Last Update On : 08 06 2018 06:01:26 AM

विश्व महासागर दिवस 8 जून पर विशेष

युवा पत्रकार शम्स तमन्ना का विश्लेषण

7-9 मार्च 2018 को दक्षिण अमेरिकी देश मेक्सिको के रिवेरा माया में पांचवां विश्व महासागर सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस आयोजन से जो निष्कर्ष सामने आया उससे यह स्पष्ट हो गया था कि यदि समय रहते महासागरों में हो रहे असंतुलन की ओंर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य ही नहीं, वर्तमान जीवन का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जायेगा।

सम्मेलन की गंभीरता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि इसमें समुद्री सीमा से जुड़े लगभग सभी देशों की सरकारों के प्रतिनिधि, वैज्ञानिक समुदाय, उद्योग जगत से जुड़े संगठनों, संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेष दूत और नागरिक समाज से जुड़े करीब 360 से अधिक लोगों ने भाग लिया।

इस सम्मेलन के माध्यम से समुद्र के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के साथ साथ मानवीय गतिविधियों को संतुलित करने पर बल दिया गया। इसके साथ ही महासागरों के सामने आने वाली समस्याओं के बारे में जहाँ चर्चा की गई वहीँ इसके संसाधनों की सुरक्षा और इसके दोहन के तौर तरीकों पर भी गंभीरता से विचार किया गया। ताकि मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ साथ महासागरों के अंदर पनपने वाले जीव-जंतुओं के जीवन को भी सुरक्षित बनाया जा सके।

संयुक्त राष्ट्र संघ के सतत विकास लक्ष्य में भी स्थाई सतत विकास के लिए महासागरों, समुद्रों और समुद्री संसाधनों के संरक्षण और उपयोग पर विशेष बल दिया गया है। लक्ष्य 14.5 में यह उल्लेखित किया गया है कि वर्ष 2020 तक वैज्ञानिक पद्धति से कम से कम दस प्रतिशत तटीय क्षेत्रों का संरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा।

महासागरों के संरक्षण की दिशा में यूएनओ का पहल स्वागतयोग्य है। एक अनुमान के मुताबिक विश्व की कुल जनसंख्या का 30 प्रतिशत तटीय क्षेत्रों में निवास करती है। महासागर उनके लिए न केवल खाद्य पदार्थों का प्रमुख स्रोत है बल्कि अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

साधारण नमक, जिसका उपयोग आदिकाल से मानवजाति करती आ रही है, इसी सागर की ही देन है। ऐसे में धरती के 70 प्रतिशत भूभाग पर फैली विशाल जलराशि का मानव जीवन में कितना मायने रखता है इसका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है।

वास्तव में पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व वायुमंडल और महासागरों जैसे कुछ विशेष कारकों के कारण संभव हो पाया है। वैज्ञानिक इस बात पर एक राय हैं कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति महासागरों में ही हुई है और आज भी महासागर जीवन के लिए आवश्यक परितंत्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

अपने आरंभिक काल से लेकर आज तक महासागर जीवन के विविध रूपों को संजोए हुए है। इसने अपने अंदर अनेक विशालकाय जीवों से लेकर अति सूक्ष्म और छोटे छोटे नाज़ुक पारितंत्रों को पनाह दिया हुआ है। एक अनुमान के अनुसार महासागरों में जीवों की तक़रीबन दस लाख प्रजातियां मौजूद हैं और इनमें ऐसे कई जीव हैं जिन तक आज भी वैज्ञानिकों की पहुंच संभव नहीं हो पाई है।

महासागर केवल जीवों के संरक्षण को ही बढ़ावा नहीं देता है बल्कि धरती के मौसम के निर्धारण में भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। महासागरीय जल की लवणता और विशिष्ट उष्मधारिता पृथ्वी के मौसम को प्रभावित करता है, जिससे धरती का तापमान जीवनयोग्य बना रहता है।

बचपन में हमें पढाया गया है कि सूर्य की गर्मी से समुद्र का पानी भाप बनकर उड़ जाता है और यही मानसून आने का कारण बनता है, क्योंकि समुद्री जल के खारेपन और पृथ्वी की जलवायु में बदलाव की घटना आपस में जुड़ी हुई हैं।

वैज्ञानिकों का तर्क है कि समुद्री जल का खारा होना वास्तव में समुद्री धाराओं के बहाव का एक मुख्य कारण है। यदि सारे समुद्रों का जल मीठा होता तो लवणता का क्रम कभी नहीं बनता और जल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने वाली धाराएँ कभी सक्रिय न होतीं। परिणामस्वरूप ठंडे प्रदेश बहुत ठंडे रहते और गर्म प्रदेश अत्याधिक गर्म होता। तब शायद पृथ्वी पर जीवन के इतने रंग नहीं होते।

इतना ही नहीं महासागर प्राकृतिक संसाधनों का भंडार घर भी है। यहां विभिन्न प्रकार के खनिज पदार्थों की असीमित मात्रा उपलब्ध है। याद कीजिये बचपन में हम दादी और नानी से समुद्र मंथन की कहानियां सुना करते थे।

