Last Update On : 15 12 2017 10:02:00 PM

मेरे पति सप्ताह में केवल एक बार मेरे साथ सोते थे। बाकी दिन वह कहाँ होते थे नहीं मालूम लेकिन सप्ताह के दूसरे दिनों में मेरे जेठ, ससुर या कोई और मुंह अंधेरे में आया करता था…

हाउस वाइफ कॉलम में इस बार दिल्ली की श्वेता सिंह

अब मैं सामान्य और संतुलित हूँ। मेरे लिए यह सिर्फ यादें हैं, कुछ खौफनाक यादें। वो यादें हैं जहां से मैं लड़की से औरत बनी और महान भारतीय गांवों की सदस्य। क्योंकि उससे पहले तक मैं शहर में रही थी, गांवों से अपना रिश्ता केवल मामी- बुआओं के बच्चों की शादियों में जाने का रहा था। मामी बुआओं के बच्चे हमउम्र थे इसलिए मैं कई बार गयी भी।

ऐसी ही एक शादी में मैं मुज़फ्फरनगर के एक गांव में गयी थी। मैं शादियों में अपनी सहेलियों के साथ मस्ती कर रही थी उसी दौरान मैं किसी को पसंद आ गयी। ये बात मुझे तब पता चली जब मैं दिल्ली आ गयी और पसंद करने वाले लड़के के परिवार से रिश्ता आया।

मैं सुनके हैरान रह गयी। मैं खुद एक लड़के से प्यार में थी और हम दोनों शादी को लेकर गंभीर थे। वह मेरे साथ ही पढ़ता था। पर इस नए प्रस्ताव ने मुझे उलझन में डाल दिया। माँ-पापा ने पूरी तैयारी कर ली थी कि वहीं शादी मुज़फ्फरनगर वाले लड़के से करेंगे। मैं इस बीच अपने प्रेमी से मिली। उसको मैंने अपनी हालत बताई। मैंने कहा कि मैं अपने घर वालों को अपने तुम्हारे रिश्ते के बारे में बता देती हूं, फिर अगर घर वाले नहीं मानेंगे तो हम लोग अलग जाकर शादी कर लेंगे।

पर इतनी बात सुन मेरा प्रेमी को दौरा पड़ने लगा। वह रोने लगा। वह डर से कांपने लगा। कहने लगा कि तुम नहीं जानती कि ये पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा वाले कैसे होते हैं। वह हमें तुम्हें मारकर पेड़ पर टांग देंगे। वह मीडिया में छपने वाली खबरों के बारे में बताने लगा। उसी समय वह अपने किसी पत्रकार भाई के पास ले गया, फिर क्या था उसने तो ऐसा बताया कि अगर मेरे संग उसके भाई की शादी हो जाएगी तो पूरा बिहार ही साफ हो जाएगा। दिल्ली से लेकर दरभंगा तक खून ही खून बिखरा होगा।

खैर, मैं चली आयी। घर में रोज सुबह शाम शादी के लिए दबाव। मैं अपने खानदान और रिश्तेदारी ली अकेली छोरी थी, जो 28 की उम्र तक बिनब्याही थी। जबसे प्रेमी भागा था तबसे मुझे यही लगने लगा था कि मुजफ्फरनगर ही बियाही जाउंगी। ऐसे में माँ बड़े दिनों से पूछ रही थी रोक्के के लिए मैंने हां कर दी। लेकिन मैंने पूछा कि लड़के को मैं क्यों पसंद आई।

माँ बोली, ‘तेरे बाबा गांधी जी के समय में बड़े नेता रहे थे इसलिए पापा और परिवार को गांव समाज के लोग बहुत सम्मान करते हैं। दूसरा तेरे पिताजी दिल्ली में बड़े अधिकारी हैं, बसंत कुंज में रहते हैं और तु खुद इंग्लिश में ऑनर्स करने के बाद दिल्ली विश्विद्यालय से एलएलबी कर रही है, इसलिए आया होगा रिश्ता। फिर तु दिखने में कौन सी बुरी है। माँ इतना बोल हंस पड़ी थी।

फिर माँ उसका फ़ोटो ले आयी। लड़का ठीक था। माँ ने बताया कि उसका डिग्री कॉलेज है और बहुत बड़ा जमींदार है। आगे बोली मैंने बात कर ली है लड़के से कि मेरी बेटी गोबर न थापेगी, उसे अपने स्कूल की प्रिंसिपल बनइयो। वह घनी पढ़ी लिखी है।

