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प्रमुख सचिव गृह ने दिया डीएम—एसपी को आदेश 10 जनवरी तक ऐसे धार्मिक और सार्वजनिक स्थानों को चिन्हित करें जहां बिना अनुमति के बजाए जाते हैं लाउडस्पीकर…

लखनऊ। बढ़ते ध्वनि प्रदूषण को मद्देनजर रखते हुए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अब एक सख्त निर्णय लिया है। उम्मीद की जा रही है कि इस निर्णय के बाद ध्वनि प्रदूषण जोकि ज्यादातर धर्म की आड़ में फैलाया जाता है, में कमी आएगी।

योगी सरकार ने कहा है कि अब अगर किसी ने भी बिना परमिशन के धर्मस्थलों, सार्वजनिक स्थानों, जुलूसों या जलसों में लाउडस्पीकर बजाया तो संबंधित व्यक्ति या संस्था को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। गौरतलब है कि बढ़ते ध्वनि प्रदूषण के मद्देनजर हाईकोर्ट ने पहले भी चेताया था और सरकार से कहा था कि वह इस पर उचित कार्रवाई करे।

हाई कोर्ट के इस मामले में कड़े रुख के बाद अब उत्तर प्रदेश के गृह विभाग ने प्रदेश के सभी जिलों के अफसरों को आदेश दिया है कि बिना परमिशन बजाए जा रहे लाउडस्पीकरों को किसी भी हाल में 20 जनवरी तक उतरवा दिया जाए। बावजूद इसके भी अगर कोई धार्मिक स्थल, सार्वजनिक स्थान या किसी कार्यक्रम स्थल पर बिना इजाजत के लाउडस्पीकर बजाकर इस आदेश का उल्लंघन करेगा तो उसे पांच साल की जेल या फिर एक लाख रुपये जुर्माना अथवा दोनों की सजा भुगतनी पड़ सकती है।

गृह विभाग ने इस मसले पर छूट देने वाले अफसरों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई करने का निर्णय लिया है। प्रमुख सचिव गृह को इस मामले में एक फरवरी को हाईकोर्ट के सामने अपनी रिपोर्ट पेश करनी है।

इसके बाद से हरकत में आए प्रमुख सचिव गृह अरविंद कुमार ने सभी जिलों के जिलाधिकारियों और और एसपी को निर्देश दे दिए हैं कि वे राजस्व और पुलिस की एक टीम बनाकर 10 जनवरी तक ऐसे धार्मिक और सार्वजनिक स्थानों को चिन्हित कर लें जहां बिना अनुमति के लाउडस्पीकर बजाए जा रहे हैं।

प्रमुख सचिव गृह ने अपने निर्देश में कहा है कि सभी धार्मिक—सार्वजनिक स्थलों को 15 जनवरी तक का समय देकर कोर्ट के तय मानकों के अनुसार परमिशन लेने का नोटिस थमाया जाए। सरकार का कहना है कि बावजूद इसके ऐसे धार्मिक स्थल और सार्वजनिक स्थलों द्वारा अगर नियमों का पालन नहीं किया गया तो उनके खिलाफ ध्वनि प्रदूषण नियम-2000 के तहत कार्रवाई की जाएगी।

गौरतलब है कि कोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण के मद्देनजर यह भी कहा है कि जिन्हें लाउडस्पीकर या आवाज वाले अन्य यंत्र लगाने की अनुमति दी भी जाए, वहां ध्वनि प्रदूषण नियम-2000 के अंतर्गत क्षेत्र और समय के मुताबिक निर्धारित ध्वनि सीमा का पालन जरूर करवाना चाहिए। शादी समारोहों, जुलूस और जलसों के दौरान भी इस नियम का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया गया है।

ध्वनि प्रदूषण पर्यावरण (संरक्षण) 1986 अधिनियम की धारा 15 के तहत एक दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। इसका उल्लंघन करने पर पांच साल का कारावास या एक लाख का जुर्माना या फिर दोनों की सजा का प्रावधान है। साथ ही हर दिन इस नियम का उल्लंघन करने पर पांच हजार रुपये प्रतिदिन की सजा दिए जाने का भी नियम है।

गौरतलब है कि मोती लाल यादव की तरफ से सार्वजनिक स्थलों में होने वाले शोर—शराबे को लेकर एक जनहित याचिका दाखिल की गई थी, जिसके तहत हाईकोर्ट ने 20 दिसंबर, 2017 को जारी अपने आदेश में सरकार से जवाब मांगा था कि ध्वनि प्रदूषण नियम-2000 का सख्ती से पालन कराने के लिए सरकार ने क्या किया है?

इसी याचिका के आधार पर हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार ने पूछा था कि क्या प्रदेशभर में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा व अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बज रहे लाउडस्पीकरों के लिए संबंधित अथॉरिटी से अनुमति ली गई है। अगर नहीं तो ऐसे लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है। ऐसे कितन लाउडस्पीकर हटवाए गए हैं?

बिना परमिशन लाउडस्पीकर बजाने के मामले में कितने अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है? इस बात का जवाब भी कोर्ट ने मांगा था। साथ ही ध्वनि प्रदूषण नियम-2000 का सही से पालने कराने और न करने पर कार्रवाई के लिए क्या कोई सिस्टम या वेबसाइट बनाई गई है? इस बारे में भी सरकार से जवाब देने को कहा था। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद ही सरकार ने यह एक्शन लिया है। माना जा रहा है कि इससे धार्मिक और सार्वजनिक स्थलों पर होने वाले भारी शोरगुल पर लगाम लगेगी।