अंधविश्वास के खिलाफ लड़ने वाले राष्ट्रीय योद्धा नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के 7 साल, हत्यारे अभी भी घूम रहे बेखौफ

अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले प्रख्यात तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को हत्या कर दी गई थी, मगर उनके हत्यारों को प्रशासन अभी तक सजा नहीं दिला पाया है....

Update: 2020-08-20 10:00 GMT

प्रेमपाल शर्मा, वरिष्ठ लेखक

अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए प्रख्यात रहे तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर की आज 20 अगस्त को पुण्यतिथि है। 7 साल पहले 20 अगस्त 2013 को बाइक पर सवार दो लोगों ने दाभोलकर की गोली मारकर हत्या कर दी थी, मगर अभी तक उनके हत्यारों को सजा नहीं दी जा सकी है। मुंबई में महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (एमएएनएस) समेत फिल्म जगत से जुड़ी हस्तियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अनेक जाने-माने लोगों ने हत्या के मामले की जांच की धीमी रफ्तार के विरोध में 2017 में एक बड़ा मार्च भी निकाला था।

जाने माने फिल्मकार और अभिनेता अमोल पालेकर, अभिनेत्री सोनाली कुलकर्णी, सामाजिक कार्यकर्ता बाबा अधव समेत अनेक नामचीन हस्तियों ने 'जवाब दो' नाम से एक विरोध मार्च निकालकर जांच में तेजी लाने के लिए सरकार को चेताया। काश कि पूरा देश बीस अगस्त से नरेंद्र दाभोलकर की याद में अंधविश्वास विरोधी सप्ताह मनाता।

दाभोलकर के असल दोषी कब पकड़े जाएंगे यह तो एक सवाल है, मगर उनकी हत्या बेकार नहीं जाएगी। पूरे देश में जिस ढंग से जादू-टोना और अवैज्ञानिकता के खिलाफ आवाज उठी है, उससे एक उम्मी‍द बनती है। विशेषकर हिन्दी पट्टी के राज्यों के लिए तो अंधविश्वासों से लड़ना बेहद जरूरी है। यदि सूत्र वाक्य में कहा जाए तो हिन्दीभाषी राज्य उतने ही गरीब और पिछड़े हैं जितना शिकंजा यहां के समाज पर जादू-टोना, अंधविश्वास और दूसरी कु‍रीतियों का है।

1944 में सतारा में पैदा हुए नरेन्द्र दाभोलकर ने डॉक्टरी की पढ़ाई की। 10 साल प्रैक्टिस भी की, लेकिन उन्हें लगा कि इससे कहीं जरूरी तो जनता के बीच काला जादू-टोना और सैकड़ों अंधविश्वासों को खत्म करना है। बस जुट गए।

गांव-गांव और कई शहरों में घूमे, संगठन बनाए, लोगों को समझाया कि 'आपके दु:ख, गरीबी का कारण क्या है। मैं धर्म के खिलाफ नहीं हूं उसकी आड़ में पनप रहे धंधों के खिलाफ हूं।' लोगों की समझ में बात आई और धीरे-धीरे ऐसे अंधविश्वासों के खिलाफ एक आंदोलन बन गया।

समाज की इन बुराईयों में सबसे पहले उन्हों ने जाति प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई। 'एक गांव और एक जलाशय' यानि कि बिना किसी भेदभाव के गांव के लोग मिलकर खाना-पानी, रहना सीखें। महाराष्ट्र् के एक मंदिर में महिलाओं को प्रवेश नहीं दिया जाता था। उन्होंने आंदोलन चलाया और महिलाओं को मंदिर में प्रवेश मिला।

ज्योतिषियों के खिलाफ भी दाभोलकर दिन-रात जूझते थे। ज्योतिष को वे समस्याओं में फंसे नागरिकों के शोषण का हथियार मानते थे। उन्होंने फिल्म अभिनेता डॉ. श्रीराम लागू के साथ एक प्रश्नावली तैयार की थी और लगभग तीन सौ ज्योतिषियों को चुनौती दी थी। एक भी ज्योतिषी सामने नहीं आया। सच का साहस होता तो वे आगे आते। जिन दिनों उनकी हत्‍या हुई, वे नीलम पत्थर और चमत्कारी रत्नों के भंडाफोड़ में लगे हुए थे। उन्होंने लोगों को बताया कि कैसे झूठ-मूठ के पत्थरों को जादुई और चमत्कारी पत्थर बताकर करोड़ों का धंधा चल रहा है। हो सकता है इन्हीं में से किसी ने उनकी हत्या की हो क्योंकि जागृति आने से ये सब धंधे बंद हो जाएंगे।

आप आसपास नजर दौड़ाएं तो इनमें से कौन सी बुराई दिल्ली, बुलन्दशहर, इलाहाबाद, पटना से लेकर कलकत्ता तक नहीं है। महाराष्ट्र में तो इन अंधविश्वासों के खिलाफ बहुत पहले से ही आंदोलन चलता रहा है। सत्य शोधक समाज सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में ही सक्रिय है। इसके अलावा इन कुरीतियों, जातिवाद, धर्मांधता, गैर बराबरी से लड़ने की महाराष्ट्र में एक लम्बी परम्परा रही है।

