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विमर्श

पाकिस्तानी आतंकवाद पर अमेरिका में एक शब्द नहीं बोल पाए मोदी!

Janjwar Team
28 Jun 2017 2:07 PM GMT
पाकिस्तानी आतंकवाद पर अमेरिका में एक शब्द नहीं बोल पाए मोदी!
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ट्रम्प अपने एजेंडे के मुताबिक उत्तर कोरिया के आतंकवाद को लेकर मोदी से सहमति लेने में तो कामयाब हो गए, मगर मोदी पाकिस्तान पर ट्रम्प के समक्ष एक शब्द भी नहीं बोल पाए।

विष्णु शर्मा

पश्चिम के और हमारे यहां के व्यापारियों में फर्क है। वहां लोग अपना बनाया माल बेचते हैं और हमारे यहां दूसरे का माल चोरी छिपे बेच देने को व्यापार माना जाता है। कम से कम इस हिसाब से हमारी सरकार सबसे बड़ी व्यापारी है।

न जाने कितने श्रमिकों और किसानों के पेट काट कर भेल, सेल और रेल जैसे प्रतिषठानों का निर्माण होता है लेकिन हमारी सरकार इनको कौड़ियों के दाम बेचने को अपनी उपलब्धि के बतौर गिनाती है। हमारे यहां जो जितना जनता का माल बेच आता है वो उतना बड़ा नेता है। फोर्ब्स और टाइम सूची में अव्वल है।

पहले डॉ. मनमोहन सिंह थे, अब नरेन्द्र मोदी हैं। और इन सबसे बहुत पहले नरसिंहा राव थे। ये सूची देश के आम निर्वाचन में पार्टी का घोषणा पत्र है। जिन नेताओं ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा, अपना परीक्षाफल और प्रमाणपत्र साझा करने से डरते हैं, वे फोर्ब्स और टाइम पत्रिकाओं को अपनी रैलियों में उछालते हैं और उतनी ही अशिक्षित भीड़ वाह वाह करती है। ये देश एक बड़ा सर्कस है।

25 और 26 जून को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमेरिका यात्रा पर थे। उस देश के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प से उन्होंने पहली मुलाकात की और संयुक्त वक्तव्य जारी किया। वक्तव्य में रक्षा सहयोग और आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त लड़ाई की प्रतिबद्धता है।

हैरानी वाली बात यह है कि वक्तव्य में पाकिस्तान को लेकर कोई बात नहीं है। आतंकवाद के खिलाफ जो चिंता जताई गई है, उसका भारत से कोई खास लेना देना नहीं है जबकि उस चिंता के केन्द्र में अमेरिका की घरेलू नीति है।

दूसरा मामला एच-1 वीसा प्रतिबंध से जुड़ा है, उस पर भी मोदी खामोश रहे। हर साल अमेरिका 85 हजार एच-1 वीसा जारी करता है जो भारतीय आईटी पेशेवर लोगों के लिए फायदेमंद है। गौरतलब है कि सकल घरेलू उत्पाद में आईटी सेक्टर का योगदान 10 प्रतिशत है इसलिए यह मामला भारतीय सूचना प्रोद्योगिकी क्षेत्र के साथ साथ भारतीय अर्थतंत्र के लिए भी अत्यधिक महत्व का विषय है।

जबकि राष्ट्रपति ट्रम्प ने बेबाकी से भारत को अमेरिकी कंपनियों पर से व्यापार प्रतिबंध हटाने की मांग की और भारतीय उड्डयन कम्पनियों द्वारा हाल में एक सौ नए अमेरिकी विमान खरीदने की बात की प्रशंसा की। उन्होंने यह भी कहा कि वे भारत को प्राकृतिक गैस और अन्य ऊर्जा स्रोत के निर्यात के इच्छुक हैं।

दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी एक ‘सच्चे मित्र’ की तरह महत्वपूर्ण मामलों पर खामोश रहे और संयुक्त वक्तव्य में जूनियर पार्टनर की भूमिका के प्रति कृतज्ञता जताते रहे, जबकि लोगों की इच्छा थी कि वे देश के व्यापारिक हितों के लिए अमेरिका के सामने अपनी बात रखेंगे।

दोनों देशों के बीच वार्ता से ऐन पहले अमेरिका ने हिज़बुल मुजाहिद्दीन के प्रमुख सैयद सलाउद्दीन को वैश्विक आंतकवादियों की सूची में डाला, जिसे भारत में एक बड़ी जीत की तरह पेश किया जा रहा है।

ये कोई नई और बड़ी बात नहीं है, जिस तरीके से हमारा मीडिया दिखा रहा है। 2014 में अमेरिका ने हाफिस सइद के संगठन जमात उद दावा को भी अमेरिका ने प्रतिबंधित विदेशी आतंकवादी संगठन की सूची में डाला था। इससे पहले 2012 में उसने हाफिस पर 1 करोड़ अमेरिकी डॉलर का इनाम भी घोषित किया था। इसलिए सैयद सलाउद्दीन को लेकर उपरोक्त अमेरिकी पहल नाकाफी है और इसमें भारत की कूटनीतिक विजय जैसी कोई बात नहीं है।

अमेरिका से रक्षा खरीद करने वालों में भारत शीर्ष 10 देशों में है। हाल में अमेरिका ने 2 खरब अमेरिकी डाॅलर के 22 ड्रोन भारत को बेचने पर सहमति जताई है। ट्रम्प के आने के बाद आपसी हित जैसी बातों को कोई अर्थ नहीं रह गया है।

जहां अन्य पश्चिमी देश अमेरिका के इतर व्यापार संबंधों को प्राथमिकता दे रहे हैं, वहीं भारत सरकार इस दिशा में गंभीरता से काम करती नहीं दिखाई पड़ रही। रक्षा क्षेत्र के स्वदेशीकरण के जरिए रोजगार का निर्माण किया जा सकता है, लेकिन मोदी सरकार ने इस मामले में सुस्ती दिखाई है।

भारत में 41 आयुध निर्माण फैक्ट्रियां हैं, लेकिन इनका 90 प्रतिशत उत्पाद विदेशी कम्पनियां की तकनीक पर आधारित है। प्रधानमंत्री को तकनीक के हस्तांतरण पर भी मजबूती के साथ अपनी बात रखनी चाहिए थी, लेकिन उन्होने ऐसा नहीं किया।

शुक्र है कि उन्होंने इस यात्रा में कम से कम मेडिसन स्क्वेर जैसा कोई तमाशा नहीं किया।

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