार्रवाई की हो, लेकिन सबसे बडा सवाल यह है कि आखिर कब तक बच्चों की मौतों का यह सिलसिला चलता रहेगा,कब तक स्कूल संचालक अपनी मनमानी करते रहेंगे। कब तब मां-बाप अपने बच्चे के स्कूल से घर न आ जाने तक बेचैन रहेंगे। इसकी जवाबदेही तो आखिर देश के शासकों की ही बनती है।

(लेखक मुक्त विचारधारा अखबार के संपादक हैं।