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मैंने बुश को जूता क्यों मारा : मुंतज़िर अल-ज़ैदी

Janjwar Team
1 Jun 2017 10:01 PM GMT
मैंने बुश को जूता क्यों मारा : मुंतज़िर अल-ज़ैदी
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मुंतज़िर अल-ज़ैदी वही पत्रकार हैं जिन्‍होंने इराक में अमरीका के पूर्व राष्‍ट्रपति जॉर्ज बुश पर जूता फेंका था...
पिछले दिनों मुंतज़िर अल-ज़ैदी जब जेल से छूट कर आए, तो उन्‍होंने सबसे पहले अपने इस लेख से दुनिया को यह बताने की कोशिश की कि उन्‍होंने बुश को जूता क्‍यों मारा. यह लेख इस लिहाज़ से बेहद अहम है कि इसमें पत्रकारिता और मुल्‍कपरस्‍ती के रिश्‍ते के बारे में जो बात कही गई है, वह विरले ही सुनने को मिलती है.
मुंतज़िर अल-ज़ैदी
'मैं कोई हीरो नहीं. मैंने सिर्फ एक ऐसे इराकी का धर्म निभाया है जो तमाम बेगुनाहों के दर्द और कत्ल-ए-आम का गवाह रहा है.'
मैं आज़ाद हूं. लेकिन मेरा मुल्क अब भी जंग की जंज़ीरों में जकड़ा हुआ है. मेरे बारे में काफी बातें हुई हैं- कि वह हीरो है और उसने वैसा काम भी किया. मेरा जवाब सिर्फ इतना है: मुझे यह काम करने पर जिस चीज़ ने मजबूर किया, वह नाइंसाफी है जो मेरे लोगों के साथ हुई है, कि किस तरह कब्ज़ाई अपने फौजी बूटों तले मेरी सरज़मीं को रौंद कर उसे शर्मसार कर देना चाहते थे.
हाल के कुछ सालों में कब्ज़ाइयों की गोली खाकर करोड़ से ज्यादा इराकी शहीद हो चुके हैं. आज इराक पांच करोड़ यतीमों, करोड़ों बेवाओं और सैकड़ों हज़ारों जख़्मी लोगों की पनाहगाह में तब्दील हो चुका है. मुल्क के भीतर और बाहर कई करोड़ लोग बेघर हो चुके हैं.
हम एक ऐसे मुल्क हुआ करते थे जहां रहने वाला एक अरब, यहीं के तुर्कमानों, कुर्दों, असीरियाइयों, साबियाओं और याज़िदों के साथ अपनी दो जून की रोटी बांट कर खाता था. जहां शिया और सुन्नी एक ही कतार में बैठ कर सिजदा किया करते थे. और जहां के मुस्लिम अपने ईसाई भाइयों के साथ मिल कर ईसा का जन्मदिन मनाते थे. ऐसा इसके बावजूद था कि हम एक दशक से ज़्यादा वक्त से जु़ल्मतों के तले दबे अपनी भूख तक को साझा करते आ रहे थे.
हमारे सब्र और एका ने हमें अपने ऊपर हुए इस जु़ल्म को भूलने नहीं दिया. लेकिन हमले ने भाई को भाई से, पड़ोसी को पड़ोसी से जुदा कर दिया. हमारे घर कब्रगाह बना दिए गए
मैं कोई हीरो नहीं. लेकिन मेरा एक नज़रिया है. और मेरा नज़रिया बिल्कुल साफ है. अपने मुल्क को शर्मसार देख कर मुझको शर्म आई. अपने बग़दाद को जला देख कर और अपने लोगों की हत्याएं देख कर मुझको शर्म आई. हज़ारों ऐसी दर्दनाक तस्वीरें मेरे ज़ेहन में पैबस्त हो गईं जो मुझे बग़ावत की ओर धकेल रही थीं- अबू ग़रेब की दास्तान, फलूजा, नज़फ, हदीथा, सद्र, बसरा, दियाला, मोसूल और तल अफ़र में हुआ कत्ल-ए-आम और मेरी घायल ज़मीन का एक-एक इंच. मैं अपनी जलती हुई ज़मीन पर खूब चला. और मैंने अपनी नंगी आंखों से कब्ज़े के शिकार लोगों का दर्द देखा. अपने ही कानों में मैंने यतीमों और बेबसों की चीखें भी सुनीं. और शर्म का एक गहरा अहसास मुझे भीतर तक किसी बदकार की तरह दहला गया, क्योंकि मेरे पास ताकत नहीं थी.
