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नरेगा मजदूरों के बराबर वेतन पाने वाले प्राचार्यों और शिक्षकों को योगी ने दिए चाणक्य बनने के टिप्स

Prema Negi
3 April 2019 1:08 PM GMT
नरेगा मजदूरों के बराबर वेतन पाने वाले प्राचार्यों और शिक्षकों को योगी ने दिए चाणक्य बनने के टिप्स
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जिन शिक्षकों को नेट, जेआरएफ, पीएचडी करने के बाद भी योगी सरकार मनरेगा मजदूर के बराबर भी हक एवं सुरक्षा दिलवाने में भी असमर्थ रही है, उस पर दुख या शर्म व्यक्त करने की रस्म अदायगी भी योगी नहीं निभा सके...

चतुरानन ओझा

गोरखपुर में लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान के तहत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, महंत एवं अनेक प्राइवेट शिक्षण संस्थानों के प्रबंधक आदित्यनाथ योगी ने नगर स्थित दिग्विजय नाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय में, जो उनके मठ के प्रबंधन में ही आता है, शिक्षक सम्मेलन किया।

उस सम्मेलन में बहुत थोड़े से 3% सरकारी वेतन पाने वाले शिक्षकों के साथ ढेर सारे 97 % निजी महाविद्यालयों के अनुमोदित और वित्तविहीन शिक्षक भी थे| मजेदार यह था कि इसके मुख्य आयोजक स्ववित्तपोषित कालेजों के वे प्राचार्य थे, जिन्होंने शिक्षकों से अलग अपना 'प्राचार्य परिषद' ही बना रखा है।

इनमें अधिकांश ने अनुमोदित शिक्षकों से अलग होकर प्रबंधकों एवं सरकार की मंशा के अनुरूप बिना शिक्षक और बिना शिक्षा परीक्षा कराने में और छात्रों से वसूली कर विश्वविद्यालय, परीक्षा नियंत्रक, प्रोफेसर्स, उड़न दस्तों एवं प्रबंधकों का हिस्सा बांटने में महारत हासिल कर ली है।

गौरतलब है कि इस शिक्षक सम्मेलन में मुख्यमंत्री ने शिक्षकों को चाणक्य बनने की नसीहत देने के अलावा उनसे संबंधित कोई घोषणा या बात नहीं की। वे भारत पाकिस्तान चीन और कांग्रेस करते रहे।

जिन शिक्षकों को नेट, जेआरएफ, पीएचडी करने के बाद भी योगी सरकार मनरेगा मजदूर के बराबर भी हक एवं सुरक्षा दिलवाने में भी असमर्थ रही है, उस पर दुख या शर्म व्यक्त करने की रस्म अदायगी भी योगी नहीं निभा सके। इनके अपने शहर का दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, जिससे इनके शिक्षण संस्थान भी जुड़े हुए हैं, संबद्ध महाविद्यालयों के शिक्षकों की ऑनलाइन लिस्ट भी अब तक उपलब्ध नहीं करा पाए हैं।

मुख्यमंत्री योगी इन महाविद्यालयों में शासनादेशों का अनुपालन करा पाने में पूरी तरह अक्षम रहे हैं। पूर्णतया शिक्षकविहीन कालेजों की बार-बार स्ववित्तपोषित महाविद्यालय शिक्षक एसोसिएशन की शिकायत के बाद भी इनकी सरकार कोई कार्यवाही कर पाने में असमर्थ रही है, बल्कि कॉलेज से की संबंधित सूचनाओं को ऑनलाइन फीड कराने की अपनी ही सरकार के आदेशों का अनुपालन कराने में भी अक्षम है और उन पर कोई कार्यवाही ना करते हुए पूर्व सरकारों की भांति ही ठेके पर अवैध तरीके से परीक्षाएं संचालित करा रही है।

जिन कॉलेजों में एक भी शिक्षक नहीं हैं, लिखित शिकायत के बाद भी उनके निरीक्षण की कोई कार्यवाही नहीं की गई है। शिक्षक समुदाय जो इस नई योगी सरकार से बहुत उम्मीद लगाए हुए बैठा था, पूरी तरह हताश और निराश हो चुका है।

गोरखपुर विश्वविद्यालय संबद्ध स्ववित्तपोषित शिक्षक अब सरकार को शिकायत के काबिल भी नहीं मानते। जाहिर है वह अवसाद में हैं। कई कुपोषण और अवसाद में मर चुके हैं। अभाव एवं और असुरक्षा के कारण देवरिया जिले के एक स्ववित्तपोषित पीजी कॉलेज के प्राचार्य ने पिछले साल पोखरी में डूब कर आत्महत्या भी कर ली थी। उन्हें प्राचार्य होने के बावजूद मात्र ₹3000 रुपए वेतन मिलता था।

स्थितियां पहले से भी अधिक इस रूप में खराब हुई हैं कि लोग सरकार से पूरी उम्मीद खो चुके हैं। शिक्षक "मोदी अगेन" कहने को मजबूर हैं। योगी आदित्यनाथ को चुनावों से पहले शिक्षकों को राजनीति बताने से पहले, इनके कॉलेजों पर सर्जिकल स्ट्राइक कर वहां प्रवेश लिए छात्रों को शिक्षक एवं अनुमोदित शिक्षकों से कार्य एवं वेतनमान वेतन भुगतान का न्यूनतम इंतजाम तो कर ही देना चाहिए था।

मगर अपनी कायरता को वीरता की शक्ल में प्रस्तुत करने की इनकी मंडली की आत्महीन कला-कौशल का कोई जवाब नहीं। यह अचानक नहीं था कि इस चुनावी अवसर पर शिक्षक सम्मेलन के लिए उन्होंने अपने ही मठ के प्रबंधन में चल रहे शहर के इस महाविद्यालय को चुना। अन्यथा हो सकता था कि उन्हें अपने अब तक के गैर जिम्मेदार और शिक्षकों के प्रति निहायत ही असंवेदनशील रवैया के कारण उनके तीव्र विरोध प्रदर्शन का भी सामना करना पड़ता।

दुखद आश्चर्य है कि तीन प्रतिशत शिक्षकों को सातवां वेतन और 97 प्रतिशत प्राइवेट शिक्षकों को न्यूनतम वेतन भी नहीं देने वाली यह सरकार हिंदू राज और समान आचार संहिता की बात करती है, जबकि यह अपने घर में ही न्यायपूर्ण व्यवस्था लागू कराने में असमर्थ है और लूट के राज को कायम किए हुए हैं।

वहीं यह कितना हास्यास्पद है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यह भी आह्वान करते हैं कि शिक्षक अगर सही में चाणक्य की भूमिका में आ जाए, और अपनी ताकत पहचान ले तो माफियाओं के इस पूरे तंत्र को खत्म कर सबके लिए समान और मुक्त शिक्षा तथा समान काम के लिये समान वेतन की समाजवादी व्यवस्था स्थापित करते देर नहीं लगेगी।

(चतुरानन ओझा स्ववित्तपोषित महाविद्यालय शिक्षक एसोसिएशन से जुड़े हैं।)

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