बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ के कोरे नारों से बेटियां नहीं बचतीं मोदी जी!

Update: 2019-12-25 11:58 GMT

शोध में हुआ खुलासा भारत में 5 साल से कम की 22 फीसदी बच्चियों की मौत इसलिए क्योंकि वे लड़कियां हैं, देश में लड़कियों की उपेक्षा इस हद तक की जाती है कि वे जिन्दा भी नहीं रह पातीं....

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

जकल देश में अल्पसंख्यकों की चर्चा जोरों पर है। सरकार लगातार इनके अधिकार की बात कर रही है और दूसरी तरफ अल्पसंख्यक अपने अधिकारों के लिए राष्ट्रव्यापी आन्दोलन किये जा रहे हैं। इन सबके बीच एक अल्पसंख्यक वर्ग की चर्चा नहीं हो रही है। देश में प्रति 100 पुरुषों पर 91 महिलायें हैं, इसका सीधा सा मतलब है कि महिलायें भी अल्पसंख्यक हैं और इनसे सरकार और समाज वैसा ही बर्ताव कर रहा है जैसा दूसरे अल्पसंख्यक वर्गों के साथ कर रहा है।

रकार के बेटी बचाओ, बेटी पढाओ जैसे नारे अब खोखले हो चुके हैं और उज्ज्वला योजना की चमक फीकी पड़ चुकी है। लैंगिक असमानता दूर करने के तमाम सरकारी दावों के बीच समय-समय पर प्रकाशित होते लैंगिक समानता से सम्बंधित इंडेक्स देश की हकीकत दुनिया को बता देते हैं।

हाल में ही वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने जेंडर गैप इंडेक्स प्रकाशित किया है, इसमें कुल 153 देशों की सूची में भारत का स्थान 112वां है। पहले स्थान पर यूरोपीय देश आइसलैंड है और अंतिम स्थान पर येमन है। पाकिस्तान (151वां) को छोड़कर सभी पड़ोसी देश हमसे बेहतर स्थिति में हैं। बांग्लादेश 50वें, नेपाल 101वें, श्रीलंका 102वें और चीन 106वें स्थान पर है।

पिछले वर्ष के इंडेक्स में भारत 108वें स्थान पर था। 2006 से वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम इस इंडेक्स को प्रकाशित कर रहा है, उस समय भारत 98वें स्थान पर था। भारत सरकार के महिलाओं से सम्बंधित नारे जैसे-जैसे बढ़ते गए, हम इंडेक्स में लुढ़कते चले गए।

स इंडेक्स को शिक्षा, स्वास्थ्य, राजनीति और अर्थव्यवस्था में भागीदारी के आंकड़ों के आधार पर तैयार किया जाता है। सूची के पहले 10 देशों में क्रमशः आइसलैंड, नोर्वे, फ़िनलैंड, स्वीडन, निकारागुआ, न्यूजीलैंड, आयरलैंड, स्पेन, रवांडा और जर्मनी शामिल हैं। इंडेक्स के अनुसार दुनिया में लैंगिक असमानता दूर करने में लगभग 100 वर्ष का समय और लगेगा। दुनिया में लैंगिक असमानता की खाई राजनीति के क्षेत्र में सबसे तेजी से पट रही है और इसे पूरा ख़त्म होने में 95 वर्ष लगेंगे, जबकि आर्थिक क्षेत्र में इस असमानता को ख़त्म होने में अभी 257 वर्ष और लगेंगे।

स इंडेक्स से इतना तो स्पष्ट है कि महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ने से दुनिया में महिलाओं की स्थिति में तेजी से सुधार होगा ऐसा नहीं लगता। पूरी दुनिया के देशों में कुल संसद सदस्यों में से 25.2 प्रतिशत महिलायें हैं और सभी मंत्रियों में से 24.1 प्रतिशत महिलायें हैं, फिर भी महिलाओं की स्थिति में कोई अप्रत्याशित सुधार नही आया है।

जेंडर गैप इंडेक्स के अनुसार महिलाओं के स्वास्थ्य में 150वें स्थान पर और आर्थिक भागीदारी में भारत 149वें स्थान पर हैं, यानी हम अंतिम पांच देशों में शुमार हैं। महिलाओं की शिक्षा के क्षेत्र में भारत 112वें, संसद सदस्यों की संख्या में 122वें और मंत्रियों की संख्या के सन्दर्भ में 59वें स्थान पर है। पूरे 153 देशों की सूची में भारत अकेला देश है, जहां महिलाओं की असमानता राजनीति की तुलना में अर्थव्यवस्था में अधिक है।

सका सीधा सा मतलब है कि महिला जनप्रतिनिधियों की संख्या तो बढ़ रही है, पर सामाजिक स्तर पर महिलाओं की हालत में सुधार नहीं हो रहा है। दूसरी तरफ निकारागुआ और रवांडा जैसे देश इसी बलबूते पर पहले 10 देशों में शुमार हैं। वैसे भी हमारे देश की महिला संसद सदस्य महिलाओं के मुद्दे पर हमेशा चुप रहतीं हैं। कुल अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी महज 35.4 प्रतिशत है और कंपनियों के बोर्ड मेम्बर के तौर पर तो महज 13.8 प्रतिशत महिलायें ही हैं।

मारे देश की ऐसी हालत तब है, जब प्रधानमंत्री अपने आपको लगातार महिलाओं का मसीहा साबित करते हैं, लगभग हरेक भाषण में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, उज्ज्वला योजना और तीन तलाक बिल की चर्चा करना नहीं भूलते। अफ्रीका में एक देश है, टोंगा। टोंगा दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में शुमार है। दूसरी तरफ भारत है, जहां की बढ़ती अर्थव्यवस्था के चर्चे दुनिया में हैं।

गर हैरान करने वाला तथ्य यह है कि दुनिया में भारत और टोंगा, दो ही ऐसे देश हैं, जहां पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सन्दर्भ में लड़कियों की मृत्यु दर लड़कों की तुलना में अधिक है। इसका सीधा सा मतलब है कि पांच वर्ष से कम उम्र में लड़कियों की मौत लड़कों से अधिक होती है। इस विश्लेषण को लन्दन के क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ने दुनिया के 195 देशों के आंकड़ों के आधार पर किया है।

स्ट्रिया के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एप्लाइड सिस्टम्स द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में पांच वर्ष से कम उम्र की जितनी लड़कियां मरतीं हैं, उनमें से 22 प्रतिशत मौतें केवल इसलिए होतीं हैं कि वे लड़कियां थीं, इसलिए घर-परिवार और समाज ने उन्हें पूरी तरह से उपेक्षित किया।

जाहिर है, पूरी दुनिया में किये गए तमाम अध्ययन यही बताते हैं कि हमारे देश में लड़कियों की उपेक्षा इस हद तक की जाती है कि वे जिन्दा भी नहीं रह पातीं। इन सबके बाद भी समाज का और सरकार का रवैया नहीं बदल रहा है।

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