पत्नी वसंता कुमारी के साथ जीएन साईबाबा का फाइल फोटो

लोकतंत्र की हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि साईबाबा जैसों को उनके खराब स्वास्थ्य के बावजूद किसी भी तरह से जमानत देने से इनकार कर दिया जाता है, जबकि गुजरात के नरोदा पाटिया में 2002 में हुए जघन्य हत्याकांड के लिए दोषी बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी को स्वास्थ्य का हवाला देते दे दी जाती है जमानत….

जनज्वार, दिल्ली। माओवादी समर्थक होने के जुर्म में पिछले दो सालों यानी मार्च 2017 से उम्रकैद की सजा काट रहे दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और सामाजिक कार्यकर्ता जीएन साईबाबा को जमानत दिए जाने के समर्थन में 10 अप्रैल को प्रेस क्लब आफ इंडिया में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन कमिटी फॉर द डिफेंस एंड रिलीज आफ डॉ. जीएन साईबाबा के तत्वावधान में किया गया। बतौर वक्ता इसमें जी हरगोपाल, मनोरंजन मोहंती, नंदिता नारायण, प्रशांत भूषण, संजय काक और विकास गुप्ता ने अपनी बात रखी।

गौरतलब है कि माओवादियों से संबंध होने के आरोप में महाराष्ट्र पुलिस ने मई 2014 में जीएन साईबाबा को गिरफ़्तार किया था। मार्च 2017 में उन्हें उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई और इसके बाद से वे नागपुर केंद्रीय जेल में बंद हैं।

जेल से अपनी पत्नी वसंता कुमारी के नाम लिखे साईबाबा के पत्रों में उन्होंने लिखा है ‘मैं अब तक आधा मर चुका हूं’ शारीरिक रूप से विकलांग साईबाबा माओवादी समर्थक होने के ‘अपराध’ के लिए मार्च 2017 से नागपुर सेंट्रल जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर जीएन साईबाबा ने देश के अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए हमेशा से आवाज उठाई, जिसकी कीमत बतौर आजीवन कारावास चुका रहे हैं। उनके उत्पीड़न की हाईट ये रही कि 90 फीसदी विकलांग होने और लगभग 15 बीमारियों से जूझ रहे जीएन साईंबाबा को अंडा सेल तक में तक रखा गया।

कमिटी फॉर द डिफेंस एंड रिलीज आफ डॉ. जीएन साईबाबा द्वारा जारी रिलीज के मुताबिक, जीएन साईबाबा ने राज्य समर्थित कॉरपोरेटस द्वारा संसाधनों की हिंसक और सतत लूट को समझा और “विकास” के नाम पर आदिवासियों के विस्थापन और निर्वासन के खिलाफ़ एक मजबूत आवाज़ बनकर उभरे। मगर शरीर से विकलांग साईबाबा से इसकी ​कीमत सालों से बीमार होने के बावजूद कैदी बनाकर वसूली जा रही है। शासन—प्रशासन के इशारे पर बार-बार उन्हें जमानत देने से इनकार करना, जानलेवा कष्ट व्यापक स्तर पर लोकतंत्र के खत्म होते जाने की तरफ इशारा करता है।

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गौरतलब है कि जीएन साईबाबा एक ऐसे कैदी हैं, जो पोलियो के बाद पक्षाघात के कारण व्हीलचेयर पर हैं और 90% विकलांग हैं। पिछले 2 सालों के पुलिसिया उत्पीड़न, दमनकारी जेल की दिनचर्या और शासन के इशारे पर उन्हें चिकित्सकीय देखभाल न मिलने से उनका शरीर बुरी तरह प्रभावित हुआ है। बावजूद इसके उन्होंने अपनी उत्साह को मरने नहीं दिया है।

गौरतलब है कि ट्रायल से पहले भी जीएन साईबाबा के अग्नाशय और पित्ताशय की थैली में मौजूद गड़बड़ियों का पता चल चुका था, जिसमें कि तत्काल सर्जरी की आवश्यकता होती थी। मगर कन्विक्शन के चलते इन दोनों सर्जरियों को, जो कि बहुत जरूरी थीं उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए, टाल दिया गया। उनकी स्थिति अब बेहद खराब हो चुकी है। उन्हें रीढ़ की समस्याएं और गुर्दे की बीमारियों ने भी जकड़ लिया है।

साईबाबा ने जेल से एक महीने पहले अपनी पत्नी वसंता के नाम लिखे खत में लिखा, ‘मेरे बाएं हाथ की क्षतिग्रस्त मांसपेशियों में असहनीय दर्द का अनुभव हो रहा है, मेरे दिमाग में हर समय चक्कर आने और भारी दबाव के कारण बार-बार और पूरी तरह से अँधेरा छा जा रहा है, और तेज सिर दर्द के कारण नींद नहीं आती है। दवाएं अब निष्प्रभावी हो गई हैं। यहां तक कि पेनरिलीफ दवाओं ने अब मुझ पर काम करना बंद कर दिया है।”

