सैकड़ों साल पुराने मंदिर, कूप-तालाब खो रहे अपना अस्तित्व, मालिकाना हक के पेंच में फंसी ऐतिहासिक धरोहरें

Update: 2020-02-03 13:44 GMT

500 सालों की याद दिलाती ये कलाकृतियां बेशक अहरौरा की शोभा में चार चांद लगाती हैं, मगर तालाबों के अंदर पानी की साफ-सफाई ना होने से उनमें गंदगी भर चुकी है, जिस कारण पानी से लगातार बदबू आती है और निर्माण जगह-जगह से टूट-फूट रहा है...

मिर्जापुर से पवन जायसवाल की रिपोर्ट

जनज्वार। मिर्ज़ापुर के अहरौरा नगर पालिका क्षेत्र व आसपास के गांवो में करीब तीन दर्जन से अधिक पांच सौ साल या उससे पुराने मंदिर, कूप, तालाब जैसी पुरानी धरोहरें सही रखरखाव न होने के चलते क्षतिग्रस्त, जमीदोज और गंदगी से पटते जा रहे हैं।

सैकड़ों सालों से पुराने ऐतिहासिक तालाबों जैसे सहुआइन का पोखरा, पियरवा पोखरा, पुरनका पोखरा, बौलिया, रमसगरा पोखरा अहरौरा की सुंदरता में चार चांद लगाते थे, किन्तु इनमें से कुछ की साफ-सफाई व देखभाल न होने से गंदा पानी, नगर का बहता नाली का पानी, जगत बाउंड्री पर बने जगत पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चले हैं। अब स्थिति ये पैदा हो गई है कि जितने भी ऐतिहासिक चीजें नगर की शोभा बढ़ा रही थीं, उनमें से आधे से ज्यादा ऐतिहासिक मंदिर स्थलों, कूपों, तालाबों पर स्वामित्व को लेकर मामला या तो कोर्ट कचहरी में उलझा दिया गया है या फिर इनकी सुंदरता समाप्त होने का इंतजार किया जा रहा है।

माम विवादों के चलते कई ऐतिहासिक धरोहरों का रखरखाव अधर में लटका हुआ है। लोगों को इन पुरातन मंदिरों की याद तभी आती है जब कोई तीज त्यौहार या विशेष आयोजन हो। उसके पहले किसी कर भी इन ऐतिहासिक मंदिरों, तालाबों की तरफ नजर ही नहीं पड़ती।

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हरौरा के पुरनका पोखरा, रमसगरा पोखरा और बौलिया पोखरा का हाल तो बद से बदतर हो चला है। तालाबो के किनारे स्थित करीब एक दर्जन से अधिक पुराने कलाकृतियों से सुसज्जित मंदिर बिना रखरखाव के टूट-फूट व खंडित होकर भरहरा कर गिर रहे हैं।

पुरनका पोखरे के उत्तरी छोर की तरफ शिवजी का करीब 600 साल पुराना मंदिर भी खंडित हो चला है। बाहर बैठा नंदी भी शायद भगवान के साधकों का आने का इंतजार करता होगा कि किसी की नजर इधर भी पड़ जाये। वहीं अहरौरा के रमसगरा पोखरा का हाल तो इससे भी बुरा हो गया है। पोखरे के चारों तरफ बनाए गए जगत के चबूतरे पूरी तरह से भहरा कर गये हैं।

Full View की प्रख्यात हस्ती जिन्हें पांडे जी के नाम से जाना जाता था, उनके द्वारा निर्मित कराए गए इस ऐतिहासिक पोखरों पर ज्यूतिया और छठ पूजा के दिनों हजारों की संख्या में लोग पूजा पाठ करने पहुंचते हैं। ऐसे में छोटे-छोटे बच्चों को इनसे दूर रखा जाता है। डर लगता है कि कहीं कोई पत्थर गिर गया तो बच्चों के साथ कोई अनहोनी घटना हो सकती है।

हीं पास में ही पांडे जी के बगीचे में स्थित करीब 500 साल से भी अधिक पुराना ऐतिहासिक पुरातत्व मंदिर है, जहां पर एक शिलालेख भी रखा गया है। बताया जाता है वह शिलालेख राजा-महाराजाओं के जमाने से बगीचे में पड़ा है। इस पर संस्कृत भाषा में कुछ निर्देश लिखे हुए हैं। पुराने होने के चलते अक्षर हल्के उभरे दिखाई पड़ते हैं। फिलहाल इसे सुसज्जित तरीके से रखा गया है। उसकी भी पूजा पांडे जी के कार्यकर्ताओं द्वारा नियमित रूप से की जाती है।

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हीं अहरौरा के पियरवा पोखरा की बात करें तो यहां की नक्काशीदार मूर्तियों में गढ़ी पुरानी कलाकृतियां लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। पिछले 500 सालों की याद दिलाती ये कलाकृतियां नगर की शोभा में चार चांद लगा देती हैं, किंतु तालाब के अंदर पानी की साफ-सफाई ना होने से उसमें गंदगी भर चुकी है, जिस कारण पानी से लगातार बदबू आती है।

तालाब के जगत किनारे कई दुर्लभ रंगों के पत्थर की नक्काशीदार मूर्तियां बनी हैं, जो इस पोखरे की सुंदरता को बढ़ाते हैं। वही नगर के कूप कुआं की बात करें तो अधिकतर जगत किनारे के चबूतरे जमींदोज हो चुके हैं, जिसके चलते या तो इन्हें ढक दिया गया है या फिर स्थानीय लोगों द्वारा अपना स्वामित्व बता इन पर निर्माण करा दिया गया है और उस पर अतिक्रमण कर लिया गया है। हालांकि ऐसे कूप कुओं का इस्तेमाल करना लोग पूरी तरह से बन्द इसलिए भी कर चुके हैं, क्योंकि घरों-खेतों में बोरिंग हो जाने से इन सब चीजों की आवश्यकता कम ही पड़ती है।

रकार द्वारा अधिकारियों को निर्देशित किया गया है कि कूप तालाबों को संरक्षित किया जाए और अधिक से अधिक निर्माण भी कराया जाए, किंतु जो पुराने तालाब कुएं हैं उनकी तरफ प्रशासन की निगाह भी नहीं पड़ी है। मालिकाना हक जताने वालों द्वारा भी सही तरह से इनका रखरखाव नहीं किया जा रहा है। ऐसे में सैकड़ों साल पुराने ऐतिहासिक चीजे बर्बाद होती जा रही हैं। जिन ऐतिहासिक चीजों के नाम से अहरौरा को ऐतिहासिक पुरातन नगरी माना जाता है, अब उसकी सुंदरता में ग्रहण लगता दिखायी दे रहा है।

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