Last Update On : 12 09 2018 09:13:36 PM

पीड़ित लड़कियां कहती हैं निलंबन के बाद से हम पांचों पिछले तीन महीने से झेल रही हैं मानसिक और शारीरिक यातनाएं, पुलिस जांच में क्लीनचिट मिलने के बाद पिछले दो दिन से लगातार लगा रही हैं यूनिवर्सिटी कैंपस में रजिस्ट्रार और वीसी दफ्तर के चक्कर…

सुशील मानव की रिपोर्ट

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी यूनिवर्सिटी वर्धा की पांच दलित लड़कियों के खिलाफ नजदीकी रामनगर पुलिस थाने में धारा 143, 147,149,312, और 323 में लिखाई गई एफआईआर की बुनियाद पर वर्धा यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा उक्त पांचों लड़कियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया था।

तीन महीने की आईजी स्तर की जांच में निर्दोष पाए जाने के बाद आरोपित पांचों लड़कियों को पुलिस प्रशासन द्वारा क्लीनचिट दे दी गई और उसकी एक कॉपी कल ही वर्धा यूनिवर्सिटी को रिसीव करवा दी गई। आईजी जांच में निर्दोष करार दिए जाने के बाद पांचों छात्राएं जब यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार से अपने निलंबन वापसी के बाबत जानकारी लेने गई तो रजिस्ट्रार ने बताया कि पुलिस जांच की रिपोर्ट वीसी तक पहुंचा दी गई है और निलंबन वापसी की प्रक्रिया प्रक्रिया में है।

इस बाबत जब इन रिपोर्ट के लेखक ने वीसी से फोन पर पूछा कि आईजी जांच में पाँचों लड़कियों को क्लीनचिट दिए जाने के बाद अब कितने समय में उन लड़कियों का निलंबन वापिस लिया जाएगा। इसके जवाब में वीसी ने कहा कि अभी वो कागज यूनिवर्सिटी प्रशासन तक नहीं पहुंचा है। जब पहुंचेगा तो देख विचारकर फैसला लिया जाएगा। जब जोर देकर बताया कि हमें पक्की जानकारी है कि पुलिस जांच रिपोर्ट यूनिवर्सिटी प्रशासन तक कल ही पहुंच गई है।

इस सवाल पर बहुत ही रूड होकर वीसी गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि आप लोगों को क्या है, क्यों पड़े हो इस मामले में। उन लड़कियों के खिलाफ़ एफआईआर हुई है। मैंने कहा सर एफआईआर तो आप पर भी हुई है, यूनिवर्सिटी के और भी कई लोगों के खिलाफ़ हुई है। इस बात से तिलमिलाए वीसी महोदय ने मेरी कॉललाइन काट दी। कई बार फिर से प्रयास किया पर उन्होंने मेरा नंबर ब्लैकलिस्ट में डाल दिया।

दूसरा प्रश्न अनुत्तरित रह गया। मैं वीसी महोदय से अगला प्रश्न ये पूछना चाहता था कि उक्त पांचों लड़कियों को क्लीचनिट मिलने के बाद क्या वर्धा यूनिवर्सिटी प्रशासन अपने गलत फैसले के लिए उन लड़कियों से माफी मांगेगा।

इसके ठीक बाद मेरी बात रजिस्ट्रार केके सिंह से हुई। केके सिंह ने पांचों लड़कियों के निलंबन वापसी पर पूछने के बाबत बताया कि निलंबन वापसी प्रक्रिया में है। वीसी इसे देख रहे हैं और जल्द ही इस पर फैसला होगा। मैंने पूछा कुछ अनुमान ही बता दीजिए कितने दिन में होगा। तो उन्होंने कहा कि ये हम आपको नहीं बता सकते। बस इतना जान लीजिए की ये प्रक्रिया में है। मैंने उनसे आगे पूछा कि लड़कियों को क्लीनचिट मिलने के डॉक्यूमेंट आपको कब मिले थे। तो उन्होंने बेलाग कहा कि, कल शाम को।

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वहीं पांचों पीड़िताओं में से एक लड़की आरती से भी बात हुई। उसने फोन पर बातचीत में बताया कि निर्दोष होते हुए भी हमें निलंबित कर दिया गया। निलंबन के बाद से हम पांचों लड़कियां पिछले तीन महीने से मानसिक और शारीरिक यातनाएं झेली हैं। पुलिस जांच में क्लीनचिट मिलने के बाद वो पिछले दो दिन से लगातार यूनिवर्सिटी कैंपस में रजिस्ट्रार और वीसी दफ्तर के चक्कर लगा रही हैं।

रजिस्ट्रार द्वारा उन्हें बार बार प्रक्रिया में होने को कहकर टाल रहा है। बता दें कि केके सिंह वही रजिस्ट्रार हैं जिनका कुछ दिन पहले फोनकाल ऑडियो वायरल हुआ था जिसमें वो पीड़ित लड़कियों को ही समझौते के लिए दबाव बनाते और धमकाते हुए साफ सुनाई पड़ते हैं। पीड़ित लड़की ने फोन पर बताया कि गर जल्द उनके निलंबन वापिस न लिए गए तो वो लोग वहीं रजिस्ट्रार ऑफिस के सामने धरने पर बैठेंगी।

