Top
विमर्श

मोदी ने राजनीतिक फासीवाद का सफल प्रयोग केजरीवाल सरकार पर किया

Prema Negi
19 Jun 2018 8:19 AM GMT
मोदी ने राजनीतिक फासीवाद का सफल प्रयोग केजरीवाल सरकार पर किया
x

जिन्हें फासीवाद भारतीय संदर्भों में नहीं समझ आता, कोई मजाकिया शब्द लगता है, उन्हें केजरीवाल सरकार की हालत को देख लेना चाहिए कि फासीवाद अपनी राजनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए एक चुनी हुई सरकार को भी चोक कर सकता है और मासूम जनता उसे अनंतकाल तक मसखरापन समझती रह सकती है...

सामाजिक कार्यकर्ता अंजनी कुमार का विस्तृत विश्लेषण

दिल्ली दूर नहीं। एक आम समझदारी में दिल्ली का अर्थ शासन की कुर्सी पर कब्जा। दिल्ली में आजकल दो पार्टियां सत्ता में बैठी हैं। एक भाजपा देश की संसद में और एक आप पार्टी की दिल्ली विधानसभा में। दोनों को चुनाव में एक जैसा बहुमत मिला।

दिल्ली सरकार चलाने वाले आप पार्टी के नेता आजकल धरने पर हैं। उन्होंने सत्ता में आने के पहले धरना पदर्शनों का जो सिलसिला शुरू किया वह सरकार बनाने के बाद जारी है और लोगों में एक आम राय बनती गई है कि इन्हें ‘शासन’ करना नहीं आता है।

हालांकि जो भाजपा सरकार केंद्र और राज्यों में बनी है उसका नेतृत्व और पार्टी लगातार दंगा, हत्या, खरीद-फरोख्त, तख्तापलट, आमजीवन को उजाड़ने वाली नीतियों को पिछले दसियों साल से लगातार जारी किये हुए है। लेकिन उनके नेता और पार्टी पर यह आरोप या समझदारी नहीं बन पा रही है कि इन्हें ‘शासन’ करने नहीं आता है। इस तरह की समझदारी बनाने में सिर्फ मीडिया भूमिका निभा रहा है, ऐसा नहीं लगता।

दोनों ही सरकारों ने मीडिया पर खूब खर्च किया है। केंद्र के बजट के हिसाब से देखें तो भाजपा और मोदी ने निश्चित ही अब तक की बनी सीमा पार कर लिया है। तो, क्या मान लिया जाय कि यह दो पार्टियों का सिर्फ मुर्गा लड़ान है? कांग्रेस इस मसले पर यही रूख बनाये हुए है और केजरीवाल को अब भी के्रजीवाल की तरह ही देख रही है।

कर्नाटक में पिछले समय में सत्ता के नाटक में गवर्नर, भाजपा के गठजोड़ के खिलाफ जो माहौल बना उसमें भाजपा के फासीवादी रुख पर खूब चर्चा हुई। लेकिन दिल्ली में जब गवर्नर, भाजपा, नौकरशाही की तिकड़ी में मीडिया शामिल होकर जिस तरह का संकट पैदा किये हुए है उसे फासीवाद की बू को न देखना या फासीवादी आहट को न समझना यही दिखाता है कि फासीवाद की आहटें आमसमझदारी में घुलमिल रही हैं और संसदीय राजनीति में गहरे पैठ चुकी है।

फासीवाद संसदीय लोकतंत्र के घोड़े पर सवार होकर बहुमत की ‘पवित्रता’ को जब रौंद रहा है तब इस राजनीति के खेमेबाज पर्सनालिटी कल्ट की टकराहटों तक सीमित कर मनोरंजन करने में व्यस्त हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेता मनमोहन सिंह, राहुल गांधी से लेकर मणिशंकर अय्यर तक मोदी के बारे में जो राय पेश किये हैं और इसके लिए राष्ट्रपति तक को पत्र लिखे हैं, वह राय और समझदारी दिल्ली में चल रहे संकट के दौरान गायब है।

यहां उनकी समझदारी केजरीवाल को नसीहत देने में बदल गयी है और यह आम समझदारी बनाने में जाया हो रही है कि केजरीवाल को शासन करने नहीं आता है। तब कांग्रेस की समझदारी से क्या यह मान लिया जाय कि शासन करना मोदी को आता है और उसकी कमी सिर्फ उसके बात-व्यवहार की है, नीतियों को लागू करने की हड़बड़ी में है!