अपने पेशे से जुड़े कामों को रोज़ाना खत्म कर लेने के बाद जब मैं मलबे में तब्दील हो चुके तबाह इराकी घरों की मिट्टी अपने कपड़ों से झाड़ रहा होता या फिर अपने कपड़ों पर लगे खून के धब्बे साफ कर रहा होता, उस वक्त मैं दांत पीस कर रह जाता था. तब मैं अपने लोगों की कसम खाता- कसम बदले की.
आखिरकार मौका मिला, और मैंने उसे गंवाया नहीं. कब्ज़े के दौरान या उसकी वजह से बहे बेगुनाहों के खून के एक-एक कतरे, हरेक बेबस मां की एक-एक चीख, यतीमों की हरेक सिसकी, बेआबरू औरतों के दर्द और यतीमों के एक-एक कतरा आंसू के प्रति अपनी वफादारी के नाम पर मैंने यह मौका अपने हाथ में लिया.
जो लोग मुझसे सवाल पूछते हैं, उनसे मैं पलट कर पूछता हूं- क्या तुम जानते हो कि जो जूता मैंने फेंका था, वह कितने टूटे घरों से होकर गुज़रा था, कितनी बार वह बेगुनाहों के खून में लिथड़ा था. एक ऐसे वक्त में जब सारे ईमानों की एक-एक कर धज्जियां उड़ा दी गई हों, शायद वह जूता ही सबसे कारगर जवाब हो सकता था.
जब मैंने अपराधी जॉर्ज बुश के चेहरे पर वह जूता उछाला, तो मैं उसके हरेक झूठ, अपने मुल्क पर उसके कब्ज़े, मेरे लोगों के कत्ल, मेरे मुल्क के खज़ाने की लूट और यहां की सूरत बिगाड़ दिए जाने के खिलाफ सिर्फ अपनी नाराज़गी को ज़ाहिर करना चाह रहा था. और इस बात के खिलाफ भी, कि उसने इस धरती के बेटों को यहीं पर बेगाना बना डाला है.
अगर मैंने अनजाने में पत्रकारिता का कुछ भी बुरा किया है, चूंकि मेरी वजह से अखबार को शर्मसार होना पड़ा, तो मैं माफी मांगता हूं. मैं कुल जमा यह चाहता था कि एक आम नागरिक के उन ज़िंदा अहसासों को ज़ाहिर कर सकूं जो रोज़ाना अपनी सरज़मीं को रौंदे जाते देख रहा है. जो लोग कब्ज़े की आड़ में पेशेवराना ज़िम्मेदारी का रोना रो रहे हैं, उनकी आवाज़ मुल्कपरस्ती की आवाज़ों से तेज़ नहीं हो सकती. और अगर मुल्कपरस्ती को अपनी आवाज़ बुलंद करनी ही पड़े, तो पेशे को उसके साथ खड़ा होना होगा.
मैंने ऐसा इसलिए नहीं किया कि मेरा नाम तवारीख में दर्ज हो जाए या फिर मुझे कोई फायदा मिले. मैं सिर्फ अपने मुल्क को बचाना चाह रहा था.
(अनुवाद : अभिषेक श्रीवास्तव. गार्डियन में छपा यह लेख हम साभार प्रकाशित कर रहे हैं.)

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