एक सर्वे के मुताबिक 1989 के बाद कश्मीर में जितने लोगों के साथ बलात्कार किया गया, वो संख्या चेचन्या और श्रीलंका जैसे संघर्षरत क्षेत्रों में हुई बलात्कार की घटनाओं से है कहीं ज्यादा…

कश्मीर में संघर्ष 8वें दशक में प्रवेश कर चुका है। हजारों लोग मार दिए गए हैं। कइयों हजार घायल हुए हैं और सुरक्षा बलों द्वारा युद्ध के औजार के रूप में बलात्कार को अपनाए जाने के सुव्यवस्थित दस्तावेज उपलब्ध हैं। इसके विरोध में हुए आंदोलनों को, कम से कम अब तो इसे लोकप्रिय आंदोलन के रूप में मानना ही होगा। परन्तु ‘राष्ट्र की सुरक्षा’ व ‘अखंडता’ के नाम पर होने वाले जनसंहार पर भारत की जनता चुप क्यों है?

1990 के दशक से कश्मीर सुरक्षा बलों द्वारा मानव अधिकार उत्पीड़नों का विवादित व विभाजित क्षेत्र बन गया है, इसको साबित करने वाले सुव्यवस्थित दस्तावेज उपलब्ध हैं।

जम्मू और कश्मीर को मानव अधिकारों के लिए कब्रगाह कहना भी कम है। आरोपों का विस्तार सामूहिक हत्या, बलात गायब करना, टार्चर, बलात्कार व सेक्सुअल उत्पीड़न से लेकर राजनीतिक दमन एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने तक है। इस क्षेत्र में 1990 से कई जनसंहार हो चुके हैं। भारतीय सेना, सीआरपीएफ, सीमा सुरक्षा के जवान और विभिन्न प्रकार के राज्य समर्थित मिलिशिया आरोपी हैं और इन्हें कश्मीरी नागरिकों के खिलाफ गंभीर मानव अधिकार उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार पाया गया है।

विकीलीक्स के एक अंक ने भी भारत पर व्यवस्थित तरीके से मानव अधिकार उत्पीड़न का आरोप लगाया है। इसने कहा कि कई अमेरिकी राजनयिकों के पास भारतीय पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा टार्चर के इस्तेमाल का पक्का सबूत है।

कश्मीरी बगावत के उभार को रोकने के लिए संसद में पास होने के बाद सितम्बर, 1990 में जम्मू और कश्मीर में सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम (AFSPA) को लागू किया गया था।

मानव अधिकार संस्था एमनेस्टी ने दावा किया है कि अफ्स्पा सुरक्षा बलों को मानव अधिकारों के उल्लंघन के आरोप से उन्मुक्ति देता है। एमनेस्टी ने इसकी निंदा भी की है। संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकार उच्चायुक्त ने कश्मीर से अफ्स्पा को हटाने और वहां लोगों के गायब होने की जांच हेतु भारत से कइयों बार आग्रह किया है।

अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संस्थाओं और अमेरिकी राज्य विभाग ने तथाकथित ‘काउंटर टेररिज्म’ ऑपरेशनों के दौरान टार्चर, गायब करने और मनमाना हत्याएं जैसी अतियों को दर्ज किया है। ह्यूमन राइट्स वाच ने भी भारतीय सुरक्षा बलों पर बच्चों को मुखबिर व संदेशवाहक के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया, भारतीय सेना ने रिपोर्टरों और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया है।

ये सुरक्षा बल एक घटना में स्थानीय आबादी को डराने के लिए 200 महिलाओं के साथ बलात्कार के आरोपी हैं। विकीलीक्स केबल ने ऐसे तथ्य को अपने पास रखने की रिपोर्ट दी है, जिसमें यह कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय रेडक्रास कमिटी ने भारत में अमेरिकी अधिकारियों से बताते समय भारत पर आरोप लगाया था कि वहां पीड़ितों के साथ दुर्व्यवहार के रूप में टार्चर और ‘सेक्सुअल पेनेट्रेशन’ की छूट दी जाती है।

अंतरराष्ट्रीय रेडक्रास कमिटी ने आरोप लगाया था कि 1296 बंदियों का साक्षात्कार लिया गया था। उसमें से 681 ने बताया कि उनके साथ टार्चर किया गया था। इनमें से 304 व्यक्तियों ने शिकायत किया कि उनके साथ सेक्सुअल उत्पीड़न किया गया था।

2005, में Medecins Sans Frontieres ने कश्मीर में एक सर्वे किया था जिससे यह पता चला कि 1989 के बाद कश्मीर में जितने लोगों के साथ बलात्कार किया गया, वो संख्या चेचन्या और श्रीलंका जैसे संघर्षरत क्षेत्रों में हुई बलात्कार की घटनाओं से अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा है। सर्वे में यह पता चला कि पूछे गए लोगों में से 1989 के बाद से 13% के साथ बलात्कार हुआ और 11.6% के साथ सेक्सुअल उत्पीड़न की घटना हुई।

अक्टूबर, 2011 में मुख्यमंत्री ने 1400 बलात्कार पीड़ितों का नाम, परसेन्टेज और पता को जारी करने के लिए माफी मांगा था। परन्तु इसका कोई ब्योरा नहीं था जिससे ये पता चले कि इन बलात्कारों के दोषी सुरक्षा कर्मी या मिलिटेंट अथवा अपराधी थे। विशेषज्ञ यह मानते हैं कि इसके लिए कश्मीर में कोई आधिकारिक अनुमति नहीं है, बल्कि ये ज्यादतियां इसलिए आसानी से की जातीं हैं क्योंकि कानून द्वारा सुरक्षा बलों को गांवों, उपनगरों का सर्च करने का विशेष अधिकार व कुछ उन्मुक्तियां दी गयी हैं।

अधिकारी पीड़ितों का आतंकियों से जुड़ाव को जिम्मेदारी से मुक्ति के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। जब एक बार पीड़ित का आतंकियों से जुड़ाव स्थापित हो जाता है तो उसके परीक्षण की जरूरत नहीं होती

सुरक्षा बलों ने गैर-न्यायिक हत्याएं, हमला और अन्य मानव अधिकारों का उल्लंघन किया है। जम्मू और कश्मीर राज्य मानव अधिकार आयोग के एक जांच में यह पाया गया कि उत्तरी-कश्मीर में 38 जगहों पर अचिंहित कब्रों में 2730 शव प्राप्त हुए हैं। इनमें से 574 शवों को स्थानीय जनता के रूप में पहचाना गया था, परंतु भारत की आम जनता कश्मीरी जनता की दुर्दशा पर कब तक चुप रहेगी?

(मुस्लिम मिरर में प्रकाशित इस लेख का हिंदी अनुवाद जनज्वार के लिए सामाजिक कार्यकर्ता कृपाशंकर ने किया है।)