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रविदास की मूर्ति तोड़कर महाराणा प्रताप की मूर्ति लगाना था मकसद, दलित नहीं झुके तो फूंक दी उनकी पूरी बस्ती

Janjwar Team
10 Jun 2017 8:07 AM GMT
रविदास की मूर्ति तोड़कर महाराणा प्रताप की मूर्ति लगाना था मकसद, दलित नहीं झुके तो फूंक दी उनकी पूरी बस्ती
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फिजा में था कि जब विधायक राजपूत, मुख्यमंत्री राजपूत फिर देखते हैं कौन बचाता है चमारों के इस देवता को। हाथ में तलवार और बल्लम लिए राजपूत युवा नारा लगा रहे थे, महाराणा प्रताप की मूर्ति वहीं लगेगी जहां से उखड़ेगा रविदास। और यह सबकुछ हो रहा था स्थानीय भाजपा विधायक बृजेश सिंह की उपस्थिति में...

शब्बीरपुर गांव से तसलीम कुरैशी की रिपोर्ट

जी हां। यही हकीकत है कल की घटना का पर इसे कहने और बोलने से प्रशासन और स्थानीय विधायक बच रहे हैं। स्थानीय विधायक बृजेश सिंह घटना के मौके पर मौजूद थे पर अब वे इससे इनकार कर रहे हैं और बता रहे हैं कि वे इस आगजनी और हिंसा की घटना के वक्त गाजियाबाद के नेहरुनगर भाजपा कार्यालय में दीनदयाल उपाध्याय की जयंती मना रहे थे।

पर गाजियाबाद के नेहरु नगर कार्यालय पर हुई बातचीत में आॅफिस कर्मचारी ने कहा कि कल यहां दीनदयाल उपाध्याय पर कोई कार्यक्रम नहीं हुआ है। भाजपा के नेहरु नगर कार्यालय प्रभारी के प्रभारी मेहश शर्मा ने भी देवबंद विधायक की दी गयी जानकारी को गलत साबित किया।

महेश शर्मा ने बताया, 'दीनदयाल उपाध्याया जयंती के मौके पर 5 मई को कोई कार्यक्रम नहीं हुआ है, बल्कि कल 7 मई को गाजियाबाद के कृष्णा इंजीनियरिंग कॉलेज में दीन दयाल उपाध्याय पर कार्यक्रम है। पूरे जिले में कई जगहों पर कार्यक्रम रखे गए हैं।'
इतनी बड़ी घटना के बाद हर तरफ चुप्पी का माहौल है। कल दोपहर के बाद से गांव में मीडिया को नहीं जाने दिया जा रहा है, जबकि वीडियो को देख आपको साफ समझ में आ जाएगा कि गांव श्मशान में तब्दील हो चुका है और दलित गांव छोड़कर भाग चुके हैं।

लेकिन 'कैलाश पर संजीवनी बूटी' खोजने वाली मीडिया को यह सब नहीं पता चल पा रहा है। पर हम आपको एक—एक कर बताएंगे कि असल में सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में महाराणा प्रताप की जयंती मनाने के पीछे असल मकसद क्या था, क्यों तोड़ी गयी रविदास की मूर्ति और कैसे एक राजपूत जाति से ताल्लुक रखने वाले युवक की हुई मौत।

सबसे पहले महाराणा प्रताप की शोभायात्रा
सहारनपुर के बड़गांव थानाक्षेत्र के शब्बीरपुर गांव में 5 मई की दोपहर महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर शोभायात्रा निकली। यह शोभायात्रा कुछ दूसरे गांवों से होकर शब्बीरपुर पहुंची थी। शोभायात्रा में रसूलपुर टांक, रनखंडी, जडौदा जट, बहैला, गलौली, सिमलाना, महेशपुर समेत कई गांवों के राजपूत जाति के लोग शामिल थे। शोभायात्रा बैंडबाजा और डीजे के साथ चली शब्बीरपुर गांव में बढ़ी चली आ रही थी जिसमें तलवार लिए दो दर्जन से ऊपर नौजवान और घोड़ों पर सवार लोग थे। शोभायात्रा में शामिल ज्यादातर लोगों ने साफा बांध रखा था जिनकी उम्र 15 से 25 वर्ष के बीच थी।




शब्बीरपुर गांव में ही क्यों हुआ विवाद
आसपास के सभी गांवों में राजपूतों की मजबूत पकड़ है पर शब्बीरपुर गांव में मात्र 15—20 राजपूत परिवार होने के चलते वो वहां जातीय रसूख का वैसा इस्तेमाल नहीं कर पाते, जैसा दूसरे गांवों में करने की उनको परंपरागत आदत है। शब्बीरपुर में वाल्मिकियों और चमार जाति के परिवारों की संख्या 100 से ऊपर है। संख्याबल इसी ताकत के कारण ग्रामीणों ने मायावती के शासन में गांव के पश्चिम में रविदास की एक मूर्ति लगाई। उस समय भी राजपूतों ने रविदास की मूर्ति लगाए जाने का विरोध किया था। पर कुछ कर नहीं पाए थे जिसकी कसक तभी से चली आ रही थी। लेकिन भाजपा के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जाति राजपूत होने के कारण उन्हें बल मिला। दूसरा स्थानीय देवबंद विधायक बृजेश सिंह भी राजपूत हैं। ऐसे में इस बार आसपास के गांवों के राजपूतों ने इसे नाक का सवाल बनाकर मोर्चा लिया।



पत्थरबाजी से बढ़ा तनाव
अभी सहारनपुर के सड़क दूधली प्रकरण की आग शांत भी नही हुई थी कि एक और गाँव को उपद्रवियों ने आग के हवाले कर दिया। शब्बीरपुर गांव में तलवार से सजी शोभायात्रा जब पहुंची तो दलितों ने आवाज कम करने को कहा और शांतिपूर्ण ढंग से जाने को ताकीद किया। पर दलितों के इस सुझाव पर पहले से ही मोर्चा लेने की तैयारी से आए राजपूत जाति के युवा भड़क गए। हवा में तलवार लहराते हुए उन्होंने दलितों को चुनौती दी। दलितों की ओर पत्थरबाजी शुरू हुई। पत्थरबाजी में राजपूत जाति का 26 वर्षीय युवक घायल हो गया जिसकी नानौता पीएचसी अस्तपाल में मौत हो गयी।



फिर गांव श्मशान में बदल गया
पत्थरबाजी के बाद रसूलपुर टांक, रनखंडी, जडौदा जट, बहैला, गलौली,सिमलाना, महेशपुर से बदला लेने के लिए राजपूतों का रेला चल पड़ा। उन्होंने पूरे शब्बीरपुर गांव को चारों ओर से घेर लिया और एक तरफ से दलितों के घरों को फूंकना शुरू कर दिया। आप वीडियो में भी देख सकते हैं आग कितनी भयावह है। देवबंद कोतवाल चमन सिंह चावड़ा समेत दर्जनभर लोग दोनों ओर से घायल हुए। भीड़ ने एडीएम को कब्जे में लिया।

क्या है दलितों का हाल
आगजनी और हिंसा के बाद मीडिया की पाबंदी के बाद गांव में दलितों का क्या हाल है, यह बात बाहर नहीं आ पा रही है। लेकिन आग और हिंसा को देख दलितों के साथ क्या गुजरा होगा इसकी भयावहता समझी जा सकती है।

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