ला-इलाज बता दिए गए रोगों के उपचार में भी मददगार साबित हो रही है होमियोपैथी, मेडिसिन माफिया के 'कुचक्र' में फंसी दुनिया को है इसकी सख्त जरूरत !
एलोपैथिक दवा लॉबी की यही तो परेशानी है कि होमियोपैथी के प्रचलन में आ जाने के बाद उनके धंधे पर बहुत असर पड़ेगा। दुनिया में जनस्वास्थ्य की चुनौतियां बढ़ रही हैं और उपचार के लिए ऐलोपैथिक दवाओं की सीमाएं भी सामने दिख रही है। ख़ासकर एंटीबायोटिक्स दवाओं के रेजिस्टेंस के मामले बहुत बढ़ रहे हैं....
विश्व होमियोपैथिक दिवस 10 अप्रैल पर जनस्वास्थ्य चिकित्सक डॉ. एके अरुण की खास टिप्पणी
आज विश्व होमियोपैथिक दिवस है। इस वर्ष होमियोपैथी के आविष्कार के 230 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस लंबे अवधि में अनेक आशंकाओं, कुतर्कों एवं चुनौतियों के बावजूद होमियोपैथी दुनिया के साथ भारत में भी चिकित्सा की दूसरी प्रमुख चिकित्सा पद्धति के रूप में स्थापित और विकसित हुई है। अनेक असाध्य एवं जटिल बता दिए गए रोगों से ग्रसित रोगियों को भी इससे काफ़ी राहत मिली है। फिर भी वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में ही सही होमियोपैथी को सरकार और समाज ने वह सम्मान अब तक नहीं दिया है, जिसका यह हकदार है। मेरा मानना है कि इसके साथ होमियोपैथी के चिकित्सकों को भी अभी और बहुत मेहनत करने की जरूरत है।
कहते हैं कि विज्ञान और तकनीक में आपसी प्रतिस्पर्धा की हद बेहद गंदी और ख़तरनाक होती है। कई आधुनिक रोगों में एलोपैथी की सीमाओं के बावजूद यह पद्धति अपने सामने किसी दूसरी चिकित्सा पद्धति को विकसित होते नहीं देख सकती। एलोपैथी की इसी हीन भावना का शिकार होमियोपैथी के सामने अनेक ला-इलाज और जटिल रोगों को ठीक करने की चुनौतियां भी हैं। सन् 2007 में अमेरिका में हुए राष्ट्रीय स्वास्थ्य इंटरव्यू सर्वे में पाया गया कि लोग होमियोपैथिक चिकित्सा पद्धति को एक सुरक्षित चिकित्सा विकल्प के रूप में तेज़ी से अपना रहे हैं। उस वर्ष अमेरिका में लगभग 39 लाख व्यस्क और 9 लाख बच्चों ने होमियोपैथिक चिकित्सा ली। आज पूरी दुनिया में सौ करोड़ से ज़्यादा लोग होमियोपैथिक चिकित्सा का लाभ उठा रहे हैं।
होमियोपैथी एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है जो सूक्ष्म रूप से व्यक्ति के शरीर की रोग उपचारक क्षमता को प्रेरित कर और बढ़ाकर शरीर को रोग मुक्त करती है। यह शरीर के सभी क्रियाओं को नियंत्रित करती है।होमियोपैथी में किसी बाहरी तत्व (जीवाणु या विषाणु) के कारण होने वाले शारीरिक परिवर्तन को बीमारी न मानकर उसे बीमारी के कारण पैदा हुई अवस्था माना जाता है। होमियोपैथी में इलाज रोग के नाम पर नहीं बल्कि रोगी की प्रकृति, उसके सामान्य और मानसिक लक्षणों के आधार पर किया जाता है।
नवीनतम शोध और अध्ययन अब यह प्रमाणित कर चुके हैं कि होमियोपैथी लगभग हर ला-इलाज बता दिए गए रोगों के उपचार में भी मददगार साबित हो रही है। इसलिए आपसे अपील है कि अपने स्वास्थ्य की रक्षा और धन की बचत के लिए होमियोपैथी को अपनाएं और स्वास्थ्य लाभ लें।
उन्हें क्यों कड़वी लगती है होमियोपैथी की मीठी गोलियां ?