2004 के जाड़ों में शादी हो गयी। बारात बंसत कुंज में आई थी। गांव से आये बारातियों ने पूरे मोहल्ले में बड़ा गंध मचाया। स्कर्ट में जाती लड़की को दारू पीए हुए किसी बाराती ने कुछ बोल दिया, लड़की ने उस पर कुत्ता छोड़ दिया। ऐसे कई तमाशे हुए उस रात और आसपास के लोगों को लंबे समय तक याद रही मेरी शादी।

कुछ दिन ससुराल रहकर मैं मायके आ गयी। घर में सास के अलावा ससुर तीन जेठ और एक देवर थे। मैं पहली बार में ससुराल कुल 15 दिन रही, जिसमें मेरे पति 5 रात केवल मेरे साथ रहे, बाकी दिन बताया गया कि वह स्कूल के काम से भाग दौड़ में बाहर होते हैं। इस बीच वह दिन में कई बार आ जाते थे, पर मेरे पास न के बराबर बैठते।

अभी शादी के सप्ताह भी नहीं गुजरे थे कि मेरे पति ने कह दिया कि कम ही बोला कर, ये कोई दिल्ली न है, यहां औरतन का पैर चौखट से बाहर नहीं जाता और जिनका जाता है वह फिर बाहर ही जाती हैं या फिर ऊपर।

मैं 15 दिन बाद जब एलएलबी की परीक्षा देने दिल्ली लौटी तो माँ को ससुराल के वाकये के बारे में बताया। मां ने कहा कि देहात के लोग ऐसे ही बोलते हैं। फिर तेरी जैसी वहाँ पढ़ी—लिखी कोई नहीं है न, इसलिए ऐसी आदत होगी तेरे मरद को, ठीक कर देना तू।

मैं भी यही सोचकर परीक्षा देकर ससुराल वापस आ गयी कि हो सकता है माँ सही हो। पर माँ यहां गलत साबित हुई। मेरे पति का रूटीन जस का तस बना रहा। कभी आया, कभी नहीं आया।

मैं अब उन्हें टोकने लगी थी। कई बार सज—धजकर मोहने की कोशिश की। पर कोई असर नहीं। बोला भी कि मैं भी आपके साथ स्कूल चलती हूं। मेरी इंग्लिश अच्छी है मैं टीचर्स को गाइड कर दूंगी पर नहीं। मुझे कई बार पूरी रात नींद न आये। मैं इंतज़ार करती रह जाऊं।

एक दिन मैं अभी अर्धनिद्रा में ही थी कि कोई मुझसे लिपटने लगा। मेरा कमरा खुला ही रहता था कि पति आएंगे तो आ जाएंगे। अर्धनिद्रा में लिपटने का अहसास अच्छा लगा, पर चेहरे में हाथ लगाते ही मैं उछल पड़ी। वह मेरा पति नहीं था। मैं अभी संभलती कि वह आदमी कमरे से बाहर चला गया।

मैं सकपकाई बहुत देर बैठी रही। कुछ देर बाद अपनी जेठानी का दरवाजा खटखटाया और पूरी बात बताई। वह बोलीं, कोई नहीं होगा। तेरा आदमी नहीं रहा, इसलिए तुझे ऐसे खयाल आते होंगे। पर मुझे उनके कहे पर भरोसा नहीं हुआ, क्योंकि मैंने अपनी आंखों से उस आदमी को जाते और दरवाजे पर चप्पल पहनते देखा था।

पति के आने पर कहा तो वह लगा कहने, तेरा दिमाग खराब है कुछ दिन में सब ठीक हो जाएगा। वहीं इस घटना को सुनने के बाद छोटी देवरानी ने कहा सब आदत की बात है, आदत हो जाएगी फिर कुछ बुरा नहीं लगेगा। लेकिन इस बीच मैंने चप्पल वाले आदमी की पहचान कर ली थी क्योंकि चप्पल पहनते वक्त वह आदमी मेरी एक चप्पल पहन ले गया था, जिसे मैंने वहां छुपाया हुआ पाया, जहां मेरे ससुर सोते थे। दूसरी बात अगले ही दिन मेरे ससुर ने अपनी मूंछें छोटी करा ली थीं।

