लाॅकडाउन में भूख से तड़पते मजदूरों की मदद न करने वाले कोविंद ने राममंदिर का चंदा दे राष्ट्रपति पद की गरिमा को लगाया दाग

राम मंदिर निर्माण के लिए तत्परता से चंदा देकर रामनाथ कोविंद ने पूरी दुनिया के सामने यह जता दिया है कि राष्ट्रपति के पद पर बैठा हुआ व्यक्ति संविधान की कोई इज्जत नहीं करता हैए बल्कि उसे उग्र हिन्दुत्व के आज्ञापालक कारसेवक की भूमिका निभाने के लिए ही मोदी सरकार ने इस उच्च पद पर बिठाया है...

Update: 2021-01-16 06:07 GMT

वरिष्ठ पत्रकार दिनकर कुमार का विश्लेषण

जनज्वार। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और इसके सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से मर्यादापूर्ण आचरण की उम्मीद रखी जाती है। मोदी राज में मानो संघ परिवार और भाजपा ने सौगंध खा रखी है कि वे तमाम संवैधानिक पदों की गरिमा को धूल में मिलाकर ही छोड़ेंगे और फर्जी राष्ट्रवाद पर आधारित एक ऐसे हिन्दू राष्ट्र का ताना बाना रचेंगे जो नफरत, विद्वेष और अमानवीयता पर आधारित बर्बर समाज होगा।

भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कोरोना विपदा के समय सड़कों पर भूख से तड़पते मजदूरों की सहायता के लिए फूटी कौड़ी नहीं दी, लेकिन राम मंदिर निर्माण के लिए तत्परता से चंदा देकर उन्होंने पूरी दुनिया के सामने यह जाता दिया है कि राष्ट्रपति के पद पर बैठा हुआ व्यक्ति संविधान की कोई इज्जत नहीं करता है, बल्कि उसे उग्र हिन्दुत्व के आज्ञापालक कारसेवक की भूमिका निभाने के लिए ही मोदी सरकार ने इस उच्च पद पर बिठाया है। यह उचित ही है कि सोशल मीडिया पर लोग राष्ट्रपति की इस हरकत की भर्त्सना कर रहे हैं।

समाचार एजेंसी एएनआई ने बताया कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने शुक्रवार को 5,001,00 रुपये की राशि दान करके अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की दिशा में पहला योगदान दिया। राष्ट्रपति ने मंदिर के निर्माण और प्रबंधन को देखने के लिए सरकार द्वारा स्थापित राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट में दान दिया।

विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार, राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि और अन्य प्रतिनिधिमंडल मंदिर के निर्माण के लिए राष्ट्रपति से दान मांगने आए थे। 'वह देश के पहले नागरिक हैं इसलिए हम इस अभियान को शुरू करने के लिए उनके पास गए।' विहिप के आलोक कुमार ने कहा।


विहिप और उससे जुड़े संगठनों ने 15 जनवरी से 5 फरवरी तक श्री राम जन्मभूमि मंदिर निधि अभियान अभियान चलाया हैए जहां वे राम मंदिर के लिए धन इकट्ठा करने के लिए विभिन्न राज्यों में हिंदू परिवारों तक पहुंचेंगे। नृपेंद्र मिश्रा, प्रधान मंत्री के पूर्व प्रधान सचिव और बीएसएफ के पूर्व डीजी केके शर्मा मंदिर निर्माण के विभिन्न पहलुओं को देखने के लिए ट्रस्ट द्वारा गठित समितियों में शामिल हैं।

ट्रस्ट का अनुमान है कि अयोध्या में मंदिर परिसर के निर्माण की कुल लागत लगभग 1,100 करोड़ रुपये होगी, जिसमें लगभग 300-400 करोड़ रुपये मंदिर पर ही खर्च किए जाएंगे।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी राम मंदिर निर्माण में योगदान के रूप में विहिप को 1 लाख रुपये का चेक सौंपा। बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी ने भी पटना में फंड ड्राइव का नेतृत्व किया।

संघ परिवार मंदिर के लिए चंदा जुटाने के बहाने मुस्लिमों पर हमले की नीति पर काम कर रहा है। बाबरी मस्जिद को गिराने से लेकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को राज्य सभा की सीट के बदले मंदिर निर्माण के पक्ष में फैसला करवाने तक संघ परिवार संविधान और लोकतंत्र को ठेंगा दिखाते हुए नफरत के एजेंडे पर ही काम करता रहा है।

मध्य प्रदेश के मालवा इलाके में पिछले दिनों अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए निकाली गई रैलियों में उज्जैन, इंदौर और मंदसौर में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। कई जगह मस्जिदों पर भगवा झंडे लहराए गए तो कार्रवाई के नाम पर पुलिस ने कई घर गिरा दिए। चंदा वसूली के इस हिंसक खेल में भाग लेते हुए कोविंद ने उस शपथ को भी याद नहीं रखा जो उन्होंने राष्ट्रपति पद को संभालते हुए ली होगी और एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की मूल भावना की रक्षा करने की शपथ खाई होगी।

प्रसिद्ध पत्रकार प्रियदर्शन ने अपने ब्लॉग पर कोविंद के आचरण की निंदा करते हुए लिखा है, 'बरसों पहले भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने बनारस में 500 ब्राह्मणों के पांव धोए थे। तब जाने-माने समाजवादी चिंतक और नेता डॉ राम मनोहर लोहिया ने, जिनका नाम गाहे.बगाहे प्रधानमंत्री भी ले लिया करते हैं, इसकी तीखी निंदा की थी। कहा था कि यह एक अश्लील दृश्य है कि देश का राष्ट्रपति किसी के पांव बस इसलिए धोए कि वह ब्राह्मण हैं। यह जातिवाद को मज़बूत करना है, देश को उदासी में धकेलना है।


प्रियदर्शन लिखते हैं, 'रामनाथ कोविंद ने भी राष्ट्रपति रहते जो कुछ किया है, वह भी एक तरह से संप्रदायवाद को मज़बूत करने वाला है, देश को उदासी में धकेलने वाला है। पूछा जा सकता है कि रामनाथ कोविंद ने चंदा दे ही दिया तो क्या हो गया, देश में एक धार्मिक कार्य हो रहा है तो इसके लिए चंदे पर इतनी हायतौबा क्यों?

यह चंदा भी उस राम मंदिर के लिए है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद सरकार द्वारा निर्मित एक ट्रस्ट बना रहा है, क्योंकि राष्ट्रपति इस देश के राजनीतिक प्रमुख ही नहीं होते, वह बहुत सारे अर्थों में बल्कि सभी अर्थों में राष्ट्र के प्रमुख भी होते हैं। वे सरकार के भी मुखिया हैं, तीनों सेनाओं के भी प्रधान हैं और इस देश के एक-एक नागरिक के अभिभावक हैं। उन्हें राजनीतिक दलबंदियों से, धार्मिक और जातिगत पहचानों से, क्षेत्रीय या भाषिक पहचानों से ऊपर उठना पड़ता है। देश के सारे राजकीय अनुष्ठान उन्हीं के नाम पर होते हैं। वे बिल्कुल राष्ट्र का प्रतीक होते हैं।'

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