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विमर्श

चेले—चपाटों का जमघट लगा दिल्ली सरकार नहीं बचा पाएगी थिएटर

Janjwar Team
25 Sep 2017 12:15 AM GMT
चेले—चपाटों का जमघट लगा दिल्ली सरकार नहीं बचा पाएगी थिएटर
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फेस्टिवल करने या फीते काटने से कला संस्कृति का विकास नहीं होता। उसके लिए बिना आग्रह पूर्वाग्रह के संवाद करना होगा। सिर्फ पसंदीदा लोगों की मीटिंग्स बुलाकर कुछ हासिल नहीं होगा...

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के नाम खुला पत्र

साहित्य कला परिषद, दिल्ली के ताजा विज्ञापन में आपकी फोटो के साथ दो थियेटर फेस्टिवल की सूचना छपी है। उसमें लिखे एक नियम में साहित्य कला परिषद के सचिव ने लिखा है कि संस्था द्वारा निर्धारित विषयों पर ही नाटक करने हैं।

मतलब अगर फेस्टिवल में आवेदन करना हो तो, नाट्यकर्मियों को आपकी सरकार द्वारा दिए ग्ए विषयों या एजेंडे पर ही नाटक करना होगा। यानि अब सरकार के दिशा निर्देश के तहत ही नाटक के विषय होंगे? अब सरकार तय करेगी कि हमें क्या और कैसे नाटक करने हैं।

दोस्त, यह कला की स्वायत्तता के लिए खतरनाक और गलत परंपरा की शुरुआत है। नाटक आपके हिसाब से नहीं चलेंगे, सरकार तो आती जाती रहेगी। पर रंगमच हमेशा है और रहेगा। कृपया कला की स्वंतत्रता को नियंत्रित न करें।

आप अपने तय एजेंडे के अनुरूप विषयों पर नाटक न करायें। कला की स्वतंत्रता को खत्म न करें।

आपने वाट्सअप मैसेज में मुझे लिखा, "सरकार अगर कोई ज़रूरत महसूस करे और रचनाकार से उस विषय पर कुछ रचना तैयार करने के लिए कहे तो इसमें किसी को आपत्ति क्यों हो? सरकार में बैठकर मुझे लगता है कि रचनाकार इन मुद्दों पर भी लिखेंगे तो सरकार जन जागरूकता के लिए उन रचनाओं के माध्यम से भी आगे बढ़ेगी।" (मनीष सिसोदिया)

मनीष भाई, सरकार की जरूरत के कथित आग्रह पर आप अलग से काम कर सकते हैं। आपके संदेश से सवाल यह भी उठता है कि क्या अभी तक रंगकर्मी मुद्देविहीन नाटक कर रहे थे? क्या सही है क्या गलत, हमें अभी तक पता ही नहीं था? अब आप हमें दिशा देकर कृतार्थ करेंगे?

सत्ता में बैठ ऐसी गलतफहमी कम से कम आपको तो नहीं होनी चाहिए।

साहित्य कला परिषद के भरत मुनि रंग महोत्सव और युवा नाट्य महोत्सव में विषय की यह शर्त लगा आप रंगकर्मी की स्वायत्तता के हक को बाध्य कर रहे हैं। महोत्सव में आर्थिक पक्ष हटा दीजिए, फिर देखिए कितने रंगकर्मी आपके मुद्दों पर काम करते हैं?

आपके इसी तर्क पर जब भाजपा अपनी जरूरत के अनुरूप पाठ्यक्रम में कुछ जोड़ती है या अपनी 'जरूरत' के मुताबिक इतिहास में संशोधन या बदलाव करती है तो हम—आप आपत्ति क्यों करते हैं?

भाजपा और आप की सरकार की जरूरत के मुददों में अंतर जानता हूं, पर तर्क दोनों का एक ही क्यों है?

दरअसल इसके लिए आपको लेखकों की कार्यशाला करनी चाहिए कि वह आपके दिए विषयों पर लिखे, फिर रंगकर्मी को तय करने दीजिए कि उसे क्या करना है। करना भी है या नहीं? इतनी आजादी उन्हें दीजिये।

हां, मुझे साहित्य कला परिषद के बारे में कुछ कहना या लेना देना नहीं है। कला के नाम पर वह तो एक नकारा और भ्रष्ट तंत्र है, जिसे न कपिल मिश्रा ने सुधारा, न आपने समझा।

मनीष भाई मुझे आपकी नीयत पर कोई शक नहीं है, पर आपके इसी तर्क का सहारा लेकर जब कोई और अपनी जरूरत हम पर लादेगा, तब हम उसका विरोध किस नैतिक आधार पर करेंगे?

सबसे महत्वपूर्ण बात- दुनिया के इतिहास में जब भी रचनात्मकता को सत्ता या सरकार ने दिशा निर्देश जारी किए, तब तब दोयम दर्जे का काम सामने आया है। आपातकाल से लेकर छद्म राष्ट्रभक्ति तक इसके उदाहरण सामने है।

सुझाव
कुछ बेहतरीन नाटक जो इन्हीं विषयों के करीब हो, (सरकार की जरूरत के हिसाब से हो) चुनकर उन्हें दे सकते थे, पर आपकी समिति में इतने समझदार कहां हैं?

आप साहित्य कला परिषद के इस गैर लोकतांत्रिक फैसले की समीक्षा करें। निवेदन है कि विषय की बाध्यता वाले नियम को तुरंत हटाएं।

याद रखें कि वैकल्पिक राजनीति के लिए सार्थक सांस्कृतिक नीति की भी जरूरत होती है। आपने आंदोलन में नाटक की ताकत देखी है।

रंगमंच की समस्याएं ढेर सारी हैं। फेस्टिवल करने या फीते काटने से कला संस्कृति का विकास नहीं होता। उसके लिए बिना आग्रह पूर्वाग्रह के संवाद करना होगा। सिर्फ पसंदीदा लोगों की मीटिंग्स बुलाकर कुछ हासिल नहीं होगा। इस पहलू पर भी ध्यान दीजिए। समस्याओं को हल करें, न कि नए फैसले लादें।

मनीष भाई एकतरफा फैसले कर उसे लागू करवाना तो स्वराज की किताब में भी कहीं नहीं लिखा है।
अगर आप चाहें तो कभी भी स्वायत्तता के विषय पर खुले मंच से मुझसे संवाद कर सकते हैं। आपके सकारात्मक जवाब के इंतजार में आन्दोलनों का आपका पुराना साथी

अरविन्द गौड़
अस्मिता थियेटर

(यह खुला पत्र रंगकर्मी अरविन्द गौड़ ने दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के नाम लिखा है।)

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