होमियोपैथी के बेहतर प्रभाव क्षमता और इसके इलाज के बेहद सस्ता होने की वजह से एलोपैथिक दवाओं की बहुराष्ट्रीय कंपनियां और लॉबी होमियोपैथी को पसंद नहीं करती। होमियोपैथी के वजूद से लेकर प्रभाव क्षमता पर ग़ैर ज़रूरी सवाल उठाकर एलोपैथिक दवाओं की लॉबी यह भ्रम पैदा करती रहती है कि यह दवा नहीं बल्कि प्लेसिबो है। सवाल यह है कि दवा क्या केवल भयंकर साइड इफ़ेक्ट वाले जहरीले तत्व ही हो सकते है? दवा तो सूक्ष्म शक्तीकृत पदार्थ भी होते हैं। दवा की सूक्ष्म मात्रा का अनुभव अब धीरे धीरे दुनिया के लोगों को होने लगा है। अब तो हज़ारों जटिल रोगों में होमियोपैथी की प्रभावशीलता पर एलोपैथी के चिकित्सक अध्ययन और शोध कर रहे हैं।
होमियोपैथिक दवा की सूक्ष्मतम मात्रा जिसे अंग्रेजी में मॉलीकुल कहते हैं, उस पर भी अनेक शोध हो चुके हैं और हो रहे हैं। स्नातकोत्तर चिकित्सा संस्थान चंडीगढ़ के बायो फिजिक्स एवं न्यूक्लियर मेडिसिन के विभागाध्यक्ष तथा प्रोफेसर डॉ. आरआर शर्मा ने तो किताब लिखकर होमियोपैथी के मॉलिक्यूलर शक्तियों को दुनिया के सामने रख दिया। उनकी किताब “मॉलिक्यूलर होमियोपैथी” आज भी एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक दस्तावेज़ है।
ऑटोइम्यून बीमारियों के बढ़ने और मधुमेह तथा उच्च रक्तचाप जैसे सामान्य रोगों के ला इलाज होने के बाद अब आम लोगों को भी समझ में आने लगा है कि उम्रभर दवा खाने और उसके साइड इफ़ेक्ट झेलने के बजाय बेहतर है कि होमियोपैथी को अपनाया जाए। जहाँ सामान्य मामलों में भी नुक़सान वाली दवा को लंबे समय तक लेने की ज़रूरत है वहाँ लोग तेज़ी से होमियोपैथिक उपचार को अपना रहे हैं। लोगों के अनुभव भी अब सामने आ रहे हैं कि होमियोपैथी तो गंभीर रोगों को भी जड़ से समाप्त कर रही है। एलोपैथिक दवा लॉबी की यही तो परेशानी है कि होमियोपैथी के प्रचलन में आ जाने के बाद उनके धंधे पर बहुत असर पड़ेगा। दुनिया में जनस्वास्थ्य की चुनौतियां बढ़ रही हैं और उपचार के लिए ऐलोपैथिक दवाओं की सीमाएं भी सामने दिख रही है। ख़ासकर एंटीबायोटिक्स दवाओं के रेजिस्टेंस के मामले बहुत बढ़ रहे हैं।
डॉक्टर अब यह कहने लगे हैं कि एंटीबायोटिक्स दवाओं का दुरुपयोग रोका जाना चाहिए। एलोपैथिक दवाओं के प्रभावहीन होने की चुनौतियों के बावजूद होमियोपैथी की गंदी आलोचना करना जन भावनाओं के ख़िलाफ़ है। बिना किसी नुक़सान के यदि होमियोपैथी करोड़ों लोगों को लाभ पहुँचा रही है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। यह समय है जब हम आपसी सहयोग से मानवता के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए साथ मिलकर खड़े हों न कि होमियोपैथी से ईर्ष्या करें। आइए इस चिकित्सा पद्धति को अपनाइए, यक़ीन मानिए मानवता का बहुत भला होगा।