Amrita Pritam Birth Anniversary Special : 'मेरी रचनाएं नाजायज बच्चे की तरह'

Update: 2021-08-31 16:48 GMT

( अमृता प्रीतम का पहला संकलन मात्र 16 साल की उमर में हो गया था प्रकाशित ) 

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

जनज्वार। अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' की भूमिका में अमृता प्रीतम लिखती हैं – 'मेरी सारी रचनाएं, क्या कविता, क्या कहानी, क्या उपन्यास, सब एक नाजायज बच्चे की तरह हैं। मेरी दुनिया की हकीकत ने मेरे मन के सपने से इश्क किया और उसके वर्जित मेल से ये रचनाएं पैदा हुईं। एक नाजायज बच्चे की किस्मत इनकी किस्मत है और इन्होंने सारी उम्र साहित्यिक समाज के माथे के बल भुगते हैं।'

अमृता प्रीतम का जन्म 1919 में गुजरांवाला (पाकिस्तान) में हुआ था। बचपन लाहौर में बीता और शिक्षा भी वहीं पर हुई। इन्होने शुरुआत की पंजाबी लेखन से और किशोरावस्था से ही कविता, कहानी और निबंध लिखना शुरू किया। अमृता 11 साल की थी तभी इनकी माताजी का इन्तकाल हो गया, इसलिये घर की जिम्मेदारी भी इनके कंधों पर आ गयी। ये उन विरले साहित्यकारों में से है जिनका पहला संकलन 16 साल की उमर में प्रकाशित हुआ। फ़िर आया 1947 का विभाजन का दौर, इन्होने विभाजन का दर्द सहा था, और इसे बहुत करीब से महसूस किया था।

अमृता की कई कहानियों में आप इस दर्द को स्वयं महसूस कर सकते हैं। विभाजन के समय इनका परिवार दिल्ली में आ बसा। अब इन्होंने पंजाबी के साथ साथ हिन्दी में भी लिखना शुरु किया। इनका विवाह 16 साल की उम्र मे ही एक संपादक से हुआ, ये रिश्ता बचपन मे ही मां बाप ने तय कर दिया था। यह वैवाहिक जीवन भी 1960 में तलाक के साथ टूट गया।

अमृता जी को कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी नवाजा गया, जिनमें प्रमुख हैं 1957 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1958 में पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा पुरस्कार, 1988 में बल्गारिया वैरोव पुरस्कार और 1982 में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार।

अमृता पहली महिला थीं, जिन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड मिला और साथ ही साथ वे पहली पंजाबी महिला थीं, जिन्हें 1969 में पद्मश्री अवार्ड से नवाजा गया। 1961 तक इन्होंने आल इन्डिया रेडियो मे भी काम किया। 1960 में अपने पति से तलाक के बाद इनकी रचनाओं में महिला पात्रों की पीड़ा और वैवाहिक जीवन के कटु अनुभवों का अहसास को महसूस किया जा सकता है। विभाजन की पीड़ा को लेकर इनके उपन्यास पिंजर पर एक फ़िल्म भी बनी थी, जो अच्छी खासी चर्चा में रही। इन्होने पचास से अधिक पुस्तकें लिखीं और इनकी काफ़ी रचनायें विदेशी भाषाओं में भी अनुवादित हुई।

अमृता प्रीतम की जिंदगी में इमरोज और साहिर लुधियानवी का विशेष स्थान था। कहा जाता है कि फिल्म कभी-कभी का टाइटल सोंग, कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है – को साहिर साहब ने अमृता प्रीतम के लिए ही लिखा था, जिसका बाद में कुछ परिवर्तन के साथ फिल्म में इस्तेमाल किया गया।

प्रस्तुत है, अमृता प्रीतम की तीन कवितायें, जिनसे उनकी उन्मुक्तता और विचारधारा का पता लगता है—

राजनीति

सुना है राजनीति एक क्लासिक फिल्म है

हीरो: बहुमुखी प्रतिभा का मालिक

रोज अपना नाम बदलता है

हीरोइन: हकूमत की कुर्सी वही रहती है

ऐक्स्ट्रा: लोकसभा और राजसभा के मैम्बर

फाइनेंसर: दिहाड़ी के मज़दूर,

कामगर और खेतिहर

(फाइनांस करते नहीं,

करवाये जाते हैं)

संसद: इनडोर शूटिंग का स्थान

अख़बार: आउटडोर शूटिंग के साधन

यह फिल्म मैंने देखी नहीं

सिर्फ़ सुनी है

क्योंकि सैन्सर का कहना है —

'नॉट फॉर अडल्स।'

वारिस शाह से...

आज वारिस शाह से कहती हूँ

अपनी कब्र में से बोलो

और इश्क की किताब का

कोई नया वर्क खोलो

पंजाब की एक बेटी रोई थी

तूने एक लंबी दास्तान लिखी

आज लाखों बेटियाँ रो रही हैं,

वारिस शाह तुम से कह रही हैं

ऐ दर्दमंदों के दोस्त

पंजाब की हालत देखो

चौपाल लाशों से अटा पड़ा हैं,

चिनाव लहू से भरी पड़ी है

किसी ने पाँचों दरिया में

एक जहर मिला दिया है

और यही पानी

धरती को सींचने लगा है

इस जरखेज धरती से

जहर फूट निकला है

देखो, सुर्खी कहाँ तक आ पहुँची

और कहर कहाँ तक आ पहुँचा

फिर जहरीली हवा वन जंगलों में चलने लगी

उसमें हर बाँस की बाँसुरी

जैसे एक नाग बना दी

नागों ने लोगों के होंठ डस लिये

और डंक बढ़ते चले गये

और देखते देखते पंजाब के

सारे अंग काले और नीले पड़ गये

हर गले से गीत टूट गया

हर चरखे का धागा छूट गया

सहेलियाँ एक दूसरे से छूट गईं

चरखों की महफिल वीरान हो गई

मल्लाहों ने सारी कश्तियाँ

सेज के साथ ही बहा दीं

पीपलों ने सारी पेंगें

टहनियों के साथ तोड़ दीं

जहाँ प्यार के नगमे गूँजते थे

वह बाँसुरी जाने कहाँ खो गई

और रांझे के सब भाई

बाँसुरी बजाना भूल गये

धरती पर लहू बरसा

क़ब्रें टपकने लगीं

और प्रीत की शहजादियाँ

मजारों में रोने लगीं

आज सब कैदो बन गए

हुस्न इश्क के चोर

मैं कहाँ से ढूँढ के लाऊँ

एक वारिस शाह और...

शहर

मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है

सड़कें - बेतुकी दलीलों-सी…

और गलियाँ इस तरह

जैसे एक बात को कोई इधर घसीटता

कोई उधर

हर मकान एक मुट्ठी-सा भिंचा हुआ

दीवारें-किचकिचाती सी

और नालियाँ, ज्यों मुँह से झाग बहता है

यह बहस जाने सूरज से शुरू हुई थी

जो उसे देख कर यह और गरमाती

और हर द्वार के मुँह से

फिर साईकिलों और स्कूटरों के पहिये

गालियों की तरह निकलते

और घंटियाँ-हार्न एक दूसरे पर झपटते

जो भी बच्चा इस शहर में जनमता

पूछता कि किस बात पर यह बहस हो रही?

फिर उसका प्रश्न ही एक बहस बनता

बहस से निकलता, बहस में मिलता…

शंख घंटों के साँस सूखते

रात आती, फिर टपकती और चली जाती

पर नींद में भी बहस ख़तम न होती

मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है….

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