मोदी का फरमान 'जहां बीमार वहीं उपचार', उधर योगीराज में ग्रामीण अस्पतालों को खुद इलाज की दरकार

प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद में स्वास्थ्य इंतजाम बेहतर होने का ऑफिसर से लेकर मंत्री तक भले ही दावा करें, लेकिन बड़ी संख्या में ऑक्सीजन व बेड के इंतजाम के अभाव में मरीजों के मौत ने असली तस्वीर उजागर कर दी है....

Update: 2021-05-28 14:47 GMT

(देवरिया जिले का जर्जर प्राथमिक स्वास्थ केंद्र मईल। अस्पताल की सीमा रेखा तय न होने के चलते लगातार अतिक्रमण किया जा रहा है।)

जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट

जनज्वार। देश में कोरोना वायरस और ब्लैक फंगस यानी म्यूकोरमाइकोसिस के हमले के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सप्ताह पूर्व अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के डॉक्टरों से वर्चुअल संवाद में कोरोना से लड़ाई का नया मूलमंत्र 'जहां बीमार वहीं उपचार' का दिया था। उन्होंने कहा कि इलाज को मरीज की चौखट तक लाकर स्वास्थ्य ढांचे पर बढ़े दबाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उधर हकीकत यह है कि योगीराज में उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अस्पतालों को खुद इलाज की दरकार है। जिसके उपचार बिना कोरोना के तीसरी लहर का मुकाबला आसान नहीं होगा।

उत्तर प्रदेश सरकार भले ही लाख दावा कर रही है कि गांवों में कोरोना की रोकथाम के लिये हम पूरी तरह से जुटे हैं। लेकिन प्रदेश का हाईकोर्ट भी व्यवस्था को देखकर निराश है। हाईकोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि गांव की स्वास्थ्य व्यवस्था राम भरोसे है। इसकी हकीकत जानने के लिए कुछ जिलों के ग्रामीण अस्पतालों कि हम जमीनी सच पर नजर दौड़ाते हैं।

देश की राजधानी से सटे राज्य के प्रमुख जिला गौतम बुद्ध नगर के गावों की तस्वीर अब हमें डराती हैं। गाजियाबाद मुरादनगर ब्लॉक के अबूपूर में हालात सरकार को मुंह चिढ़ाने वाले हैं। यहां लगभग साढ़े आठ हजार की आबादी है, लेकिन उसके बावजूद भी यहां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर ताला लगा है। कोई भी डॉक्टर या फिर स्टाफ यहां मौजूद नहीं है। यह हालात गांव में तब है, जब गांव में लगातार मौतें देखने को मिल रही हैं।

ग्राम प्रधान का कहना है कि गांव में कोरोना टेस्ट की सुविधा न होने के कारण इन मौतों को कोराना से होने वाली मौतें नहीं कहा जा सकता है। लेकिन अभी भी गांव में लगभग 50 से 60 लोग ऐसे हैं जिनको कोरोना वायरस के लक्षण हैं। उनका घर में ही इलाज किया जा रहा है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि, जब गांव में इस तरह के हालात लगातार सामने आ रहे हैं दूसरी और उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि गांव में स्थिति नियंत्रण करने के लिए लगातार प्रयास जारी हैं।

लेकिन प्रशासन की लापरवाही की तस्वीर सबके सामने है। जिले के मुरादनगर ब्लॉक के ही गांव सोंदा में मौजूद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के गेट के सामने गंदगी का अंबार लगा है। इस गंदगी को देख अंदाजा लगाया जा सकता है कि लंबे समय से यहां चिकित्सक नहीं आते। ऐसे में ग्रामीणों को परेशानी होती है, तो मुरादनगर मोदीनगर या फिर गाजियाबाद जाना पड़ता है। मुरादनगर नहर पर स्थित पैंगा गांव में मौजूद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर अधिकांश समय ताला लगा रहता है।

