भारत-पाकिस्तान के बीच अब दुश्मनी का एक बड़ा कारण बनेगा पर्यावरण

Update: 2019-10-28 03:05 GMT

खतरे में हिन्दुकुश हिमालय का पर्यावरण, अधिकतर इलाकों में सुरक्षा कारणों से कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है, संभव, लगातार तनाव के कारण इस क्षेत्र का पर्यावरण बिगड़ता जा रहा है दिन—ब—दिन...

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

सियाचीन ग्लेशियर को दुनिया का सबसे ऊंचा लड़ाई का मैदान माना जाता है। यहाँ एक बार भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध भी हो चुका है। कहने को तो यह ग्लेशियर है, पर इस क्षेत्र में दोनों देशों के सैनिकों का ऐसा जमावड़ा रहता है, जिसकी मिसाल दुनिया में और कहीं नहीं मिलती। जाहिर है इतने सैनिकों के पूरा कचरा और अनुपयोगी सामान इसी क्षेत्र में बिखरा रहता होगा। कहा तो जाता है कि इस क्षेत्र की लगातार सफाई की जाती है पर सुरक्षा कारणों से इस पूरे क्षेत्र में किसी वैज्ञानिक अध्ययन की इजाजत नहीं दी जाती, इसलिए इस पूरे क्षेत्र के पर्यावरण का कोई भी अध्ययन नहीं किया गया है।

पूरा हिन्दुकुश हिमालय दुनिया के सबसे जैव-विविधता वाले क्षेत्रों में शुमार है, पर अधिकतर इलाकों में सुरक्षा कारणों से कोई वैज्ञानिक अध्ययन संभव नहीं है और लगातार तनाव में रहने के कारण इस क्षेत्र का पर्यावरण लगातार बिगड़ता जा रहा है। भारत-पाकिस्तान के बीच का तनाव हिमालय के याक जैसे जानवरों को प्रभावित कर रहा है।

भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और नेपाल में गैंडों की संख्या कम हो रही है। नेपाल में अराजकता के दौर में बर्दिया नेशनल पार्क में रहने वाले 30 गैंडे मारे गए थे। बर्मा और नेपाल के बीच के क्षेत्र में रोहिंग्या लोगों के आवागमन को ख़त्म करने के लिए लैंडमाइंस बिछाए गए थे, जिनसे वहां के हाथियों का प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध हो गया।

बालाकोट हमले के बाद पाकिस्तान ने कहा था कि भारतीय वायु सेना ने हवाई हमले के दौरान जंगलों में अनेक पेड़ों को नुक्सान पहुंचाया था। पिछले कुछ महीनों से भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव अपने चरम पर है। सीमा पर फायरिंग के बीच युद्ध से लेकर परमाणु युद्ध तक की धमकी दी जा रही है। इन दोनों देशों के बीच तनाव का असर पर्यावरण पर भी पड़ रहा है, और सम्भव है कि आने वाले वर्षों में पर्यावरण के विनाश के असर से दोनों देशों के बीच एक नए किस्म का तनाव पैदा हो जाए। वैसे इस नए किस्म के तनाव की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है।

रअसल, प्रधानमंत्री मोदी अनेक बार सिन्धु नदी के पानी को रोकने की धौंस पकिस्तान को दे चुके हैं। सिन्धु नदी तिब्बत से निकलकर भारत आती है और फिर पाकिस्तान में प्रवेश करती है। पाकिस्तान के एक बड़े हिस्से में खेती सहित पानी की सभी जरूरते इसी नदी और इसकी सहायक नदियों से पूरी की जाती है।

र्षों के विचार विमर्श के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितम्बर 1960 को सिन्धु जल समझौता किया गया था। इस समझौते पर भारत की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु और पाकिस्तान की तरफ से तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किये थे। इस समझौते के तहत सिन्धु और इसकी सहायक नदियों के जल का बंटवारा किया गया था क्योंकि सभी नदियाँ पहले भारत में बहती हैं और फिर पाकिस्तान में जाती हैं।