मैं अब दरवाजा बंद कर सोने लगी थी, क्योंकि मुझे लगता था ससुर कभी भी आकर कुछ गलत कर सकते हैं। पर बंद दरवाजे से कोई फर्क नहीं पड़ा। एक रात मेरा दरवाजा बजा, खोला तो देखती हूँ कि मेरे जेठ मुझसे चिपटने लगे। मैंने धक्का दे उनको बाहर करना चाहा तो उन्होंने मुझे अंदर कमरे में धक्का देकर मेरे ऊपर चढ़ने का प्रयास किया। पर मैं इसके लिए पहले से मानसिक रूप से तैयार थी इसलिए मैंने जेठ को न सिर्फ बाहर भगाया, बल्कि दो—चार थप्पड़ भी लगा दिए।

फिर रात को हुआ हंगामा। सभी जेठानियाँ—देवरानियां आ गईं। सास भी। ससुर और जेठ भी। मैंने पूरी बात बताई। ससुर वाली घटना भी बताई। तब तक पता नहीं कहाँ से मेरे पति आ गए। उन्होंने भी सुना। पर मेरी सास और बड़ी जेठानी ने ससुर और जेठ का बचाव किया। देवरानी मेरी ओर थी। उसने भी कहा कि एक दूसरे जेठ ने भी उसके साथ कई बार ज्यादती की है, पर उसका पति इस बात पर ध्यान नहीं देता।

देवरानी की यह बात सुनते ही मेरी सास उसे मारने लगीं और मैं जब उसे छुड़ाने गयी तो मेरे पति ने मुझे पीट दिया। मैंने और देवरानी ने इतनी मार खाई थी कि 3-4 दिन हल्दी दूध पीकर और मालिश से ठीक हुईं। मालिश करने वाली महिला ने बताया कि यह तो इस खानदान में आम बात है। मेरी सास के साथ भी यही होता रहा है।

फिर उसने मुझे समझाया कि देखो इस पर बात तब उठती जब किसी एक के साथ होता, ये तो सब ही यहां करते हैं। उसी ने बताया कि मेरे पति ने भी एक और बीवी रखी है और उससे एक बेटा भी है। वह चूंकि मेरी जाति की नहीं है, इसलिए शादी नहीं कर सकता।

मैंने पूछा, मुझसे शादी क्यों की। इसका जवाब दाई तो नहीं दे पाई, लेकिन मेरी देवरानी ने बताया कि वह अगले साल सांसद का चुनाव लड़ने वाला है तुमसे इसलिए शादी की है कि कहीं रखैल वाली बात को उछालकर विरोधी उसे साइडलाइन न करा दें।

और भी किस्से कहानियां सुनने को मिलीं। वहीं पता चला कि मेरी ननद एक दूसरी जाति के लड़के से शादी करने की जिद पर अड़ी रही तो उसकी हत्या से पहले ससुर ने उसका बलात्कार किया। अपनी बेटी का ही बलात्कार। दाई ने बताया कि वह वही कमरा है जिसमें मैं रहती हूं।

यह सुनने के बाद मैं ससुराल में जितने दिन रही, बरामदे में कटार लेकर सोती रही। एक हफ्ते में मैंने एक दोस्त से इंतज़ाम कराकर परीक्षा की एक चिट्ठी दिल्ली से ससुराल में रजिस्ट्री करने को बोली कि मैं यहां से निकल सकूँ। इस योजना में मैं सफल रही। दिल्ली आने के बाद फिर मैं वहां कभी नहीं लौटी।

कई बार वह लोग कई रिश्तेदारों के साथ पंचायत करते रहे, पर मेरे पापा कभी न तैयार हुए। वह लोग तब से कभी नहीं आये, जब मेरे पापा ने कह दिया कि आपका घर, घर नहीं रंडीखाना है और आप लोग दलाल। उसके बाद पापा ने कहा कि उठकर भाग जाओ अन्यथा सबको जेल में डलवा दूंगा।

3 साल में हमने हर्जाना और तलाक दोनों ले लिया था। अब मैं शिक्षक हूँ और अकेली रहती हूं, क्योंकि मैं अपनी जाति के लड़कों से शादी नहीं करना चाहती और मेरे घर वाले दूसरी जाति में करने नहीं देंगे। यह बात मैं यूँ ही नहीं कह रही, बल्कि अपनी बुआ, मामी और अन्य रिश्तेदारों की बेटियों से बात कर कह रही हूं।

मेरी अपनी जाति में शादी की हुई दर्जनों लड़कियों से बात हुई, पर कोई एक ऐसी नहीं मिली जो यौन उत्पीड़न से इनकार करती हो और ससुराल में इंसान जैसा सम्मान पाती हो।