साहूजी महाराज, महात्मा फुले, रानाडे से लेकर मौजूदा फिल्मी जगत के डॉ. श्रीराम लागू, अमोल पालेकर, रोहिणी हथगंडी़ तक। नरेन्द्र ने अपनी सक्रियता की शुरुआत विद्यार्थी युवजन सभा से की और फिर शाने गुरूजी की पत्रिका 'साधना' का संपादन संभाला। बीस वर्ष से वे इस पत्रिका के माध्यम से लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचा रहे थे।

पत्रिकाएं तो उत्तर प्रदेश, बिहार से भी कम नहीं निकल रहीं, लेकिन क्या ऐसी किसी एक भी पत्रिका का नाम बता सकते हैं जो ऐसे अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ रही हो? उल्टे वे अंधविश्वास फैला रही हैं। शायद ही कोई पत्रिका ऐसी होगी जिसमें भविष्यफल का नियमित स्त़म्भ न होता हो। ऐसे गुमराह करने वाले भविष्यफलों से हिन्दी के अखबार भी अछूते नहीं हैं।

अधिकांश चैनलों पर भी कोई मंत्र से कारोबार बढ़ाने का नुस्खा बताता है तो कोई ताबीज देकर प्रेमिका या प्रेमी को वापिस लाने का। लाखों रुपए के पत्थर, मालाएं, गण्डे-ताबीज सरेआम बिकते हैं। क्या यह सब कम बड़ा अपराध है? ऐसा कोई कानून बना तो मीडिया जो दिन-रात ऐसे अंधविश्वासों को बढ़ाता है, उस पर रोक लग जाएगी।

इन्हीं सबसे मुक्ति के लिए पिछले बीस वर्ष से वे महाराष्ट्र सरकार से कोशिश में लगे थे नरेन्द्र दाभोलकर 'अंधविश्वास निर्मूलन कानून' बनाने के लिए। इसके प्रारूप में 29 बार संशोधन किए गए और किसी न किसी बहाने इस बिल को लटकाए रखा गया। क्योंकि हर राजनीतिक दल को पता है कि इस धंधे में उन सबके अनुयायी शामिल हैं।

डॉ. दाभोलकर का साफ कहना था कि आप अपने घर की चारदीवारी में अपनी श्रद्धा के बूते जो कुछ कीजिए, लेकिन तंत्र-मंत्र या किसी और रूप में आप उसे बेचकर जनता को गुमराह नहीं कर सकते। इस अर्थ में वे निजी धर्म के खिलाफ भी नहीं थे, लेकिन फिर भी धंधेबाजों को ये बरदाश्त नहीं हुआ और दिनदहाड़े उनकी हत्या कर दी गई।

आजादी के बाद देश की बागडोर जिस प्रधानमंत्री के हाथों में आई वे वैज्ञानिक सोच से भरे स्वप्नदशी राजनेता थे। डिस्कवरी ऑफ इंडिया' में वे लिखते हैं कि 'यह अजीब लगता है कि हम परम्पराओं से इतने क्यों चिपटे रहते हैं कि मनुष्य की तर्क बुद्धि काम करना बंद कर देती है।' उन्होंने उम्मीद जताई थी कि राजनीतिक और आर्थिक रूप से आजाद होने पर हमारा मन मस्तिष्क सामान्य और तर्कपूर्ण ढंग से काम करने लगेगा।

स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान सभी ने नेताओं ने समाज को बहुत नजदीक से देखा था और वे मानते थे यदि दुनिया के राष्ट्रों के साथ हिन्दुस्तान को पहुंचना है तो सबसे पहले यहां के अंधविश्वासों और पोंगापंथी को दूर करना है। महात्मा‍ गांधी स्वयं इस अंधविश्वास के खिलाफ लगातार लिखते और कहते रहे।

गांधी को हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था का हिमायती कहना वैज्ञानिक सोच पर खरा नहीं उतरता। उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह कहा और लिखा है कि कोई भी परम्परा कितनी भी पुरानी हो उसका कोई धर्मग्रंथ कितना ही पूज्य हो यदि वह आज की जरूरतों के हिसाब से खरा नहीं उतरता तो उसे छोड़ने में ही भलाई है।

किस धर्म का कौन सा मसीहा अपने धर्म ग्रंथों के खिलाफ इतनी कठोर बात कह सकता है? यहां तक कि अस्पृ्श्यता को लेकर भी उन्होंने दोटूक कहा कि, 'यह रावण जैसे राक्षस से भी ज्यादा खतरनाक है। मनु स्मृृति का सहारा लेकर इन बुराइयों को जायज नहीं ठहराया जा सकता। किसी धर्मग्रंथ में लिखे श्लोक की बातें मेरे तर्कों से ऊपर नहीं हो सकतीं।'

लेकिन इस शहीद की शहादत व्यर्थ नहीं गई है। अब हम सबका फर्ज बनता है कि न केवल महाराष्ट्र बल्कि ऐसा कानून केन्द्र सरकार भी बनाए जिससे कि पूरे देश में जादू-टोना, डायन, भूत-प्रेत जैसी कुरीतियां और इनके नाम पर धंधा करने वाले धार्मिक गुरूओं को सजा दी जा सके।

Tags:    

Similar News