Last Update On : 25 07 2018 10:24:40 PM
पीड़ित मनोज कुमार जिनको पुलिस ले जाकर पकौड़ा बेचने के जुर्म थाने ले गयी और ये हाल कर दिया फोटो — जनज्वार

पहले दिन ही ग्राहकों का बहुत बढ़िया रिस्पांस मिला। करीब 3000-4000 रुपये की आमदनी हुई, जिसमें लागत निकालने के बाद 1000-1200 रुपये का मुनाफा हुआ। पहले दिन की कमाई और काम के अनुभव और तस्वीरें भी शेयर करी…

इलाहाबाद से सुशील मानव की रिपोर्ट

एक आदमी है मनोज रजक, उम्र करीब 32 साल। मनोज शादीशुदा है और घर-परिवार वाला आदमी है। मनोज शहरों में छोटे-बड़े रेस्टोरेंट में काम करता रहा है। इससे पहले वो शादी-ब्याह की पार्टियों में कैटरिंग का काम करता था। एक ही क्षेत्र में लगातार कई साल काम करते रहने से मनोज इस क्षेत्र में अनुभवी और दक्ष हो गया।

लेकिन पिछले 7-8 महीने से कोई काम न मिलने के चलते बेरोजगारी की मार से पस्त होकर वो घर पर ही बैठा था। इस बीच भारत की राजनीति में रोज़गार का पकौड़ा विमर्श चल रहा था, और देश के ओजस्वी प्रधानमंत्री जी देश के युवा बेरोजगारों को ठेला लगाने के लिए प्रेरित कर रहे थे। मनोज के मन में भी अपना काम शुरू करने का विचार आया।

उसने धीरे-धीरे रुपए इकट्ठे करने शुरू किए। कुछ दोस्तों से उधार लिया, कुछ रिश्तेदारों से। इस तरह कुल करीब 40 हजार रुपए मनोज ने जुटाया। चूँकि रुपए के साथ साथ एक सहायक की भी ज़रूरत थी मनोज को तो उसने अपने एक मित्र अरविंद से बात की। अरविंद भी बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं।

अरविंद के परिवार में छः बहनें और एक बूढ़ी माँ है पिता तो खैर वर्षों पहले ही गुजर गए थे तो वो अपने परिवार का अकेले कमानेवाला है। चूँकि अरविंद और मनोज समाजिक और आर्थिक स्तर पर एक दूसरे से काफी मिलते जुलते थे तो बातचीत के बाद मनोज ने अपने खस्ताहाल मित्र अरविंद को अपने काम का तीस प्रतिशत हिस्सेदार बना लिया। जबकि मनोज ने कर्जा-ऋण काढ़ के चालीस हजार रुपए इकट्ठा कर लिए थे तो वो 70 प्रतिशत का हिस्सेदार खुद हो गया।

उसके बाद दोनो ने मिलकर नगरपालिका इलाहाबाद और इलाहाबाद ठेला समिति से ठेला लगाने का अपना लाइसेंस इशू करवा लिया। बाकी के ज़रूरी जैसे कि स्वच्छता अभियान वगैरह के लिए भी आवेदन कर दिया। सारी तैयारी हो जाने के बाद दोनो के दोस्तों-यारों ने मिलकर जल्द से जल्द अपना काम शुरु करने के लिए प्रोत्साहित किया तो 18 जुलाई 2018 दिन गुरुवार को मनोज और अरविंद ने मिलकर अपना काम का शुभारंभ कर दिया।

उन्होंने सिविल लाइंस के बिग बाजार के पास जहाँ शराब की दुकान है उससे करीब 300 फिट की दूरी पर अपना ठेला लगाया और चिकेन पकौड़ा, लॉलीपॉप आदि ठेले पर बनाकर बेचने लगे। पहले दिन ही ग्राहकों का बहुत बढ़िया रिस्पांस मिला। करीब 3000-4000 रुपये की आमदनी हुई, जिसमें लागत निकालने के बाद 1000-1200 रुपये का मुनाफा हुआ। दोनों ने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को फोन कर-करके अपनी पहले दिन की कमाई और काम के अनुभव और तस्वीरें भी शेयर करी।

मनोज और अरविंद को भलीभाँति पता था कि गंदगी रहित और साफ-सुथरे जगह पर ही ग्राहक आना और खाना पसंद करते हैं अतः दोनों ने ठेला लगाने से पहले और ठेला लगाने के बाद उक्त जगह की अच्छी तरह साफ सफाई करने का कायदा बना लिया। दूसरे मन में ये बात भी थी कि साफ-सफाई के मामले में ठेला समिति या नगर प्रशासन को शिकायत का कोई भी मौका नहीं देना चाहिए।

इसी तरह उन्होंने उसी जगह 19 जुलाई को भी ठेला लगाया और फिर 20 जुलाई को भी। उन्हें लगातार ग्राहकों का बढ़िया रिस्पांस मिल रहा था कि तभी 21 जुलाई दिन शनिवार को एक हवलदार चौहान ने एक रेस्टोरेंट वाले से जिसके यहाँ वो रोज उठते-बैठते हैं के माध्यम से मनोज को बुलवाया। साथी अरविंद को ठेला देखने को बोलकर मनोज उस बुलाने आए आदमी के साथ हवलदार चौहान से मिलने चला गया।