इन पौराणिक कथाओं के अनुसार सुरों और असुरों को समद्र मंथन से बहुत सारे हीरे, मोती, जवाहरात और अमृत प्राप्त हुआ था। इस कथा को यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो यह साबित होता है कि आदिकाल से मानव जाति सागर के संसाधनों का भिन्न भिन्न प्रकार से उपयोग किया करती थी। वर्तमान समय में प्राकृतिक गैस, कच्चा तेल, धातु और कई प्रकार के रसायन इन्हीं सागरों से प्राप्त किये जा रहे हैं।

अक्सर आपने लोगों को अंगूठी में लाल मणि पहने देखा होगा, जिसे ‘मूँगा’ कहते हैं। ज्योतिषी गृह शांति के लिए इसे लोगों को पहनने की सलाह देते हैं। ये बेशकीमती मूँगा कोरल नामक समुद्री जीव से ही प्राप्त होता है। इतना ही नहीं महासागरों में पाए जाने वाले अनगिनत ऐसे खनिज पदार्थ हैं, जिनका रहस्य जानने के लिए वैज्ञानिक आज भी प्रयासरत हैं।

इंसानी सभ्यता का जीवनदायनी होने के बावजूद मानव अपनी पूर्ति के लिए महासागरों का न केवल दोहन कर रहा है बल्कि उसे गंदा और ज़हरीला भी बना रहा है। एक आंकलन के मुताबिक हमने समुद्रों को अमेरिका जितने बराबर हिस्सों में कचरे से भर दिया है।

शायद ही कोई ऐसा साल गुज़रता होगा जब विश्व के किसी हिस्से से समुद्र में तेल फैलने की घटना नहीं होती होगी। इससे न केवल समुद्री जीव-जंतुओं पर प्रभाव पड़ता है बल्कि इंसानों को भी किसी न किसी रूप में इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ता है। 90 के दशक में खाड़ी युद्ध को कौन भूल सकता है। जहां तेल के खेल के लिए इंसानी सभ्यता को दांव पर लगा दिया था।

एक अंतराष्ट्रीय गैरसरकारी संस्था द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार खाड़ी युद्ध में अमेरिका द्वारा ईराक के तेल कुओं पर की गई बमबारी से करीब एक लाख दस हज़ार बैरल कच्चा तेल फ़ारस की खाड़ी में फ़ैल गया था। इससे समुद्र की उपरी सतह पूरी तरह से तैलीय हो गई थी। जिसके प्रभाव से समुद्र पर निर्भर रहने वाले अधिकांश पक्षी मारे गए और उनमें कई पक्षियों की किस्में विलुप्त हो गईं।

पर्यावरणविदों का मत है कि खाड़ी युद्ध ने पर्यावरण संतुलन को विनाश की ओर धकेला है। इस युद्ध से मानव और पर्यावरण को जो हानि हुई है, वह हिरोशिमा, भोपाल और चेरनोबिल से मिलकर हुई बर्बादी के बराबर था।

बहरहाल महासागरों के संरक्षण के प्रति विश्व भर में बढ़ रही जागरूकता उम्मीद की एक किरण दिखाती है। भारत में भी इस ओर विशेष पहल और जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। हाल ही में भारत ने अपने समुद्री क्षेत्रों में तेल का कचरा फ़ैलाने वाले व्यापारिक जहाजों पर गहरी चिंता जताई है। राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार केरल के तटीय क्षेत्रों में प्रदूषण के कारण झींगा, चिंगट तथा अन्य मछलियों का 25 प्रतिशत उत्पादन घट गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रदूषण फैलाने वाले जल कृषि (एक्वाकल्चर) फर्म्स को तटीय राज्यों में बंद करने को कहा है, क्योंकि ये पर्यावरण को नुकसान के साथ साथ मिट्टी को भी कमज़ोर बनाते हैं। इसके साथ ही न्यायलय ने पारिस्थिकीय संतुलन को खतरे में डालने वाले उद्योगों और नगरीकरण जैसे कार्यों को तटीय क्षेत्रों से 500 मीटर दूर रखने का भी आदेश दिया है।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि हम समुद्र पर निर्भर हैं, तो उसका संरक्षण भी हमारी ज़िम्मेदारी बनती है। अंग्रेजी फिल्म 2012 याद है! जिसमे पर्यावरण असंतुलन के कारण समुद्र अपना रौद्र रूप दिखाता है और सृष्टि के सर्वनाश का कारण बन जाता है।

यदि समय रहते हम नहीं जागे और समुद्र की चिंता नहीं की, तो इस फिल्म को हकीकत बनते देर नहीं लगेगी। समुद्र आज भी चेतवानी दे रहा है। 26 दिसंबर 2004 को सुनामी के रूप में एक बार अपना गुस्सा भी ज़ाहिर कर चुका है।