खास बात यह है कि गाजियाबाद के ही रहने वाले अतुल गर्ग उत्तर प्रदेश राज्य सरकार से स्वास्थ्य मंत्री हैं। उसके बावजूद अगर ऐसे हालात जिले के देहाती इलाकों के हैं, तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि बाकी गांव के हालात कितने बदतर हो सकते हैं।

जिला गौतम बुद्ध नगर गाजियाबाद में 161 गांव हैं। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि 161 गांव की तस्वीरें कितनी भयंकर होगी, जबकि देहाती इलाकों में लगातार मौतें हो रही हैं। बस इन मरने वाले लोगों का कसूर इतना है, कि उन्होंने अपना कोविड टेस्ट नहीं कराया। जिसके चलते इनकी मौतें सरकारी आंकड़ों में नहीं गिनी जा रही हैं। लेकिन इन सभी लोगों में कोरोना के लक्षण के बाद घर पर इलाज करने पर इनकी मौतें हुई हैं। ऐसा गांव के लोगों का कहना है लेकिन गांव की स्वास्थ्य व्यवस्था राम भरोसे है।

मुख्यमंत्री के पड़ोसी जिले का ग्रामीण स्वास्थ्य इंतजाम निराशाजनक

प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद में स्वास्थ्य इंतजाम बेहतर होने का ऑफिसर से लेकर मंत्री तक भले ही दावा करें, लेकिन बड़ी संख्या में ऑक्सीजन व बेड के इंतजाम के अभाव में मरीजों के मौत ने असली तस्वीर उजागर कर दी है। पड़ोसी जनपद देवरिया से सरकार में दो मंत्री हैं। इसके बाद भी ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों की तस्वीर नहीं बदल पाई है। मौजूदा हालात में अगर सुधार नहीं हुआ तो कोरोना कि तीसरे लहर का ग्रामीणों को कर पाना आसान नहीं होगा।

(संत कबीर नगर जिले का नया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र दुधारा: अधिकांश स्वास्थ्य कर्मी अन्य अस्पतालों से संबद्ध)

आंकड़ों में जिले में 16 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र , 10 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र व 61 नया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तथा तीन नगरिय स्वास्थ्य केंद्र स्थापित है। कमोबेश सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर ताला लटक रहा है। इन स्वास्थ्य कर्मियों से कोविड अस्पताल में ड्यूटी ली जा रही है। खास बात यह है कि केंद्र सरकार के आदेश के बाद भी यहां अभी तक वर्ष 18 से 44 वर्ष की उम्र तक के लोगों को कोरोना का वैक्सीन नहीं लगाया जा रहा है। जबकि वैक्सीनेशन ही कोरोना से निजात का एकमात्र साधन बताया जा रहा है।

सिद्धार्थनगर जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र शोहरतगढ़ में कोरोना को लेकर कोई तैयारी नहीं दिखाई दे रही। यहां अभी एक भी बेड कोविड को लेकर नहीं बनाया गया है। सीएचसी में दो आक्सीजन कंसंट्रेटर उपलब्ध है। ओपीडी बंद पड़े हैं। जिसके चलते मरीजों को इधर उधर भटकना पड़ रहा है। डाक्टरों के कुल आठ पद सृजित हैं। लेकिन सिर्फ तीन एमबीबीएस की ही तैनाती है। स्त्री एवं प्रसूता रोग विशेषज्ञ न होने से गर्भवती महिलाओं का आपरेशन से प्रसव नहीं हो पा रहा है। प्रसव के लिए सर्जरी की आवश्यकता पड़ने पर मरीजों को रेफर कर दिया जाता है। सर्जन न होने से लोगों को अन्यत्र भटकना पड़ता है। यहां बाल रोग विशेषज्ञ व एनेस्थीसिया का पद सृजित तो है पर तैनाती नहीं है। दंत रोग सर्जन भी नहीं हैं। केवल डेंटल हाइजिनिस्ट की तैनाती है। हड्डी रोग, चर्मरोग विशेषज्ञ, एक्सरे टेक्नीशियन, फील्ड मेल वर्कर आदि पदों पर भी कोई तैनाती नहीं है। यहां दो आक्सीजन कंसंट्रेटर उपलब्ध है। चिकित्सक के रहने के लिए बने आवास की हालत बेहतर नहीं है। रंगाई-पोताई वर्षों से नहीं हुई है। कंट्रोल रूम में तैनात सुरेंद्र कुमार गुप्ता, अमित कुमार चौधरी, पृथ्वी पाल, विजय संकर चौधरी, मुरलीधर आदि ने बताया कि अस्पताल सैनिटाइज नहीं कराया जाता है। सिर्फ नगर पंचायत प्रशासन द्वारा सप्ताह में सैनिटाइज कराया जाता है। हम लोगों गलब्स व सैनिटाइजर समय से नहीं उपलब्ध हो पाता है। पीने व हाथ धोने के लिए पानी भी उपलब्ध नहीं है। सीएचसी शोहरतगढ़ के अधीक्षक डा.पंकज कुमार वर्मा का कहना है कि आवास की दिक्कत है। कोविड -19 बेड बनवाने के लिए अभी किसी प्रकार का दिशा निर्देश नहीं है।