मनोज से सामना होते ही हवलदार चौहान ने गरजकर बोला कि, ‘ये जो ठेला तू लगा रहा है आज से यहाँ नहीं लगेगा।’ हवलदार की घुड़की सुनकर मनोज एकदम सदमे में आ गया। फिर भी हिम्मत बटोरकर उसने पूछा, ‘साहेब कोई गलती हो गई क्या हम लोगो से? हम लोग अभी नये हैं और अपना काम शुरू किये आज चौथा दिन ही है, मुनासिब है जाने-अनजाने में हमने कोई चूक हो गई हो तो बता दीजिए सर हम अपनी गलती सुधार लेंगे। या और कोई कारण हो तो बताइए कि आखिर क्यों ठेला यहाँ न लगाएँ।’

मनोज की बातों को सुनकर हवलदार चौहान अपनी जाति पर उतर आय़ा और बहुत ही रूड होकर बोला, ‘क्या नाम क्या है तेरा? मनोज ने बताया कि सर मेरा नाम मनोज रज़क है। रज़क कौन सी जाति होती है बे? मनोज ने विनम्रता से कहा सर धोबी समुदाय के लोग होते हैं रज़क। फिर अगला सवाल हवलदार ने पूछा किस मोहल्ले का है। मनोज ने बताया सर कीडगंज से। अबे कीडगंज इतनी दूर है और तू ठेला वहाँ से लाकर यहाँ लगा रहा है।

कीडगंज का होकर तू ठेला यहाँ क्यों लगा रहा है अब से तू ठेला यहाँ नहीं लगाएगा। यहाँ तो क्या यहाँ से मेडिकल चौराहा  के रेडियस में कहीं भी नहीं लगाएगा। इसके बाहर जहाँ लगाना हो तू लगा पर कल से तू सिविल लाइंस में नज़र नहीं नहीं आना चाहिए। इसके बाद माँ बहन की गाली देते हुए हवलदार चौहान ने मनोज से कहा कि चिकेन-विकेन के ठेले यहाँ सिविल लाइंस में नहीं लगेंगे। जबकि सिविल लाइन के बिल्कुल उसी जगह जहाँ मनोज ने ठेला लगाया था आस पास चिकेन और दूसरे नॉनवेज खाद्य पदार्थों के ठेले लग रहे थे।

फिर हवलदार चौहान ने धमकाते हुए कहा कि तुम सालों से तो मैं नहीं मेरा डंडा बात करता है। बहुत मारता हूँ बेट्टा इसलिए एक बार में समझा रहाँ हूँ कि तू अपने ठेले समेत यहाँ से गायब हो जा। मनोज की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। मरता क्या न करता। हाथ-पाँव जोड़कर हवलदार के सामने रोने गिड़गिड़ाने लगा साहेब कल इतवार है, छुट्टी का दिन। यही सोचकर पहले से ही हजारों का कच्चा माल खरीद लिया है साहेब। अगर कल यहाँ ठेला नहीं लगाने देंगे आप तो मैं बर्बाद हो जाऊँगा साहेब। हमारी मदद कीजिए साहेब। कोई कानूनी दिक्कत-परेशानी हो तो बताइए सर।

पर हवलदार चौहान नहीं माना और रेस्टोरेंट जैसे पब्लिक प्लेस पर ही वो मनोज की माँ बहिन का शाब्दिक बलात्कार करता (गरियाता) रहा। मरता क्या न करता दुआ सलाम करके मनोज वापिस लौट आया। रात में मनोज ने अपने उस मित्र के पास फोन किया जिसने उसे सिविल लाइंस में ठेला लगाने का आश्वासन दिया था।

मनोज के उस दोस्त ने अपने दूसरे दोस्त के जरिए तीसरे व्यक्ति से पुलिस थाने में सोर्स लगवाई कि मनोज रजक को सिविल लाइंस क्षेत्र में ठेला लगाने दिया जाए। दूसरी ओर मनोज को एक और पुलिसवाले का ख्याल आ गया। जब मनोज इलाहबाद के ही एक रेस्टोरेंट में काम करता था वहाँ उस रेस्टोरेंट में सिविल लाइंस के कई पुलिस वाले खाने-पीने के लिए आते जाते थे। उन्हीं में से एक से मनोज की जान-पहचान हो गई थी तो उसका मोबाइल नंबर ले लिया था।

मनोज ने अपने जान-पहचान के उस पुलिसवाले को फोन करके सारा हाल कह सुनाया और साथ ही ठेला लगाने देने के लिए सिविल लाइंस थाने से परमीशन दिलाने की चिरौरी करके हुए बताया कि सिविल लाइंस थाने के हवलदार चौहान और चौकी प्रभारी प्रवीन सिंह मिलकर हमें डरा-धमकाकर वहाँ से भगाना चाहते और कोई ठोस कारण भी नहीं बता रहे हैं कि मैं वहाँ अपना ठेला क्यों नहीं लगाऊँ।