इन तथ्यों का हवाला देते हुए उनकी पत्नी वसंता ने एक हलफनामा दायर किया था, जिसमें कहा गया था कि जेल प्रशासन उन्हें जीवन रक्षक दवाओं की निर्धारित खुराक नहीं दे रहा है और नागपुर में किसी भी उपचार के लिए ज़रूरी आवश्यक सुविधाएं पूरी तरह से अपर्याप्त हैं।

जीएन साईबाबा के वकील मिहिर देसाई कहत हैं, जेल प्रशासन उन्हें आवश्यक उपचार नहीं दे रहा है। मगर न्यायाधीश अभी भी जेल अधिकारियों द्वारा दायर जवाब पर भरोसा करते हैं, जिसमें उन्होंने कहा कि प्रोफेसर साईबाबा को “पर्याप्त” और जरूरी उपचार मिल रहा है।

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25 मार्च को अदालत ने साईबाबा की जमानत अर्जी खारिज कर उन्हें वापस जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया है। जीएन साईंबाबा के साथ ऐसा अमानवीय बर्ताव तब किया जा रहा है, जबकि उनकी रिहाई के लिए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों कैटालिना देवनदास, मिशेल फ्रॉस्ट, डेनियस पुरस और नील्स मेलज़र ने भारत सरकार से अपील करते हुए कहा था ‘हम लोग साईबाबा के 15 से ज़्यादा शारीरिक समस्याओं से जूझने की रिपोर्ट से चिंतिंत हैं, इनमें से कुछ गंभीर बीमारियां हैं। उन्हें तत्काल अच्छे चिकित्सा उपचार की जरूरत है।

इन मानवाधिकार विशेषज्ञों ने अपील में कहा था, हम भारत को याद दिलाना चाहेंगे कि कारावास में विकलांगों के साथ उचित आवास, चिकित्सा की व्यवस्था से किसी भी तरह का इनकार न केवल भेदभावपूर्ण है, बल्कि ये दुर्व्यवहार और यातना की श्रेणी में आता है। शारीरिक अक्षमताओं से जूझ रहे कैदी की स्थिति अगर बहुत ज़्यादा ख़राब है तो उसके कारावास की सज़ा पर रोक लगा देना चाहिए। विकलांग कैदियों की इस तरह की स्थिति यातना की हाईट है।

साईबाबा को भारत में लंबे समय में विभिन्न अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए लड़ने वाला कहते हुए रिलीज में कहा गया है कि ऐसा कोई भी सबूत सामने नहीं आया है जिससे यह पता चले कि जीएन साईबाबा हिंसा भड़काने वाले षड्यंत्रकर्ता हैं या उन्होंने हिंसा भड़काने वालों की सहायता की हो।

जीएन साईबाबा को जमानत दिए जाने के समर्थन में आयोजित कार्यक्रम में​ हिस्सेदारी करते वक्ता

अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोगों को बर्बर यूएपीए एक्ट के तहत घेरा गया है, यहां तक कि कइयों की हत्या तक कर दी गई है। पिछले कुछ सालों में कुछ लोगों को चिन्हित कर, आतंकित कर, डरा-धमकाकर लोकतांत्रिक असहमतियों को विचलित या खामोश कर दिया जाता है।

आज लोकतंत्र की हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि साईबाबा जैसों को उनके खराब स्वास्थ्य के बावजूद किसी भी तरह से जमानत देने से इनकार कर दिया जाता है, जबकि गुजरात के नरोदा पाटिया में 2002 में हुए जघन्य हत्याकांड के लिए दोषी बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी को स्वास्थ्य का हवाला देते जमानत दे दी जाती है।

गौरतलब है कि साईबाबा को पहली बार मई 2014 में गढ़चिरौली पुलिस ने प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) का सदस्य होने तथा उन्हें सुविधायें मुहैया कराने और समूह के लिए भर्ती में मदद करने के आरोप में गिरफ्तार किया था। जून 2015 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने मेडिकल आधारों पर उन्हें ज़मानत दे दी, जिसके बाद जुलाई 2015 में उन्हें रिहा कर दिया गया।

इसके बाद उसी साल दिसंबर में उन्हें फिर से जेल भेज दिया गया। फिर अप्रैल 2016 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिल गई। मार्च 2017 में माओवादियों से संबंध रखने के आरोप में उन्हें उम्रक़ैद की सज़ा मिली, जिसके बाद से वह नागपुर केंद्रीय जेल में बंद हैं।

जेल से लिखी गई जीएन साईंबाबा की कविता ‘I refused to Die’

I refused to Die
Again, when I refused to die
tired of my life
my captors released me
I walked out
into the lush green valleys under the rising sun
smiling at the tossing blades of grass
Infuriated by my undying smile
They captured me again
I still stubbornly refuse to die
The sad thing is that
They don’t know how to make me die
Because I love so much
The sounds of growing grass


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