उधर कानपुर जिले के ग्रामीण अस्पतालों की स्थिति दयनीय बनी हुई है। चौबेपुर क्षेत्र में निर्मित कराए गए 31 स्वास्थ्य उपकेंद्रों में से 50 फीसदी का भी उपयोग नहीं हो रहा है। ये अब नशेबाजों और जुआरियों का अड्डा बने हुए हैं। कुछ उपकेंद्रों का ग्रामीण निजी उपयोग कर रहे हैं।

चौबेपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से लगभग आठ किमी दूर स्थित निगोहा स्वास्थ्य उपकेंद्र के निर्माण का उद्देश्य भी स्वास्थ्य कर्मियों की लापरवाही व आला अधिकारियों की अनदेखी से भवन बदहाली का शिकार है।

बिरोहा गांव का स्वास्थ्य उपकेंद्र भी ग्रामीणों को मुंह चिढ़ा रहा है। गांव से दूर बने इस केंद्र तक पहुंचने के लिए रास्ते के नाम पर एक पगडंडी है। एकांत में बने केंद्र पर कभी भी कोई स्वास्थ्यकर्मी नहीं बैठा। मरखरा स्वास्थ्य उपकेंद्र की हालत बेहद जर्जर है। केंद्र पर स्वास्थ्यकर्मियों के न आने से यहां हमेशा ताला ही बंद रहा। कभी सफाई न कराए जाने से यहां आसपास गंदगी का अंबार लगा रहता है।

विशुनपुर गांव का स्वास्थ्य उपकेंद्र भी लाखों रुपये खर्च होने के बाद अनुपयोगी ही साबित हुआ। देखरेख के अभाव में खस्ताहाल है । सालभर से केंद्र में ताला लगा हुआ है। देखरेख व मरम्मत के अभाव में भवन जर्जर हालात में है।

