दुनियाभर में जेलों में डाले जा रहे हैं शिक्षक, क्या है सरकारों को डर!

पहले का समाज उन शिक्षाविदों का आदर करता था, जो अपनी एक नई सोच विकसित करते थे, पर आज के दौर में उन्हें जेलों में भेजा जाता है...

Update: 2020-07-31 05:55 GMT

महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

यह महज संयोग हो सकता है कि नई शिक्षा नीति की घोषणा और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर हैनी बाबू के गिरफ्तारी की खबर समाचार चैनलों पर एक के बाद एक आ रही थी। भले ही यह संयोग हो पर, सरकार का इशारा साफ़ है कि उसे शिक्षा नीति से कैसे छात्र और शिक्षक पैदा करने हैं। नयी शिक्षा नीति से टीवी चैनलों को ऐसा नया मुद्दा मिल गया है, जिससे उनका चार-पांच दिन आराम से गुजर जाएगा।

समाचार चैनलों पर इसे इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है मानो इससे पहले देश में सब अनपढ़ थे, पर अब इसके बाद पढ़े-लिखे लोग आयेंगें। सरकार ने कभी विश्वविद्यालयों में टैंक भेजकर, कभी लाइब्रेरी में लाठिया चलवाकर और आंसू गैस के गोले दाग कर, कभी टुकडे-टुकडे के फर्जी वीडियो बनवाकर और कभी धार्मिक ग्रंथों का पाठ कराकर अपना मकसद साफ़ कर दिया है।

कभी मुंशी प्रेमचंद पाठ्यक्रम से हटा दिए जाते हैं तो कभी देश का इतिहास बदल दिया जाता है। अब तो विज्ञान भी वेदों में ही समां गया है। जाहिर है सरकार की मंशा शिक्षा को लेकर स्पष्ट है कि उसे कैसे शिक्षक और छात्र चाहिए, यही नहीं विद्यार्थी संगठनों के लिए भी सरकारी विचारधारा स्पष्ट है।

दुनियाभर में सरकार की नीतियों के विरुद्ध आवाज उठाना तो नए जुर्म की श्रेणी में आ ही गया है, अब तो समाज के वंचित तबके के साथ काम करना भी राजद्रोह की श्रेणी का अपराध है। दुनियाभर में मानवाधिकार कार्यकर्ता, पर्यावरण के लिए काम करने वाले और सरकार की नीतियों के विरुद्ध आवाज उठाने वाले कार्यकर्ता, शिक्षक, छात्र सभी जेल में ठूंसे जा रहे हैं। हमारे देश में तो वर्तमान सरकार ने इसे एक नई परंपरा बना डाला है। हरेक कुछ अंतराल के बाद ऐसी घटनाएँ समाचार का हिस्सा बनतीं हैं।

इस कड़ी में नया नाम दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैनी बाबू का जुड़ गया है, जिन्हें भीमा कोरेगांव घटना के नाम पर और माओवादियों से सम्बन्ध का नाम देकर एनआईए ने गिरफ्तार कर लिया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक जीएन साईबाबा तो पिछले लंबे समय से जेल में हैं। उन्हें भी माओवादियों के साथ संबंध होने के आधार पर गिरफ्तार किया गया था।

प्रोफ़ेसर हैनी बाबू शिक्षक होने के साथ ही जाने माने मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। उन्होंने आरक्षण, जातिवाद, गेस्ट टीचर्स के मुद्दे, रोहित वेर्मुला की आत्महत्या का मामला और पिछड़े और गरीब तबके जैसे मुद्दों पर लगातार अपनी आवाज बुलंद की है। उनके गिरफ्तारी के विरोध में दिल्ली यूनिवर्सिटी के शिक्षक और छात्र ऑनलाइन आंदोलन कर रहे हैं। डूटा की भूतपूर्व प्रेसिडेंट नंदिता नारायण ने भी इसका विरोध किया है और कहा है कि सरकार ने अलग विचारधारा वाले लोगों को पकड़ने का एक नया तरीका निकल लिया है।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ हांगकांग में क़ानून के प्रोफ़ेसर और लोकतंत्र के हिमायती डॉ बैनी टी को हाल में ही यूनिवर्सिटी ने बर्खास्त कर दिया है। इस कदम को शैक्षिक आजादी पर गंभीर हमला बताया जा रहा है। उनपर आरोप हैं कि उन्होंने हांगकांग में पूरी स्वायत्तता की मांग के लिए 2014 में आयोजित अम्ब्रेला आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था।

यह आन्दोलन लगभग 2 महीनों तक चला था, और इसे ही पिछले वर्ष के लम्बे आन्दोलन का प्रेरक बताया जाता है। पिछले वर्ष उन्हें 16 महीने के कैद की सजा सुनाई गई थी, पर जमानत पर बाहर थे। यूनिवर्सिटी सीनेट की पिछली बैठक में उन्हें तमाम आरोपों से बरी कर दिया गया था क्योंकि उनके विरुद्ध कोई सबूत नहीं थे, लेकिन इसी सीनेट ने अगली ही मीटिंग में उन्हें नौकरी से ही बाहर कर दिया।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेलबोर्न में इस्लामिक स्टडीज की प्रोफ़ेसर काइली मूर गिलबर्ट पिछले दो वर्षों से ईरान की जेल में बंद हैं। वे इस्लाम की नए सिरे से व्याख्या करने के लिए जानी जाती हैं, उन्हें ईरान में एक इस्लामिक कांफ्रेंस में बुलाया गया था और फिर जेल में डाल दिया गया। उन्हें 8 वर्ष की जेल की सजा मिली है, और ऑस्ट्रेलिया की सरकार अब तक उन्हें छुडाने में असफल रही है।

इस मुद्दे पर ऑस्ट्रेलिया के यूनिवर्सिटी के शिक्षक और कर्मचारी ऑस्ट्रेलिया सरकार पर ईरान सरकार से बात करने का दबाव बना रहे हैं, पर सरकारी स्तर पर अब तक कुछ भी नहीं किया गया है। कोविड 19 के दौर में ईरान सरकार ने लगभग एक लाख कैदियों की सजा माफ़ कर दी है, पर इसी दौर में काइली मूर गिलबर्ट की जेल को बदल कर इरान के सबसे बदनाम जेल में डाल दिया गया है। अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट के अनुसार कार्चक जेल कैदियों की हत्याओं, यातनाओं और मानवाधिकार के हनन के लिए कुख्यात है।

जाहिर है कि दुनियाभर में शिक्षाविदों पर हमले तेज हो रहे हैं। सरकारें चाहतीं हैं कि शिक्षाविद और विद्यार्थी केवल सरकार की भाषा बोलें, और मानवाधिकार और सरकार विरोधी कार्यों से दूर रहें। पहले का समाज उन शिक्षाविदों का आदर करता था, जो अपनी एक नई सोच विकसित करते थे, पर आज के दौर में उन्हें जेलों में भेजा जाता है। हमारे देश में तो ऐसा बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।

शिक्षा नीति नई हो या पुरानी, शिक्षा का फायदा समाज को तभी मिलता है जब छात्र या शिक्षक एक स्वतंत्र विचारधारा को विकसित करने में समर्थ हों। पर, स्वतंत्र विचारधारा तो राजद्रोही करार दिए जा रहे हैं, और यही परंपरा पूरी दुनिया में फ़ैल गई है। ऐसी घटनाएं किसी भी समाज के लिए घातक हैं। 

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