ऐसा लगता है कि कांग्रेस दोहरा खेल खेल रही है जो निश्चित ही खतरनाक है। एक बहुत अच्छे पत्रकार विनोद दुआ वायर के माध्यम से दो पर्सनाल्टियों की टकराहट, स्टेटमेनशिप की कमी के रूप में देख रहे थे और नसीहत दे रहे थे लेकिन सौभाग्य से थोड़ी बहुत उनकी राय में तब्दीली आई है। उन्हें भी लगने लगा है कि मामला कुछ और है। लेकिन कांग्रेस की समझदारी में कोई बदलाव नहीं दिख रहा है।

दिल्ली में जो चल रहा है उसे सूत्रबद्ध किया जाय तो कुछ बातें साफ हो सकती हैंः आप पार्टी की दिल्ली सरकार का कहना है कि केंद्र सरकार, गवर्नर, नौकरशाही की तिकड़ी एक चुनी हुई बहुमत की सरकार पर नियंत्रण किये हुए है। इस मसले को केंद्र सरकार और गवर्नर की आपसी समझदारी ने बिहार, गोवा, कर्नाटक और अन्य राज्यों में जो भूमिका निभाया, बंगाल और आंध्र प्रदेश में जिस तरह का माहौल बनाया गया और पार्टी के बतौर भाजपा संवैधानिक उसूलों को तोड़ते जिस तरह हस्तक्षेप किया, यदि इन घटनाओं को मिला दिया जाय तो जो परिदृश्य बनता है वह खतरनाक है।

उत्तर प्रदेश इन सभी का एक आदर्श रूप है। केंद्र में भाजपा की सरकार जिसे ढाई लोगों की सरकार कहा जा रहा है, उसकी व्याख्या पार्टी के जनवाद को खत्म कर देने की तरह पढ़ा जाना चाहिए। ढाई लोग केंद्र सरकार, पार्टी, गवर्नर, नौकरशाही और उससे भी नीचे जाति और धर्म पर आधारित संगठित हत्यारे गिरोहों जिन्हें देश की संस्कृति के रक्षक और स्वयं सेवक कहा जा रहा है पर यदि नियंत्रण रख रहे हैं तब इस तरह की राजनीति को पर्सनालिटी, स्टेटमेनशिप का संकट कहना सिर्फ सरलीकरण करने की भूल नहीं है।

यह या तो आगामी बहुमत हासिल करने और इसी तरह देश चलाने की समझदारी है या यह एक बड़े राजनीतिक संकट को खुद ही गुजर जाने का एक ऐसा आत्मघाती इंतजार है जिसमें नागरिक और संवैधानिक उसूलों का मूल्य सिर्फ खत्म ही नहीं हो जायेगा बल्कि इसे एक अपराध के रूप में देखा जायेगा।

इस देश के किसानों, मजदूरों, आदिवासियों, मुसलमानों, कश्मीर की जनता के नागरिक अधिकार और इस संदर्भ में संवैधानिक उसूलों की आप बात करके देखिये! आपको एक अपराधी की तरह सिर्फ देखा नहीं जायेगा बल्कि खुलेआम दंडित करने का प्रयास होगा, आपके प्रति अपराधी जैसा व्यवहार किया जायेगा और तब भी बचे रहे तो आगे का काम ‘कानून’ करेगा।

फिर भी इस फासीवाद से बचने के लिए कांगे्रस से उम्मीदें लोग बनाये हुए हैं, गठबंधन की बात चल रही है, चुनावी रणनीति बन रही है, आगामी लोकसभा चुनाव करीब आता जा रहा है लेकिन जो दिल्ली में राजनीतिक संकट चल रहा है कांग्रेस इस राजनीतिक चुनौती से भाग रही है, बच रही है, चुप्पी साधे हुए है। संसदीय राजनीति को जो संकट चल रहा है निश्चित ही सत्ता की टकराहटे हैं, यह एक खास तरह का अंतर्विरोध है जिस पर चुप रहना, उससे आंख मूंद लेना खतरनाक होगा। इसे समझना, इस पर बोलना जरूरी है।

Next Story

विविध

Share it