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विमर्श

नेता तभी सुधरेंगे जब जनता अपनी औकात पर आएगी

Janjwar Team
29 Aug 2017 1:18 PM GMT
नेता तभी सुधरेंगे जब जनता अपनी औकात पर आएगी
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नोटबंदी, किसान आत्महत्या, महंगाई, बेरोज़गारी, रेल दुर्घटना आदि के बावजूद हर गली नुक्कड़ पर चुनाव जीत रहे हैं इसलिए ‘सत्ता’ के गुरूर में गर्क हैं. और इनके समर्थक बलात्कारी बाबा, भक्तजन भक्तिभाव से लबरेज़ हैं...

मंजुल भारद्वाज, रंगचिंतक

मेरे सवाल “जनता” से हैं. क्या ये देश आपका है? क्या आप इसके मालिक हैं? या आपने मालिक ‘राजनेताओं’ को बनाया है और खुद किरायेदार की तरह इस देश में रह रहे हो. इस देश में रहने का किराया यानी वोट देकर अपना फर्ज़ पूरा कर लेते हो! और राजनेता मालिक बनकर आप पर राज करते हैं!

तो “जनता’ ये समझ लीजिये, जान लीजिये की ‘आप’ देश के साथ धोखा कर रहे हो, संविधान की अवमानना कर रहे हो क्योंकि ये ‘आपका’ देश है,आप मालिक हैं. ‘जनता’ अपने इकबाल को जगाइए. इस देश को आपकी ज़रूरत है यानी आपको ‘अपनी’ ज़रूरत है.

जरा सा सोचिये बहुत बौद्धिकता की ज़रूरत नहीं है. क्या आज के “जहाँपनाह” और उसके वजीर “शाह” को ‘जनता’ का भय है? जनता की शर्म है? लोकतान्त्रिक प्रकियाओं की समझ है? आपको उत्तर उनके कारनामों में दिख गया है. तीन साल से दिख रहा है किस तरह से प्रशासनिक, नीतिगत फैसलों में उनके ‘कारनामों’ से देश में त्राहि त्राहि मची है. पर आत्ममुग्ध है जहाँपनाह..बस अपनी आत्ममुग्धता का ट्वीट पर गुणगान करते हैं!

चूँकि नोटबंदी, किसान आत्महत्या, महंगाई, बेरोज़गारी, रेल दुर्घटना आदि के बावजूद हर गली नुक्कड़ पर चुनाव जीत रहे हैं इसलिए ‘सत्ता’ के गुरूर में गर्क हैं. और इनके समर्थक बलात्कारी बाबा, भक्तजन भक्तिभाव से लबरेज़ हैं!

"मध्यम' वर्ग से सवाल है मेरा जो अभी भी "सबका साथ,सबका विकास" के भ्रम जाल में खोया है, अँधा है, चुप है, लाचार है, और चमत्कार के इंतज़ार में है! जो गली नुक्कड़ के चुनाव जीता रहा है! जहाँपनाह आत्ममुग्ध हैं, शर्म, लिहाज ये इनके संस्कारों में नहीं है. इनके संस्कारों में है झूठ, फरेब, अंधश्रद्धा है!

ये हाई कमांड वाले 'तानशाह हैं... एक वंश के खिलाफ़ थे ना यह वो सब दिखावा था. बड़ी शेखी बघारते थे, हमारे यहाँ नेताओं की कमी नहीं है ...अब समझ आया 'खच्चरों' की कमी नहीं है!

क्या आप अंधभक्त बने रहेंगे ये सवाल है आपसे ‘जनता’? या राष्ट्रभक्त होकर अपनी जिम्मेदारी को निभायेंगे! आपकी ज़िम्मेदारी केवल ‘वोट’ देने तक नहीं है. वोट के बाद चुनी हुई सरकारों से सवाल पूछने की है. उनकी जवाबदेही को सुनिश्चित करने की है.

‘जनता’ अपने आप से पूछिए ‘नोटबंदी’ क्यों की गयी थी? आपको क्या कहकर नोट बंदी का कष्ट सहने की रहनुमाई अपील की थी “जहाँपनाह” ने. क्या वो वायदे और लक्ष्य पूरे हो गए? सच बात तो ये है ‘जनता’ की आप चमत्कार में विश्वास करते हैं. अपने श्रम से अपना भाग्य बनाने में नहीं.

‘जनता’ अब तो उठिए और सवाल कीजिये इस “जहाँपनाह” से! कभी ‘जनता’ अपने मन की भी बात कीजिये, अपना दर्द भी बयान कीजिये. कभी सडक पर उतरिये. इनकी लात खाने से अच्छा है ‘अपनी आवाज़’ उठाना. अब समय आ गया है जनता अपने ‘मन’ की बात सुनने का, अपने इकबाल को जगाने का !

‘जनता’ आज राष्ट्र आप से अपने होने को सिद्ध करने का आवाहन कर रहा है. जहाँ जहाँपनाह अदालतों में ऐसे हलफनामे देते हैं कि आप ‘जनता’ को अपने शरीर पर तक का अधिकार नहीं है. जरा समझिये क्या आपके शरीर पर आपका अधिकार है ...या सरकार का? क्या ये लक्षण किसी ‘लोकतान्त्रिक’ सरकार के हैं. ये तानशाह का हुक्म है. इस तानशाही से बचने के लिए और देश को बचाने के लिए ‘जनता’ हुंकार भरिये!

चाणक्य का नाम बदनाम करने वाले ‘शाह’ को बताइए की हे सत्तालोलुप तुम्हारी सत्ता पाने के तिकड़म में कोई नया सत्ता का पैंतरा नहीं है. जाति विरुद्ध जाति, धर्म विरुद्ध धर्म का खेल सदियों पुराना है. हे जनता आपने इस खेल को सैकड़ों बार तोड़ा है . अब वो समय है जब ‘सत्ता’ के गुरूर में गर्क “जहाँपनाह” और उसके वजीर ‘शाह’ को आप अपने ‘विवेक और ईमान’ की ताकत दिखाएं!

जुमलों का खेल अब बंद हो इसलिए हे ‘जनता’ अपने अंदर के राष्ट्र निर्माता को जगाइए, खोजिये अपने अंदर उस बुदबुदाती क्रांति की आवाज़ को जो खो गयी है. खोजिए अपने अंदर किसी गांधी को, भगत सिंह को, रानी लक्ष्मीबाई को, लाल बहादुर शास्त्री को ,शिवाजी को, मौलाना आज़ाद को, एपीजे अब्दुल कलाम, बाबा साहेब आंबेडकर को, किसी भी राष्ट्र निर्माता को जो आपको प्रेरित कर इस जाल को तोड़ने में मदद करे.

प्रतीक्षा मत कीजिये कोई और नहीं करेगा . “आप” को करना है. तू खुद को बदल ‘जनता’ तब ही व्यवस्था बदलेगी. उठो देशवासियो एक सच्चे ‘लोकतंत्र’ के निर्माण के लिए. जहाँ जनता के इकबाल से रूह कांपती हो किसी जहाँपनाह और उसके ‘वज़ीरों’ की! राष्ट्र निर्माण की राह पर चलिए और गाते रहिये रबिन्द्रनाथ का ये गाना ..एकला चलो रे ... क्योंकि “राजनीति पवित्र और शुद्ध है”!

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