मनोज की बात सुनने के बाद उक्त पुलिसवाले ने कहा कि तुम डरो मत मनोज और अपना ठेला निश्चिंत होकर वहीं लगाओ मैं चौकी प्रभारी प्रवीन सिंह और हवलदार चौहान से बोल दूँगा कि वो तुम्हें परेशान नहीं करें। उक्त जान-पहचान के पुलिसवाले से बातें करके उसका आश्वासन पाकर मनोज की भीतर थोड़ा सा आत्मविश्वास लौटा।

फिर भी पुलिसवाले तो ठहरे पुलिसवाले थोड़ा डर तो था ही मनोज के मन में पर चूँकि कच्चा माल पहले ही खरीद चुका था तो अगले दिन यानि कि रविवार 22 जुलाई को अपने नियत समय पर ठेला लेकर सिविललाइंस में अपना ठेला लगा दिया। सुबह से शाम हो गई। दिन भर तो खैर कोई नहीं आया पूछने। शाम के करीब 7-8 बजे पेट्रोलिंग वैन में भरकर पुलिस वाले आये जिसमें चौकी प्रभारी पवन सिंह और हवलदार चौहान भी थे और बिना किसी बात-चीत के सीधे गाली गलौज देते हुए उसके ठेले पर का सामान निकाल निकालकर इधर उधर फेंकने लगे।

बचा-खुचा सामान दूसरा हिस्सेदार साथी अरविंद जल्दी जल्दी समेटने लगा। उसे छोड़कर पुलिसवाले मनोज को पेट्रोल वैन में बैठा लिए। वैन में बैठते ही मनोज ने जेब से अपना मोबाइल निकाला उक्त दोस्त को फोन लगाने के लिए जिससे उसने थाने में सोर्स लगवाया था। तभी हाथ से मारकर हवलदार चौहान ने उसका मोबाइल वैन में गिरा दे दनादन कई थप्पड़ मनोज के गाल पर रशीद कर दिए और गरियाते हुए बोला साले सोर्स लगाता है, सोर्स लागने पर मैं और बेतरह मारता हूँ, चल थाने में फिर मैं देखता हूँ तेरे पास कितनी पावर है जो तू सोर्स लगा रहा। 4-5 मिनट में वो उक्त चौकी पर पहुँच गए।

हवलदार चौहान ने चौराहे के पुलिस केबिन में ले जाकर वहाँ रखी लाल कुर्सी को पैर से मारकर गिरा दिया और अंदर से केबिन बंद करके फाइबर स्टिक से बहुत मारा। लगभग घंटे भर मारने पीटने के साथ में गाली भी देता रहा और सवाल भी करता रहा कि तुझे किसने परमीशन दिया बे सिविल लाइंस में ठेला लगाने के लिए। मनोज ने बताया कि सर परमीशन तो किसी ने नहीं दिया पर बहुत से ठेले लगे हैं तो मैंने भी लगा लिया। साले धोबी होकर सवाल जवाब करता है बोलकर और मारा और धमकाकर छोड़ दिया कि सिविल लाइंस में नज़र आया तो खैर नहीं।

मनोज रजक का ठेला

मनोज के भाई राजकुमार रज़क ने सुना तो बहुत विचलित हुए। पर चूँकि वो इलाहाबाद शहर से दूर राजस्थान जैसे सुदूर के राज्य में रहते हैं तो वहीं से भाई की कुछ मदद करने की सोची। उन्होंने गूगल पर जाकर सिविल लाइंस पुलिस का नंबर निकालकर कई बार फोन लगाया लेकिन उनका कॉल किसी ने रिसीव नहीं किया फिर वहीं गूगल से ही वो यूपी पुलिस की वेबसाइट खोलकर उसमें से सिविल लाइंस के पोर्टल पर जाकर एसपी डीएसपी के ईमेल पर एक पत्र पोस्ट कर दिया तक अपनी पीड़ा पुलिस के उच्च अधिकारियों तक पहुँचा सकें।

साथ ही पत्र में अपना मोबाइल नंबर भी दर्ज कर दिया कि पुलिसवाले चाहें तो उनसे संपर्क कर सकें पर उनके खत का कोई रिप्लाई नहीं आया। असहाय और अँधेरा महसूस कर रहे थे कि क्या हो रहा है। बता दें कि राजकुमार रजक जी थिएटर से जुड़े हुए हैं और शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हैं।

ऐसे में तफसील से इस रिपोर्ट को लिखे जाने का मतलब ये है कि एक तरफ मोदी सरकार बेरोजगार युवाओ को पकौड़ा बेंचने की सलाह देती है और दूसरी ओर उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री की पुलिस बेरोजगारों को ठेला नहीं लगाने देती। क्या ठेले आसमान में लगते हैं मोदी जी। उन्हें भीड़-भाड़ वाले इलाके में और जमीन पर सड़क के किनारे ही लगाया जाता है।