मेरठ जिले के गांवों को कोरोना संक्रमण से बचाने तथा संक्रमित ग्रामीणों का उनके घर के पास ही इलाज कराने का दावा कर रही हो लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में स्थित सरकारी अस्पतालों का हाल अच्छा नहीं है। इसकी हकीकत कमिश्नर सुरेंद्र सिंह ने सीएचसी भूडबराल तथा डीएम ने सीएचसी फलावदा का निरीक्षण के दौरान खुद देखा। कमिश्नर सुरेंद्र सिंह के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भूडबराल का जायजा लेने के दौरानजा उन्हें बाथरूम में टाइल्स टूटी मिली। फायर सिस्टम अधूरा मिला। जिसे पूरा कराने का निर्देश दिया। सीएचसी पर बनाए गए कोविड वार्ड में टीवी और बेड की कमी को पूरा करने का निर्देश दिया। अस्पताल के पर्दे गंदे मिले तथा कूड़ादान नहीं थे। खिड़कियों के शीशे टूटे थे। वहां सोलर प्लांट सिस्टम लगवाने तथा अस्पताल में उपलब्ध सुविधाओं को बैनर होर्डिंग पर लिखवाकर प्रचार करने का निर्देश दिया। वहां आक्सीजन प्लांट लगाने तथा बेड तक आक्सीजन की पाइप लाइन स्थापित कराने का निर्देश दिया। पिसर में लगी सोलर लाइट खराब मिली। मेडिकल वेस्ट का निस्तारण कराने, ग्रीन गार्डन गमले, कुर्सियां आदि लगवाकर परिसर को सुंदर बनाने का निर्देश दिया। जिलाधिकारी के बालाजी को कैंट अस्पताल में निरीक्षण के दौरान अव्यवस्था दिखी। उन्होंने अस्पताल परिसर के अंदर ही कुछ वार्डों में 30 बेड़ का कोविड अस्पताल शुरू करने का निर्देश दिया। नवनिर्मित सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र फलावदा का निरीक्षण के दौरान नया भवन तैयार होने के बाद भी संचालन न होने पर नाराजगी जताई तथा जल्द शुरू करने का निर्देश दिया।

मुख्यमंत्री के पड़ोसी जनपद संतकबीर नगर के ग्रामीण अस्पतालों की स्थिति भी ठीक नहीं है। खलीलाबाद तहसील क्षेत्र के दुधारा में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) पूरी तरह से बदहाल है। 1998 में स्वास्थ्य केंद्र का निर्माण कराया गया था। स्वास्थ्यकर्मियों की कमी के चलते 50 हजार की आबादी को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने वाला अस्पताल खुद ही बीमार है। अधिकांश स्टॉप जिला चिकित्सालय अन्य स्वास्थ केंद्र से संबद्ध हैं।फार्मासिस्ट जुबेर अहमद अस्पताल के प्रभारी हैं, वह वर्तमान में जिला अस्पताल पर अटैच चल रहे हैं। इन परिस्थितियों में लोगों को प्राथमिक उपचार के अलावा अन्य किसी प्रकार की गंभीर बीमारी व दुर्घटना होने पर उपचार नहीं मिल पाता है। वर्तमान में जब कोविड के कारण अस्पतालों पर निर्भरता बढ़ गई है तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के बदहाल होने से लोगों को उपचार कराने के लिए जिले तक का सफर तय करना पड़ता है।

(औरैया जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अयाना: स्टाफ का संकट बरकरार)

सीएमओ इंद्र विजय विश्वकर्मा भी मानते हैं कि कोरोना संकट काल में स्वास्थ्यकर्मियों पर काम का अतिरिक्त दबाव है। जल्द ही अस्पताल पर स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती के अलावा सुविधाओं को बढ़ाया जाएगा। दुधारा के लौकी लाला गांव के प्रधान इरफान अहमद अंसारी ने कहते हैं कि दुधारा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर सुविधा न होने के कारण हम लोगों को सेमरियावां सीएचसी या खलीलाबाद स्थित जिला अस्पताल जाना पड़ता है। दुधारा के ग्राम प्रधान अब्दुल कलाम ने बताया कि अस्पताल की छत बारिश में पूरी तरह से टपकती है। फर्श टूटा हुआ है।

जिला औराई के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अयाना में सर्जन, एमडी फिजिशियन की भी तैनाती नहीं की गई है। स्टाफ नर्स के सहारे डिलीवरी वार्ड चलाया जा रहा। प्रसव के दौरान महिला की स्थिति खराब होने पर पड़ोसी जिले के अस्पतालों के लिए रेफर करना पड़ता है। सीएचसी में दो वार्ड ब्वाय की कमी है। एक वार्ड बॉय तैनात किया गया जबकि दूसरा वार्ड बॉय संविदा पर कार्य कर रहा है। साफ सफाई के लिये तीन सफाई कर्मचारी होने चाहिए। एक ही सफाई कर्मी नहीं है। अस्पताल व परिसर में गंदगी पड़ी रहती है। यहां एक्स-रे मशीन नहीं है।

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