पीड़ित लड़कियों का कहना है कि जब यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा निलंबन तत्काल कर दिया गया उसमें किसी तरह की आंतरिक जांच की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई तो अब पुलिस से क्लीनचिट मिलने के बाद उनका निलंबन तत्काल वापिस क्यों नहीं लिया जा रहा। प्रक्रिया के नाम पर निलंबन वापसी में टाल-मटोल क्यों किया जा रहा है।

क्या है पूरा मामला
दरअसल बी. एड.–एम. एड. एकीकृत की छात्रा ललिता ने आरोप लगाया कि शादी का झांसा देकर शोध छात्र चेतन सिंह लगातार उसका यौन शोषण करता रहा। फिर 29 दिसंबर 2017 को उसने चेतन सिंह पर आईपीसी की धारा 376, 323, 506, 417 के तहत स्थानीय राम नगर पुलिस स्टेशन, वर्धा में केस दर्ज कराया। इस केस में विश्वविद्यालय की चार लड़कियां आरती कुमारी, विजयालक्ष्मी सिंह, कीर्ति शर्मा, शिल्पा भगत पीड़िता की गवाह थीं।

विश्वविद्यालय की महिला सेल की सिफारिश पर हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा प्रशासन ने चेतन सिंह को यौन शोषण के आरोप में निष्कासित कर दिया। कुछ दिन बाद आरोपी चेतन सिंह को कोर्ट से इस शर्त पर जमानत मिली कि जमानत के बाद वो पीड़िता या गवाहों को किसी प्रकार से प्रताड़ित नहीं करेगा। इसके बाद आरोपी चेतन सिंह विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के निकट ही पंजाब राव कॉलोनी में अपनी पत्नी सोनिया के साथ किराए पर आकर रहने लगा।

इसी दौरान दिनांक 03 मई 2018 की शाम अपनी चारों सहेलियों के साथ ज़रूरत के सामान लेने गई पीड़ित छात्रा ललिता और चेतन सिंह व सोनिया सिंह का आमना-सामना हो जाती है, जिसके बाद गाली गलौज करते हुए चेतन सिंह पीड़िता को थप्पड़ मारता है। फिर उसी रात 8:00 बजे अपनी पत्नी सोनिया सिंह के साथ रामनगर पुलिस थाना में जाकर चेतन सिंह ललिता के खिलाफ धारा 504, 506 के तहत एनसीआर दर्ज कराता है।

ललिता भी विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के कर्मचारी, गार्ड, केयरटेकर तथा 3 महिला मित्र के साथ रामनगर थाने में चेतन सिंह के खिलाफ धारा 324 के तहत केस दर्ज कराती है। फिर दिनांक 08 मई 2018 को चेतन सिंह की पत्नी सोनिया सिंह द्वारा हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा को लिखित शिकायत पत्र दिया जाता है जिसमें पीड़िता पक्ष की 4 मुख्य गवाहों पर आरोप लगाए गए कि उन सबने चेतन सिंह व उसकी पत्नी के साथ मारपीट की, जिससे उसका गर्भपात हो गया।

इस मामले में सेवाग्राम से बनी एक मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर 07 जून 2018 को उक्त पांचों लड़कियों के खिलाफ़ एफआईआर दर्ज कर ली गई। एन.सी.आर. में जहां पीड़िता के अलावा किसी का भी नाम नहीं था, वहीं बाद में एफआईआर में चार अन्य नाम लड़कियों के नाम जोड़ दिया गया। इसी केस के सिलसिले में रामनगर थाने के पी.एस.आई. सचिन यादव पीड़िता और उसके साथ के गवाह लड़कियों व उनके अभिभावकों को धमकी देता है कि ‘5 लड़कियों की पीएच-डी. खत्म करवा दूँगा और सब को जेल कराऊंगा।’

पी.एस.आई. का यह रवैया देखकर पीड़िता लड़कियों ने इसकी शिकायत आईजी नागपुर से की। आईजी ने मामले पर तुरंत संज्ञान लेते हुए वर्धा एसपी से जांच प्रक्रिया शुरू करवाई। 6 जुलाई 2018 को आरोपियों के बयान दर्ज़ कराए गए। उसी दिन 6 जुलाई 2018 को एफआईआर को आधार बनाते हुए विश्वविद्यालय द्वारा 5 लड़कियों को बिना किसी प्राथमिक जांच किए निलंबित कर दिया गया। जोकि पूर्णतयः असंवैधानिक था।

इन लड़कियों का निलंबन मुंबई न्यायालय के आदेश क्रमांक 9889/2017 का खुला उल्लंघन है, जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि केवल एफआईआर दर्ज होने के आधार पर विद्यार्थियों के शिक्षा लेने के संवैधानिक अधिकार का हनन करने का अधिकार किसी संस्था के पास नहीं है। तो क्या अब यूनिवर्सिटी के वीसी अपनी इस गंभीर और असंवैधानिक गलती के लिए उन लड़कियों से माफी मांगेंगे जिन्हें उनके असंवैधानिक कार्रवाई के चलते मानसिक, शारीरिक, सामाजिक, विश्वविद्यालय प्रशासन व पुलिसिया यंत्रणाओं से गुजरना पड़ा।