सके तहत पूर्व की दिशा में बहाने वाली तीन नदियों, ब्यास, रावी और सतलुज के पानी पर पूरा अधिकार भारत का है। पश्चिम में बहने वाली तीन नदियों, सिन्धु, चेनाब और झेलम के पानी पर पाकिस्तान का अधिकार है, पर भारत इससे सिंचाई, परिवहन और पनबिजली का काम कर सकता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ कश्मीर में अर्थ साइंसेज के विभागाध्यक्ष डॉ शकील अहमद रोमशू के अनुसार, 'एक बार यदि मान भी लिया जाए कि हम पाकिस्तान का पानी रोक देंगे, पर सवाल यह है कि इस पानी का संचयन कैसे करेंगे? यहाँ रिजर्वायर नहीं हैं, नहरों का जाल नहीं है, फिर पानी रोकेंगे कैसे? पानी रोकने का वक्तव्य तो केवल गीदड़-भभकी है, इसका कोई मतलब नहीं है।'

सिन्धु जल समझौता दुनिया के सफलतम जल समझौतों में शुमार है। लगातार तनाव और अनेक युद्ध के बाद भी यह लगातार कायम रहा है। दरअसल दोनों देशों की भौगोलिक स्थितियां नदियों के बहाव के अनुरूप हैं। यह समझौता तो अभी तक बरकरार है, पर भविष्य में क्या होगा यह बताना कठिन है क्योंकि इस समझौते में जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि के कारण पानी के बहाव में कमी जैसे विषय शामिल नहीं हैं। यह वर्तमान का विषय है और हिन्दुकुश हिमालय तापमान वृद्धि के प्रभावों के कारण लगातार चर्चा में रहता है। यहाँ ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं और सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र सिन्धु नदी का जल ग्रहण क्षेत्र ही है।

हिन्दूकुश हिमालय लगभग 3500 किलोमीटर के दायरे में फैला है, और इसके अंतर्गत भारत समेत चीन, अफगानिस्तान, भूटान, पाकिस्तान, नेपाल और मयन्मार का क्षेत्र आता है। इससे गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिन्धु समेत अनेक बड़ी नदियाँ उत्पन्न होती हैं, इसके क्षेत्र में लगभग 25 करोड़ लोग बसते हैं और 1।65 अरब लोग इन नदियों के पानी पर सीधे आश्रित हैं।

नेक भू-विज्ञानी इस क्षेत्र को दुनिया का तीसरा ध्रुव भी कहते हैं क्योंकि दक्षिणी ध्रुव और उत्तरी ध्रुव के बाद सबसे अधिक बर्फीला क्षेत्र यही है। पर, तापमान वृद्धि के प्रभावों के आकलन की दृष्टि से यह क्षेत्र उपेक्षित रहा है। हिन्दूकुश हिमालय क्षेत्र में 5000 से अधिक ग्लेशियर हैं और इनके पिघलने पर दुनियाभर में सागर तल में 2 मीटर की वृद्धि हो सकती है।

न वैज्ञानिकों के अनुसार पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में वर्ष 2100 तक यदि तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस ही बढ़ता है तब भी हिन्दूकुश हिमालय के लगभग 36 प्रतिशत ग्लेशियर हमेशा के लिए ख़त्म हो जायेंगे। यदि तापमान 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है तब लगभग 50 प्रतिशत ग्लेशियर ख़त्म हो जायेंगे, पर यदि तापमान 5 डिग्री तक बढ़ जाता, जिसकी पूरे संभावना है, 67 प्रतिशत ग्लेशियर ख़त्म हो जायेंगे।

हाँ ध्यान रखने वाला तथ्य यह है कि वर्ष 2018 तक तापमान 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। अनुमान है कि वर्ष 2030 से सिन्धु नदी और इसकी सहायक नदियों में पानी का बहाव कम होने लगेगा और वर्ष 2060 तक इसमें 20 प्रतिशत कम पानी बहने लगेगा।

सी स्थिति में एक नयी समस्या खडी हो जायेगी और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव का एक नया दौर शुरू हो सकता है। तनाव के साथ-साथ दोनों देशों की एक बड़ी आबादी प्रभावित होगी और इसके आसपास का पारिस्थितिकी तंत्र भी।

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