भ्रष्ट जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस में जहां 30 सदस्यों ने साइन किए थे, वहीं अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मात्र 8 सदस्यों ने वोट दिया, बाकी सब जिला पंचायत सदस्यों ने गंभीर धाराओं में जेल में बंद रामप्रवेश के पक्ष में ही वोट किया…

जनज्वार, गोरखपुर। दीपक मणि का अपहरण कर करोड़ों की जमीन का जबरन बैनामा करवाने के बाद 50,000 का ईनाम घोषित होने के बाद फरार रहे और फिर नाटकीय ढंग से गिरफ्तार किए गए देवरिया के जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव उर्फ बबलू की नाटकीयता अभी भी बरकरार है। अपहरण, भ्रष्टाचार समेत कई अन्य गम्भीर धाराओं में जेल में बंद रामप्रवेश ने अपनी जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी बचा ली है।

गौरतलब है कि जिला पंचायत के 34 सदस्यों ने रामप्रवेश यादव के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस जिलाधिकारी देवरिया को सौंपा था। अविश्वास प्रस्ताव में 30 सदस्यों ने हस्ताक्षर किए थे, जिसके बाद जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी हो रही थी। इसी सिलसिले में आज जिलाधिकारी देवरिया ने सभी पंचायत सदस्यों को जिला पंचायत सभागार में उपस्थित होने को कहा था। मगर यह अविश्वास प्रस्ताव भारी बहुमत से गिर गया और रामप्रवेश यादव की कुर्सी जेल में होने के बावजूद सुरक्षित है।

गौरतलब है कि रामप्रवेश यादव के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस में जहां 30 सदस्यों ने साइन किए थे, वहीं अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मात्र 8 सदस्यों ने वोट दिया, बाकी सब जिला पंचायत सदस्यों ने गंभीर धाराओं में जेल में बंद रामप्रवेश के पक्ष में ही वोट किया। जिला पंचायत के कुल 56 सदस्य हैं।

देवरिया का 50 हजार का इनामी जिला पंचायत अध्यक्ष क्या पुलिस की मिलीभगत से हुआ था भगोड़ा

गौरतलब है कि जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव ने अपनी ताकत और कद का इस्तेमाल करते हुए 17 अप्रैल को दीपक मणि से 10 करोड़ की जमीन पर जबरन रजिस्ट्री कार्यालय ले जाकर हस्ताक्षर करवा लिए थे। यही नहीं नियमों को दरकिनार करते हुए जिला पंचायत अध्यक्ष की दबंगई में दीपक मणि से एक ही दिन में पांच बैनामे जबरन कराए गए। दीपक मणि से जबरन इन रजिस्ट्री पर साइन तब करवाये गएए जबकि उसके घरवालों ने उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

जांच में ही सामने आया कि षड्यंत्र के तहत काफी समय तक रामप्रवेश यादव ने दीपक को बंधक बनवाकर रखा हुआ था। इस मामले में दीपक की बरामदगी के बाद गायब हुए रामप्रवेश यादव को पुलिस ने भगौड़ा घोषित करते हुए 50,000 का ईनाम भी रखा था, मगर बाद में बहुत ही नाटकीय ढंग से उसकी गिरफ्तारी 27 मई की सुबह महाराजगंज के ठूठीबारी से क्राइम ब्रांच की टीम द्वारा की गई।

मीडिया में आई खबरों के मुताबिक सुनियोजित तरीक़े से 26 मई को माननीय उच्च न्यायालय से गिरफ्तारी पर स्टे खारिज होने के बाद 27 मई को रामप्रवेश सोनौली बार्डर से गिरफ्तार हुआ। न्यायालय के आदेश के बाद उसे जेल भेज दिया गया। जिस तरह की आपराधिक धाराएं उस पर लगी हुई हैं, उससे उसकी 6 माह तक जमानत होनी भी मुश्किल है। ऐसे में जेल में रहते हुए जिस तरह वह अपनी सीट बचाने में कामयाब हुआ उससे यह बात तो समझ में आयी कि पार्टी चाहे कोई ​भी हो, सरकार चाहे किसी की भी दबंग और गुंडा छवि के राजनेता अपना काम साम—दाम—दंड—भेद किसी भी तरीके से करने में सफल हो ही जाते हैं।

समाजवादी पार्टी से ताल्लुक रखने वाले रामप्रवेश यादव की क्रिमिनल होने के बावजूद जिस तरह से सीट बची है और दोबारा अविश्वास प्रस्ताव लगभग खारिज हुआ है उससे राज्य में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी पर भी सवाल उठ रहे हैं। सवाल उठ रहे हैं ​कि भाजपा की सरकार में जेल में रहते हुए समाजवादी पार्टी का जिला पंचायत अध्यक्ष अपने विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव को खारिज़ कराने में कैसे सफल रहा।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सत्ता में कौन सी पार्टी है। समाजवादी पार्टी हो या भारतीय जनता पार्टी दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि देवरिया से योगी सरकार के दो कद्दावर मंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री भी हैं, बावजूद उसके सपा अपने दागी और दबंग जिला पंचायत अध्यक्ष की सीट बचाने में कामयाब रही।


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